बातें
बातें
कहानी: "बातें”
गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे दादा रोज़ बैठते थे।
हाथ में लकड़ी की छड़ी, आँखों में चमक, और दिल में ढेरों किस्से।
मैं उनके पास जाकर बैठता तो वो हँसकर कहते—
"अरे, आज फिर कहानी सुनने आया है?"
और मैं सिर हिलाकर दादी की गोद में सर रख देता।
दादी मेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए बोलती—
"कहानी तो दादा की बातें ही हैं… सुन ले, इसमें ज़िंदगी छिपी है।"
---
🌾 दादा की पहली बात
*"बेटा, इंसान की असली पहचान उसके काम में नहीं, उसके कर्म में होती है।
काम तो हर कोई करता है, पर कर्म अच्छे करने वाला ही बड़ा बनता है।"*
दादी तुरंत जोड़ देती—
"और अच्छे कर्म करने के लिए दिल अच्छा होना चाहिए।"
उनकी ये बात मेरे मन में ऐसे बस गई जैसे मिट्टी में बीज।
---
🌙 दूसरी बात
एक रात दादी चूल्हे के पास रोटियाँ सेंक रही थी।
दादा ने कहा—
*"ज़िंदगी भी रोटी जैसी है…
धीमी आँच पर ही अच्छी पकती है।
जल्दी करने वाले हमेशा जली हुई रोटी खाते हैं।"*
दादी हँस पड़ी—
*"और कभी‑कभी रोटी जल भी जाए तो क्या,
थोड़ा घी लगा दो… सब ठीक हो जाता है।"*
उनकी ये बात समझने में मुझे सालों लगे—
घी मतलब प्यार, धैर्य, और माफ़ी।
---
🌻 तीसरी बात
बरसात के दिनों में दादा मुझे खेत दिखाने ले जाते।
कहते—
*"देख, बीज बोने के बाद किसान बेचैन नहीं होता।
उसे भरोसा होता है कि फसल आएगी।
ज़िंदगी में भी भरोसा रखना सीख।"*
दादी धीरे से कहती—
*"और जब फसल आए, तो बाँटना मत भूलना।
जो बाँटता है, वही असली अमीर होता है।"*
---
🌟 अंत में…
आज दादा‑दादी नहीं हैं,
पर उनकी बातें अब भी मेरे कमरे की दीवारों पर गूँजती हैं।
कभी दादा की सीख, कभी दादी की हँसी…
और मैं सोचता हूँ—
कहानियाँ तो उन्होंने सुनाई थीं,
पर असल कहानी तो वो खुद थे।
---
