अल्बम के पन्ने
अल्बम के पन्ने
अल्बम के पन्ने
शहर की एक पुरानी, संकरी गली के कोने पर ‘राजू डिजिटल स्टूडियो’ नाम की एक छोटी-सी दुकान थी।
राजू पचास की उम्र पार कर चुका था। डिजिटल कैमरे और मोबाइल फ़ोटोग्राफ़ी के इस दौर में भी उसकी दुकान में पुराने रील वाले कैमरे, लेंस, लकड़ी के फ़्रेम और पीली पड़ चुकी तस्वीरें सजी रहती थीं। दीवारों पर टंगी रंगीन और सेपिया तस्वीरें मानो बीते ज़माने की कहानियाँ सुनाती थीं।
राजू अक्सर कहा करता था—
“डिजिटल फ़ोटो सिर्फ़ इंसान की तस्वीर संभालती है, लेकिन पुरानी फ़ोटोग्राफ़्स उसके दिल और रूह को भी संभालकर रखती हैं।”
एक ढलती शाम बाहर हल्की बारिश हो रही थी। तभी एक बुज़ुर्ग महिला काँपते हाथों में धूल से भरा पुराना लिफ़ाफ़ा लिए दुकान में दाख़िल हुईं।
उनके चेहरे की झुर्रियों में वर्षों का दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
उन्होंने लिफ़ाफ़े से एक फटी और धुंधली तस्वीर निकाली और राजू के सामने रख दी।
“बेटा... क्या तुम इस तस्वीर को ठीक कर सकते हो?”
राजू ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
करीब पच्चीस साल पुरानी वह पारिवारिक तस्वीर थी। बीच में बैठी दादी, उनके पास मुस्कुराते पति-पत्नी और सामने खड़े दो छोटे बच्चे।
लेकिन समय और सीलन ने तस्वीर को बुरी तरह नुकसान पहुँचाया था। बच्चों के चेहरे लगभग मिट चुके थे और तस्वीर के कई हिस्से धुंधले हो गए थे।
बुज़ुर्ग महिला की आवाज़ भर्रा गई।
“यह मेरे परिवार की आख़िरी याद है, बेटा। मेरे दोनों बेटे बड़े होकर विदेश चले गए... फिर कभी लौटकर नहीं आए। साल भर पहले इनके पिता भी मुझे छोड़कर चले गए।”
उन्होंने तस्वीर को अपनी हथेली से सहलाया।
“अब इस खाली घर में अकेली बैठती हूँ तो लगता है... काश, अल्बम के वो पुराने पन्ने फिर से पलट पाती।”
राजू कुछ पल चुप रहा।
उसने उनकी आँखों में छिपा दर्द महसूस किया और धीरे से मुस्कुराया।
“माँ जी, आप चिंता मत कीजिए। मुझे बस दो दिन का समय दीजिए।”
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अगले दो दिनों तक राजू ने बाकी सारे काम अलग रख दिए।
उसने तस्वीर को सावधानी से स्कैन किया। बरसों के अनुभव और अपनी कला से उसने एक-एक दरार को भरना शुरू किया। मिट चुके चेहरों की रेखाएँ उभारीं, तस्वीर के धुंधले हिस्सों को साफ़ किया और उसके पुराने रंगों को फिर से जीवंत कर दिया।
फिर उसने तस्वीर को एक सुंदर लकड़ी के फ़्रेम में सजा दिया।
तीसरे दिन बुज़ुर्ग महिला स्टूडियो पहुँचीं।
राजू ने बिना कुछ कहे फ़्रेम उनके हाथों में सौंप दिया।
उन्होंने जैसे ही तस्वीर देखी, उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
तस्वीर में उनके दोनों बेटे फिर से छोटे बच्चे बनकर मुस्कुरा रहे थे। उनके पति का चेहरा भी बिल्कुल साफ़ और जीवंत दिखाई दे रहा था।
एक पल के लिए उन्हें लगा जैसे पच्चीस साल पहले का उनका घर फिर से उनके सामने जीवित हो उठा हो।
उन्होंने तस्वीर को सीने से लगा लिया।
“बेटा... तुमने तो मुझे मेरे खोए हुए अल्बम के पन्ने वापस लौटा दिए।”
उन्होंने काँपते हाथों से राजू के सिर पर हाथ रखा।
राजू ने पैसे लेने से इनकार कर दिया।
“माँ जी, यादों की कोई कीमत नहीं होती। जब भी दिल भारी हो, इस तस्वीर को देख लेना... आपका परिवार हमेशा आपके पास रहेगा।”
बुज़ुर्ग महिला की आँखों में इस बार आँसू के साथ एक हल्की मुस्कान भी थी।
वह फ़्रेम लेकर धीरे-धीरे दुकान से बाहर चली गईं।
राजू देर तक दरवाज़े पर खड़ा उन्हें देखता रहा।
उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसकी दुकान महज़ तस्वीरें खींचने या ठीक करने की जगह नहीं है।
यह तो उन लोगों की पुरानी यादों, बिछड़े रिश्तों और खोए हुए पलों को फिर से ज़िंदा करने की एक छोटी-सी जगह थी।
और शायद...
हर पुरानी तस्वीर के पीछे किसी का एक पूरा संसार छिपा होता है।

