यादें
यादें
यादें
गाँव की गली में मेरा बचपन ऐसा दौड़ता था
जैसे मैं नहीं, Hero Honda Splendor बिना पेट्रोल के भाग रही हो।सुबह‑सुबह स्कूल जाते समय माँ ने बालों में इतना तेल लगाया
कि रास्ते में दो चिड़ियाँ फिसलकर नीचे आ गईं।
मैंने गर्व से सोचा—
"वाह, मेरे बालों की ब्रांडिंग तो नेचर में भी चल रही है!"स्कूल पहुँचते ही मास्टर साहेब बोले—
"काल्पेश, आज लेट કેમ?"
मैंने कहा—
"Sir, रास्ते में ભૈંસે मुझे रोक ली… शायद उसे लगा मैं उसका बच्चा हूँ!"
मास्टर ने चश्मा उतारकर कहा—
"હા, તારા વાળ જોઈ ને તો લાગે જ છે!"दोपहर में टिफिन खोला—
भाखरी, લસણ ની ચટણી और गुड़।
दोस्त बोला—
"તારી મમ્મી રોજ એજ આપે?"
मैंने कहा—
"હા, મમ્મી કહે છે— ભાખરી ખાઈ ને મોટો થાઈ જા… દુનिया ને ભાખરી થી જ જીતવાનું છે!"शाम को क्रिकेट खेलते समय मैंने गेंद फेंकी—
गेंद सीधी जाकर पड़ोसी के सिर पर लगी।
पड़ोसी चिल्लाए—
"કોણે મારૂ મગજ ફોડ્યું?"
मैंने दूर से ही कहा—
"Uncle, મગજ તો પહેલાથી ફૂટેલું છે… બોલ તો હમણાં લાગ્યો!"रात को दादी कहानी सुनाती,
और मैं हर बार बीच में पूछता—
"દાદી, એ રાક્ષસે GST ભર્યું હતું કે નહીં?"
दादी गुस्से में बोली—
"ચુપ બેસ, તારી બુદ્ધિ તો ભાખરી ખાઈ ને જ આવી છે!"बचपन गया,
पर वो सुरती शरारत आज भी वहीं खड़ी है—
बस मैं बड़ा होकर उससे बचने का नाटक करता हूँl
