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Kalpesh Patel

Children Stories Classics Inspirational

4.5  

Kalpesh Patel

Children Stories Classics Inspirational

श्रवणकी व्यथा

श्रवणकी व्यथा

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श्रवणकी व्यथा

श्रावण मास की भोर थी। आसमान में हल्की धुंध थी और पेड़ों पर ओस की बूंदें चमक रही थीं। श्रवण कुमार अपने बूढ़े माता‑पिता को काँधे पर लिए तीर्थयात्रा पर निकला था। वर्षों से उसकी एक ही इच्छा थी—माता‑पिता की हर अधूरी इच्छा पूरी करना।

रास्ता कठिन था। पहाड़ों की चढ़ाई, जंगलों की खामोशी और पथरीली जमीन उसके पैरों को चीरती जा रही थी। लेकिन श्रवण के चेहरे पर थकान नहीं, केवल भक्ति थी। माता‑पिता उसके कानों में धीमे से कहते—
“बेटा, थोड़ा विश्राम कर ले।”
और वह मुस्कुरा कर उत्तर देता—
“जब तक आपकी आँखों में संतोष न दिखे, मुझे विश्राम कैसा।”

उस दिन दोपहर को माता‑पिता को प्यास लगी। श्रवण पानी की तलाश में निकला। पास ही एक सरोवर था। वह कलश भरने गया। तभी जंगल में शिकार खेलते राजा दशरथ ने तीर चलाया—ध्वनि से भ्रमित होकर। तीर सीधा श्रवण के सीने में धँस गया।

वह गिर पड़ा। कलश का पानी मिट्टी में बह गया—जैसे उसकी जीवन-धारा। दर्द से कराहते हुए भी उसके होंठों पर एक ही शब्द था—
“माँ… पिता…”

राजा दौड़ा आया। श्रवण की आँखों में अब भी भक्ति की लौ जल रही थी। उसने धीमे से कहा—
“राजन… मेरे माता‑पिता… अंधे हैं… उन्हें बताना कि उनका श्रवण… पानी लेने गया था… और लौट न सका…”

उसकी आवाज टूट गई। शरीर शांत हो गया। लेकिन हवा में उसकी अंतिम व्यथा तैरती रही।

राजा दशरथ काँपते हुए माता‑पिता के पास पहुँचा। बूढ़े माता‑पिता ने पूछा—
“बेटा, पानी ले आया?”

राजा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने सत्य बताया।
माता‑पिता ने अपने काँपते हाथ आकाश की ओर उठाए—
“हे प्रभु… हमारा श्रवण तो हमारा जीवन था… उसे क्यों छीन लिया…”

उनकी चीख जंगल में गूँज उठी। श्रवण की अंतिम व्यथा अब माता‑पिता की अनंत पीड़ा बन चुकी थी।
श्रावण मास की हवा उस दिन भारी हो गई—मानो प्रकृति भी रो पड़ी हो।


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🌙 कहानी का सार

श्रावण कुमार भक्ति और सेवा का प्रतीक है।

माता‑पिता की अंतिम व्यथा—पुत्र का खो जाना—मानव हृदय की सबसे गहरी पीड़ा है।

यह कथा त्याग, प्रेम और करुणा का अमर संदेश देती है।



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