राही.
राही.
राही
अरब सागर की शांति में एक रोने की आवाज आ रही थी..!
उस रात अरब सागर असामान्य रूप से शांत था। लहरें मानो अपनी सांसें रोककर किसी अनजान घटना का इंतजार कर रही हों। लाइटहाउस की रोशनी धीरे-धीरे घूम रही थी, मानो अंधेरे से कह रही हो— "मैं अभी जागी हुई हूँ।"
लाइटमैन देवराज समंदर के किनारे टहल रहा था।
गीली रेत, ठंडी हवा और तरंगों की धड़कन।
अचानक…
एक नाजुक रोने की आवाज।
मानो गरजते समंदर ने कोई रहस्य जन्म दिया हो, वह आवाज तेज होती जा रही थी!!
देवराज आवाज की दिशा में भागा।
रेत पर आधी भीगी हुई एक टोकरी पड़ी थी। अंदर कंबल में लिपटा हुआ एक नवजात बच्चा ठंड से कांप रहा था। उसके रोने की नाजुक आवाज ने मानो पूरे समंदर के सन्नाटे को चीर दिया था।
उस पल समंदर की लहरें एकाएक शांत हो गईं।
देवराज ने उसे उठाया, छाती से लगाया और अपने दिल में बसा लिया।
उसने उस बच्ची का नाम रखा— राही।
क्योंकि वह समंदर की लहरों से आई थी,
और शायद जीवन के हर मोड़ पर उसे रास्ता दिखाते हुए चलती रहेगी।
राही के आने के बाद, लाइटहाउस में एक नई रोशनी आ गई थी। लाइटहाउस अब सिर्फ समंदर को नहीं, बल्कि राही को भी प्रकाश दे रहा था।
देवराज सुबह उसे खाना खिलाता,
दोपहर में उसकी तोतली बातें सुनता,
और रात को लाइट चालू करने से पहले
उसके नन्हे हाथों में अपनी उंगली थमा देता।
राही बड़ी होती गई।
वह समंदर को देखकर पूछती—
“पापा, क्या यह समंदर मुझे बुला रहा है?”
देवराज मुस्कुराता—
“हाँ, क्योंकि तुम इसकी बेटी हो।”
एक रात तूफान आया।
लाइटहाउस कांप उठा।
समंदर उग्र हो गया और आसमान को छूती लहरें उछलने लगीं।
देवराज लाइटहाउस के दीयों को बचाने के लिए भागा।
अगर लाइट बंद हो जाती, तो जहाज अंधेरे में खो जाते।
देवराज पूरी रात हवा से लड़ता रहा। बारिश की बूंदें चेहरे पर चाबुक की तरह पड़ रही थीं, फिर भी उसके हाथ दीये की लौ के चक्र से हटे नहीं। क्योंकि उसे मालूम था, यह रोशनी सिर्फ जहाजों के लिए नहीं, बल्कि कई जिंदगियों के लिए उम्मीद की किरण थी।
राही नीचे कॉटेज में रो रही थी। देवराज ने पूरी रात लाइट को जलते और घूमते रखा। सुबह जब वह भागकर अपने क्वार्टर आया, तब उसने राही को चादर में लिपटे हुए सोते देखा।
शांत, सुरक्षित, नींद में भी मुस्कुराती हुई।
मानो लाइटहाउस की रोशनी ने जहाजों को बचाया, और बदले में कुदरत ने उसकी बच्ची को संभाल लिया।
उस रात देवराज को समझ आया—
राही सिर्फ एक बच्ची नहीं,
वह उसके जीवन का प्रकाश है।
साल बीत गए।
राही अब जवान, समझदार और समंदर की तरह गहरे विचारों वाली बन चुकी थी।
देवराज भी बूढ़ा हो गया था,
लेकिन उसकी आँखों में आज भी वही प्यार था—राही के लिए, और उस लाइटहाउस के लिए।
एक शाम राही देवराज के पास आई। उसके चेहरे पर एक शांत, मीठी मुस्कान थी।
“पापा… आपने पूरी जिंदगी मुझे रोशनी दी।
अब मेरी बारी है, आपके जीवन में प्रकाश लाने की।”
देवराज हैरान रह गया।
राही ने आगे कहा—
“मैंने आपके लिए एक और बड़ी और समझदार 'राही' ढूंढ़ी है।
कोई ऐसी, जो आपको समझे,
आपकी अकेलेपन की पुकार सुने,
और आपके जीवन को फिर से जीवंत बना दे।”
उस शाम राही देवराज को समंदर किनारे ले गई।
वहाँ एक औरत खड़ी थी—
शांत, सौम्य, समंदर की लहरों जैसी नरम आँखों वाली।
उसका नाम देविला था।
देविला एक मछुआरे की विधवा बहू थी,
और लाइटहाउस के आसपास के किनारे पर अपने ससुर के साथ काम करती थी।
राही बोली,
“देविला आपको काफी समय से देख रही हैं।
आपकी निष्ठा, आपका अकेलापन,
और समंदर के लिए आपका प्यार—
उन्हें यह सब बहुत पसंद है।”
देवराज की आँखों में आँसू आ गए।
जीवन में कभी किसी ने उसे इस तरह नहीं समझा था।
कुछ महीनों बाद,
लाइटहाउस की शिखर पर—
जहाँ समंदर, आसमान और रोशनी एक-दूसरे को छूते हैं—
देवराज और देविला की शादी हो गई।
राही उनके बगल में खड़ी थी,
हंसती हुई, खुश, और गर्व से भरी हुई।
लाइटहाउस की लाइट उस रात और भी तेज गति से घूम रही थी।
मानो वह भी इस नए प्यार को आशीर्वाद दे रही हो।
देविला अब लाइटहाउस चलाती है।
देवराज शांति से समंदर को देख सकता है—
क्योंकि अब उसके पास प्यार है,
साथ है,
और एक नया जीवन है।
बेटी सिर्फ पिता के दिल का अंधेरा दूर नहीं करती;
कभी-कभी वह पिता के जीवन की लंबी रात में नया सवेरा भी ले आती है।
और उस दिन लाइटहाउस का प्रकाश समंदर के लिए नहीं, एक परिवार के लिए जगमगाया था।
हायकु (Haiku)
सागर शांत,
देविला संग प्रीत,
राही प्रकाश।
