धाबा
धाबा
धाबा.
सड़क के उस लंबे, अकेले हाइवे पर एक जगह थी—जहाँ धूप भी ठहर जाती थी और छाँव भी। वहीँ पर था सरला देवी का छोटा-सा धाबा, टीन की छत, मिट्टी की दीवारें, सामने दो नीम के पेड़ और बीच में टेढ़ा-सा लकड़ी का बोर्ड:“धूप- छाँव, सरलाका, धाबा”
लोग हँसते हुए पढ़ते, फोटो खींचते, पर सरला देवी के लिए ये सिर्फ नाम नहीं था, उसकी पूरी ज़िंदगी का सार था।
धूप वाले दिनसरला देवी सुबह चार बजे उठ जाती। चूल्हे में लकड़ी सुलगती, चाय की केतली से भाप उठती, और दूर से ट्रकों की घरघराहट सुनाई देने लगती।पहला ग्राहक: आज भी सबसे पहले वही नीले ट्रक वाला रमेश आया।
“सरला दीदी, वही मसाला वाली चाय बना देना, रात भर ड्राइव किया है,” उसने थके हुए स्वर में कहा।
सरला मुस्कुराई,
“थकान चाय से नहीं, अपने लोगों की याद से उतरती है, पर चलो, चाय से शुरुआत करते हैं।”
रमेश हँस पड़ा,
“आप भी ना, धाबा चलाती हैं या दिल का क्लिनिक?”
धूप तेज़ थी, सड़क तप रही थी, पर धाबे के अंदर सरला ने छाँव जैसा माहौल बना रखा था—दीवार पर पुराने फिल्मी पोस्टर, रेडियो पर धीमी-सी पुरानी गाने, और कोने में रखा पानी का मटका, जिस पर लाल रंग से लिखा था—
“प्यास मुफ्त है, पानी भी।”
धूप वाले दिन उसके धाबे पर भीड़ ज़्यादा होती। ट्रक ड्राइवर, बस वाले, बाइक पर निकले दो दोस्त, कभी-कभी शहर से आए कोई कपल—सब उसके यहाँ रुकते।
शहर की लड़की: उस दिन एक लड़की आई, जींस-टीशर्ट में, आँखों में थकान और चेहरे पर चिड़चिड़ाहट।
“आंटी, कुछ फास्ट मिल जाएगा? हम लेट हो रहे हैं,” उसने जल्दी में कहा।सरला ने उसे देखा,
“फास्ट तो मिल जाएगा, पर पहले ये बताओ, इतनी जल्दी में भाग कहाँ रही हो?”लड़की ने झुँझलाकर कहा,
“इंटरव्यू है, लाइफ सेट करनी है, टाइम नहीं है।”
सरला ने हँसते हुए उसके सामने गरम-गरम आलू के पराँठे रख दिए, साथ में सफ़ेद मक्खन और अचार।
“लाइफ सेट करने से पहले पेट सेट कर लो बिटिया, वरना इंटरव्यू में दिमाग नहीं चलेगा।”
लड़की ने पहले तो नाखुशी से पराँठा उठाया, लेकिन पहला निवाला लेते ही उसकी आँखें थोड़ी नरम पड़ गईं।
“आंटी… ये तो बहुत अच्छा है,” उसने धीमे से कहा।सरला बोली,
“ज़िंदगी भी पराँठे जैसी होती है—बाहर से गरम, अंदर से मसालेदार।
बस जल्दी-जल्दी में इसे जला मत देना।”
धूप बाहर और तेज़ हो गई थी, पर उस लड़की के चेहरे पर अब थोड़ी छाँव उतर आई थी।छाँव वाले पलशाम होते-होते हाइवे पर ट्रैफिक कम हो जाता। सूरज ढलने लगता, नीम के पेड़ों की छाँव लंबी हो जाती, और धाबे पर एक अलग-सी शांति उतर आती।यही समय था जब सरला देवी अपने पुराने रेडियो पर भजन या कोई पुराना गीत लगा देती—
“कभी खुशी, कभी ग़म…” या “ज़िंदगी कैसी है पहेली…”एक दिन, बारिश की हल्की फुहार के बीच, एक बूढ़ा आदमी आया। उसके हाथ में पुराना बैग, आँखों में थकान और चेहरे पर एक अजीब-सी उदासी।बूढ़ा मुसाफ़िर:
“बेटी, चाय मिलेगी?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा।“मिलेगी क्यों नहीं, पर पहले ये कुर्सी पर बैठो, पैर भी तो थक गए होंगे,”
सरला ने कहा।चाय आई, साथ में दो गरम पकोड़े।
“पकोड़े नहीं माँगे थे,” बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा।“कुछ चीज़ें माँगने से नहीं, मिलने से अच्छी लगती हैं,”
सरला ने जवाब दिया।थोड़ी देर बाद उसने पूछा,
“कहाँ जा रहे हो बाबा, अकेले?”
बूढ़े ने गहरी साँस ली,
“बेटी, पहले घर जा रहा था, अब बस जा रहा हूँ। घर तो कब का छूट गया। बच्चे शहर में हैं, मैं गाँव में था… अब सोचा, कहीं और चलूँ।”सरला चुप हो गई। उसने बूढ़े के सामने प्लेट में एक और पकोड़ा रखा।
“कभी धूप, कभी छाँव, बाबा। धूप में आदमी अकेला लगता है, छाँव में यादें साथ आ जाती हैं। आप अकेले नहीं हैं, जब तक ये धाबा है, आप मेहमान हैं, मुसाफ़िर नहीं।”बूढ़े की आँखों में हल्की नमी आ गई।
“तुम्हारा नाम क्या है बेटी?”“सरला,” उसने मुस्कुराकर कहा, “सरला देवी। पर यहाँ सब मुझे ‘सरला दी’ कहते हैं।”बूढ़े ने जाते-जाते बोर्ड की तरफ देखा—“कभी धूप, कभी छाँव – सरला धाबा”—और धीमे से बोला,
“तुम्हारा धाबा नहीं, तुम्हारा दिल है ये।”सरला की अपनी कहानीकिसी ने कभी सरला से पूछा नहीं था कि उसने ये धाबा क्यों खोला। लोग बस आते, खाते, हँसते, चले जाते।एक रात, जब बारिश ज़ोरों से हो रही थी और धाबे पर सिर्फ एक बाइक वाला लड़का बैठा था, उसने पूछ ही लिया।
“आंटी, आप अकेली ये सब संभाल लेती हो, डर नहीं लगता? परिवार कहाँ है आपका?”सरला ने चूल्हे की आँच धीमी की, बाहर की बारिश देखी, और धीरे से बोली,
“परिवार था… पति ट्रक ड्राइवर थे। इसी हाइवे पर चलते थे। एक दिन लौटे ही नहीं। एक्सीडेंट हो गया। तब समझ में आया कि सड़क पर चलने वालों को एक ऐसी जगह चाहिए, जहाँ वो सिर्फ पेट नहीं, दिल भी भर सकें।”
लड़का चुप हो गया।
“फिर?”
“फिर मैंने ये धाबा खोला। पहले छोटा-सा था, सिर्फ चाय और दो पराँठे। धीरे-धीरे लोग आते गए, बातें करते गए, अपनी कहानियाँ छोड़ते गए। मुझे लगा, मैं अकेली नहीं हूँ। हर मुसाफ़िर थोड़ा-थोड़ा मेरा अपना है।”
लड़के ने धीमे से कहा,
“इसलिए आपने नाम रखा ‘कभी धूप, कभी छाँव’?”
सरला मुस्कुराई,
“हाँ। मेरे पति कहते थे,ज़िंदगी हाइवे जैसी है, कभी धूप, कभी छाँव। बस चलते रहो, कहीं न कहीं एक धाबा ज़रूर मिलेगा, जहाँ तुम थोड़ी देर के लिए अपने बोझ उतार सको।”
धूप और छाँव का धाबा समय के साथ सरला का धाबा मशहूर हो गया। गूगल मैप पर भी किसी ने डाल दिया.
“सरला धाबा – बेस्ट पराँठा, बेस्ट वाइब।”
लोग रिव्यू में लिखते:
“यहाँ खाना नहीं, सुकून मिलता है।”“आंटी की बातें चाय से ज़्यादा गरम होती हैं।”“हाइवे पर एक छोटी-सी माँ मिल जाती है।”कभी धूप में थके हुए ड्राइवर आते, कभी रात की छाँव में खोए हुए मुसाफ़िर। कोई नौकरी की चिंता लेकर, कोई प्यार की उलझन लेकर, कोई घर की याद लेकर।और हर किसी को सरला देवी एक ही बात कहती:
“बेटा, ज़िंदगी हाइवे है। तुम गाड़ी हो। धूप-छाँव मौसम है। बस स्टेयरिंग अपने हाथ से मत छोड़ना।”
एक शाम, सूरज ढल रहा था, आसमान नारंगी था, और नीम के पेड़ों की छाँव धाबे पर फैल चुकी थी। सरला ने चूल्हा बंद किया, रेडियो पर धीमी-सी धुन चल रही थी।एक छोटा बच्चा, अपने पिता के साथ आया।
“पापा, यहाँ क्यों रुके?”पिता ने बोर्ड की तरफ इशारा किया,
“देखो, लिखा है ‘कभी धूप, कभी छाँव’। ज़िंदगी समझनी हो तो ऐसे जगहों पर रुकना पड़ता है।”बच्चे ने मासूमियत से पूछा,
“ये धूप-छाँव कौन होती है?”सरला ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“जब तुम हँसते हो, वो धूप है। जब तुम रोते हो, वो छाँव है।
और जब तुम दोनों के बीच भी मुस्कुरा लेते हो,वो सरला धाबा है।”
बच्चा हँस पड़ा,
“तो मैं भी धूप-छाँव हूँ?”
“हाँ,”
सरला ने कहा, “तुम भी, मैं भी, ये हाइवे भी। हम सब कभी धूप, कभी छाँव हैं।”
हवा चली, नीम के पत्ते हिले, और टीन की छत पर हल्की-सी खनखनाहट हुई। दूर से एक ट्रक की हेडलाइट दिखी, जो धीरे-धीरे धाबे की तरफ मुड़ रही थी।सरला ने एप्रन बाँधा, चूल्हे में फिर से आग जलाई, और मुस्कुराकर बोली—
“चलो, अगला मुसाफ़िर आ गया। धूप हो या छाँव, धाबा तो हमेशा खुला रहता है।”
