मंज़िल
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मंज़िल
(एक खूबसूरत प्रेम कहानी)
आल्प्स पर्वतमाला के बर्फीले शिखरों पर शाम अब धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश के पश्चिमी छोर पर सूरज की आखिरी किरणें बर्फ से ढंके पहाड़ों पर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं। दूर से देखने पर ऐसा लगता था, मानो सफेद चोटियों ने सूर्यास्त का कोई गुप्त संदेश अपने हृदय में सहेज लिया हो।
पर्वाती रिसॉर्ट की स्कीइंग लिफ्ट बंद होने का समय हो चुका था। हवा में ठंड बढ़ती जा रही थी और दूर के देवदार के पेड़ों पर बर्फ के सफेद फूल खिल उठे थे।
रिक, उस रोपवे का ऑपरेटर, अपनी आखिरी केबिन की तैयारी में व्यस्त था। ये एकांत शिखर, गहरी घाटियां और आसमान को छूते तारे उसके रोजमर्रा के जीवन के साथी बन चुके थे। वह बर्फ से ठंडी पड़ी कंट्रोल पैनल पर आखिरी नजर डाल रहा था, तभी दूर से कोई दौड़ता हुआ आया।
"रिक!"
हाँफती हुई आवाज सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा। राधा।
उसके बालों पर बर्फ के नन्हे कण चिपके हुए थे और उसकी सांसें ठंडी हवा में धुएं जैसी दिख रही थीं। राधा पहाड़ों के बीच भटकने और अपनी डायरी में प्रकृति के अनछुए रूपों को कैद करने की शौकीन थी। लेकिन आज घाटी के दूसरी तरफ से लौटते समय उसे देर हो गई थी।
"प्लीज, रिक..." उसने विनती भरी नजरों से कहा, "आखिरी लिफ्ट अभी गई तो नहीं है ना?"
रिक ने घड़ी की तरफ देखा। "अभी दो मिनट बाकी हैं।"
राधा ने राहत की सांस ली। "अगर यह लिफ्ट छूट जाती, तो मुझे पूरी रात इस बर्फीले तूफान में यहीं गुजारनी पड़ती।"
रिक के चेहरे पर एक हल्का सा मुस्कान आ गई। "आखिरी लिफ्ट किसी को छोड़कर नहीं जाएगी।" उसने केबिन का दरवाजा खोला। "आइए अंदर।"
केबिन का दरवाजा बंद होते ही बाहर की कातिल ठंड कांच के उस पार रह गई। अंदर एक छोटी सी गर्माहट थी। रिक ने सिस्टम चालू किया और केबिन धीरे-धीरे स्टेशन से आगे बढ़ने लगी।
नीचे घाटी में रिसॉर्ट की छोटी-छोटी लाइटें एक-एक करके जगमगाने लगी थीं। राधा खिड़की के पास खड़ी हो गई। "कितना सुंदर है..."
रिक ने उसकी ओर देखा। "यह दृश्य मैं रोज देखता हूँ।"
राधा ने मुस्कुराकर कहा, "रोज? तो फिर शायद अब आपको इसकी खूबसूरती महसूस नहीं होती होगी।"
रिक थोड़ा चौंक गया। "ऐसा क्यों?"
"जो चीज़ रोज आसानी से मिल जाए, उसकी कीमत अक्सर हम भूल जाते हैं।"
रिक कुछ बोला नहीं। उसे पहली बार लगा कि यह लड़की सिर्फ तस्वीरें नहीं खींचती... वह दृश्यों को गहराई से समझती भी है।
तभी बाहर से हवा का एक जोरदार झोंका आया। केबिन अचानक डगमगाया। फिर—एक बड़ा झटका लगा और केबिन हवा में ही थम गई।
बत्ती एक बार झपकी... और गुल हो गई। चारों तरफ घना अंधेरा। सिर्फ खिड़की के बाहर गिरती बर्फ का हल्का सा उजाला।
राधा के चेहरे पर डर की लकीरें उभर आईं। "रिक...?"
इंटरकोम से रिक की शांत आवाज गूंजी, "घबराइए मत, राधा। सेफ्टी सिस्टम ट्रिप हुआ है। बर्फ के तूफान की वजह से लाइन में अस्थायी खराबी आ गई है।"
"लेकिन हम... यहीं बीच में अटक गए हैं?"
"हाँ।"
थोड़ी देर का सन्नाटा। फिर रिक की आवाज दोबारा आई, "लेकिन आप अकेली नहीं हैं।"
इन चार शब्दों ने उस अंधेरे केबिन में जैसे एक दीया जला दिया। बाहर बर्फ का तूफान और गहरा होता गया। रिक कंट्रोल रूम से हीटिंग सिस्टम ठीक करने की कोशिश कर रहा था, पर बिजली का प्रवाह अनियमित था।
थोड़ी देर में राधा के हाथ ठंड से कांपने लगे। उसने खुद को अपनी बाहों में समेट लिया। रिक ने कंट्रोल रूम की कांच की खिड़की से उसे देखा। एक पल के लिए उसने सोचा, फिर उसने अपनी गर्म जैकेट उतारी और इमरजेंसी रास्ते से होते हुए तुरंत केबिन तक जा पहुंचा।
उसने दरवाजा खोलकर अपनी जैकेट राधा के कंधों पर डाल दी। "यह पहन लीजिए।"
"लेकिन आप?"
"मैं इन पहाड़ों की ठंड का आदी हूँ।"
राधा ने उसकी आँखों में देखा। उन आँखों में चिंता थी, और राधा की आँखों में डर की जगह एक अनजानी सी गर्माहट उतर आई थी।
लगभग आधे घंटे के बाद तूफान थमा। रिक ने अपनी कुशलता से सिस्टम फिर से चालू किया और केबिन स्टेशन की तरफ बढ़ चली।
जब वे नीचे उतरे, तब आसमान बिल्कुल साफ था और चाँदनी छिटकी हुई थी। राधा ने जैकेट उतारकर रिक को लौटानी चाही।
"रखिए इसे," रिक ने मुस्कुराते हुए कहा, "कल सुबह जब पहली लिफ्ट खुलेगी, तब वापस कर दीजिएगा।"
राधा के चेहरे पर एक खूबसूरत मुस्कान तैर गई। "तो क्या कल सुबह फिर मिलेंगे?"
"हाँ, सुबह सात बजे। पहली लिफ्ट के साथ।"
बर्फीले आल्प्स की पहाड़ियों के बीच शुरू हुई वह रात सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि दो दिलों की एक नई और हसीन दास्तान की शुरुआत थी,जहाँ म़ंजिल कोई रास्ता नहीं, बल्कि एक-दूसरे का साथ बन चुकी थी।

