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Kalpesh Patel

Drama Classics

4  

Kalpesh Patel

Drama Classics

खाली घोंसला

खाली घोंसला

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खाली घोंसला

बरसों पहले…
मिट्टी की खुशबू में भीगते हुए, पसीने की बूंदों को माथे से पोंछते हुए,
सुषीला और सोहनलाल ने एक छोटा-सा घर बसाया था।
ईंटें उन्होंने खरीदी थीं,
पर दीवारों में सपने बच्चों ने भरे थे।

दो बच्चे—
दो नन्हे सूरज,
जिनके लिए उन्होंने अपनी हर सुबह, हर शाम, हर इच्छा कुर्बान कर दी।

धीरे-धीरे बच्चे बड़े हुए,
पंख मजबूत हुए,
और एक दिन…
वो परदेस उड़ गए।

“जाओ बेटा… दुनिया देखो… हम यहीं हैं,”
सुषीला ने मुस्कुराकर कहा था,
पर मुस्कान के पीछे छुपा था एक छोटा-सा डर—
कि कहीं ये घर… एक दिन बहुत शांत न हो जाए।

समय बीतता गया।
परदेस की चमक बच्चों को अपनी तरफ खींचती गई।
काम, पढ़ाई, करियर, रिश्ते—
सब कुछ उनके चारों तरफ घूमने लगा।

और यहाँ…
इस पुराने घर में,
सुषीला और सोहनलाल हर शाम ओटले पर बैठकर एक ही बात करते—
“कब आएँगे…?”

हवा चलती है,
पर दरवाज़ा नहीं खुलता।
सूरज ढलता है,
पर आँगन में कदमों की आहट नहीं आती।
रसोई में चूल्हा जलता है,
पर बच्चों की पसंद की खुशबू नहीं उठती।

कमरों में सब कुछ है—
पर आवाज़ें नहीं हैं।
दीवारें खड़ी हैं—
पर उन पर टँगे कैलेंडर में कोई तारीख़ लाल नहीं होती।
क्योंकि हर त्योहार…
उनके लिए सिर्फ इंतज़ार बनकर रह गया है।

“इस दिवाली तो आएँगे…”
सोहनलाल धीरे से कहता है।

“हाँ… इस बार तो ज़रूर…”
सुषीला उसकी बात पकड़कर उम्मीद बुनती है।

पर दिवाली आती है,
दीये जलते हैं,
और घर…
उसी तरह शांत रहता है।

खाली घर का सन्नाटा कभी-कभी इतना गहरा हो जाता है
कि लगता है दीवारें भी पूछ रही हों—
“कब लौटेंगे वो… जिनके लिए हम खड़े हैं?”

सुषीला हर सुबह दरवाज़े की चौखट साफ करती है—
“कभी भी आ सकते हैं…”
सोहनलाल पुराने एलबम खोलकर बैठ जाता है—
“इस दिन कितना हँसे थे…”

और दोनों…
उम्मीद को एक धागे की तरह पकड़कर
दिन काटते जाते हैं।

खाली घर…
कभी-कभी मंदिर जैसा लगता है—
शांत, पवित्र, पर अकेला।

और फिर एक शाम,
जब सूरज हल्का-सा नारंगी हो जाता है,
सुषीला कहती है—
“सोहनलाल… बच्चों को उड़ान देना हमारा धर्म था।
पर लौटना… उनका समय है।
हम बस इंतज़ार हैं…
और इंतज़ार भी एक रिश्ता होता है।”

सोहनलाल उसकी बात सुनकर मुस्कुराता है—
धीमी, थकी, पर गर्म मुस्कान।

दोनों जानते हैं—
खाली घर दुख नहीं है।
ये उस प्यार का प्रमाण है
जो इतना बड़ा था
कि बच्चों को दुनिया दे दी
और खुद को…
शांत कमरों में छोड़ दिया।

पर उम्मीद अभी भी जिंदा है।
धीमी, पर धड़कती हुई।
क्योंकि किसी भी दिन…
किसी भी शाम…
दरवाज़ा खुल सकता है।

और उस दिन—
यह खाली घर
फिर से भर जाएगा।


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