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Kalpesh Patel

Classics Inspirational

4.5  

Kalpesh Patel

Classics Inspirational

कलयुग का सूरजमुखी.

कलयुग का सूरजमुखी.

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कलयुग का सूरजमुखी

सुनहरी धूप से नहाया हुआ एक विशाल खेत था। खेत में हजारों सूरजमुखी के पौधे हवा के साथ झूमते रहते थे। सुबह सूरज पूरब से निकलता तो सभी फूल उसी दिशा में अपनी गर्दन मोड़ लेते। दोपहर में सूरज सिर के ऊपर आता तो उनकी निगाहें भी आकाश की ओर उठ जातीं। शाम होते ही सूरज पश्चिम की ओर ढलता और सभी फूल भी उसी दिशा में अपना मुख कर लेते।

यह उनका स्वभाव था। प्रकृति का नियम था।

शायद समर्पण भी।

लेकिन उसी विशाल खेत के एक कोने में सूरजमुखी का एक पौधा ऐसा था, जो बाकी सबसे बिल्कुल अलग था।

सुबह सूरज पूरब से निकलता, तो वह पौधा पश्चिम की ओर मुँह किए खड़ा रहता।

दोपहर में जब सूरज ठीक उसके ऊपर होता, तो वह अपनी गर्दन नीचे झुका लेता।

और शाम को जब सूरज पश्चिम में ढलने लगता, तब वह उल्टी दिशा में पूरब की ओर मुँह करके खड़ा हो जाता।

बाकी सूरजमुखी रोज उसे हैरानी से देखते।

एक दिन एक फूल ने आखिर पूछ ही लिया,

“भाई, तुझे हुआ क्या है? सूरज उधर है और तू इधर क्यों देख रहा है?”

दूसरे ने हँसते हुए कहा,

“कहीं इसकी गर्दन तो खराब नहीं हो गई?”

तीसरे ने व्यंग्य किया,

“सूरजमुखी होकर सूरज की तरफ देखना भी नहीं आता!”

वह अकेला पौधा चुप रहा।

उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी।

मन ही मन उसने कहा—

“तुम लोग नहीं समझोगे... यह कलयुग है।”

कई दिन तक यह सिलसिला चलता रहा।

आखिर एक दिन सूरजदेव से भी रहा नहीं गया।

उन्होंने अपनी किरणें कुछ क्षणों के लिए रोक लीं और उस पौधे से पूछा,

“हे सूरजमुखी! तुम्हारे बाकी सभी साथी मेरी ओर देखते हैं। तुम ही मुझसे मुँह क्यों फेर लेते हो? क्या तुम्हें मेरी रोशनी पसंद नहीं?”

पौधा धीरे से हिला।

“हे सूर्यदेव, आपकी रोशनी में भला क्या कमी हो सकती है? आप तो आज भी बिना किसी भेदभाव के सबको प्रकाश देते हैं। खेत हो या महल, गरीब की झोपड़ी हो या अमीर का भवन—आपकी किरणें सबके लिए समान हैं।”

सूरजदेव ने पूछा,

“फिर मुझसे यह दूरी क्यों?”

पौधे ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा,

“क्योंकि जमाना बदल गया है, देव।”

सूरजदेव को आश्चर्य हुआ।

“मेरे प्रकाश और तुम्हारे व्यवहार का जमाने से क्या संबंध?”

पौधे ने अपनी गर्दन और झुका ली।

“बहुत गहरा संबंध है।”

“बताओ।”

पौधा बोला,

“कभी इंसान अपने रिश्तों की ओर उसी तरह देखता था, जैसे हम सूरज की ओर देखते हैं। माता-पिता उसके लिए छाया थे, भाई सहारा था, बहन अपनापन थी और दोस्त मुश्किल समय का साथी।”

सूरजदेव शांत होकर सुनते रहे।

पौधे ने आगे कहा,

“लेकिन अब बहुत कुछ बदल गया है। आज बेटा बूढ़े माता-पिता से मुँह मोड़ लेता है, क्योंकि उन्हें संभालना उसे बोझ लगता है। भाई भाई का हिस्सा हड़प लेता है। रिश्ते संपत्ति के कागजों पर तौले जाते हैं। दोस्ती जरूरत तक सीमित हो गई है।”

उसकी आवाज में अब पीड़ा थी।

“और सबसे बड़ी बात, देव... आज आदमी सामने वाले के चेहरे से नहीं, उसके मतलब से रिश्ता रखता है।”

सूरजदेव ने पूछा,

“लेकिन तुम तो सूरजमुखी हो। तुम्हारा मनुष्य की दुनिया से क्या लेना-देना?”

पौधा मुस्कुराया।

“मैं उसी दुनिया के बीच खड़ा हूँ, देव। रोज देखता हूँ। खेत के रास्ते से गुजरते लोग अपने ही लोगों को कोसते हैं, किसी का हक मारने की योजना बनाते हैं, किसी को धोखा देने की बात करते हैं और फिर मंदिर जाकर सिर झुका देते हैं।”

सूरजदेव के चेहरे पर गंभीरता उतर आई।

पौधे ने कहा,

“इसलिए मैंने तय किया कि मैं भी अब नियम बदल दूँ।”

“कैसा नियम?”

“जब इंसान अपनों की ओर पीठ कर सकता है, तो मैं भी आपकी ओर पीठ करके देख सकता हूँ।”

सूरजदेव कुछ क्षण मौन रहे।

पौधे ने फिर कहा,

“लेकिन एक अंतर है, देव। इंसान जब अपनों से मुँह फेरता है, तो अक्सर स्वार्थ के कारण। मैं आपसे मुँह इसलिए फेरता हूँ कि दुनिया को उसका चेहरा दिखा सकूँ।”

“कैसा चेहरा?”

“वही चेहरा, जो आईने में देखकर इंसान खुद से भी नजरें चुराता है।”

हवा कुछ तेज चली।

खेत के हजारों सूरजमुखी एक साथ झूम उठे। सभी अब उस अकेले पौधे को देख रहे थे।

सूरजदेव की किरणें धीरे-धीरे मद्धम पड़ने लगीं।

शायद उनके पास उस पौधे के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।

शाम होने लगी।

सूरज पश्चिम में ढल गया।

खेत के सारे सूरजमुखी अपनी गर्दन पश्चिम की ओर मोड़कर डूबते सूरज को देखने लगे।

केवल वह एक पौधा पूरब की ओर मुँह किए खड़ा रहा।

एक फूल ने धीरे से पूछा,

“तू अब भी नहीं बदला?”

उस पौधे ने कोई उत्तर नहीं दिया।

वह बस खड़ा रहा—अकेला, शांत और अपनी ही दिशा में।

अंधेरा धीरे-धीरे पूरे खेत पर उतर आया।

सारे सूरजमुखी रात की नींद में झुक गए।

लेकिन वह अकेला पौधा जागता रहा।

न सूरज से नाराज होकर।

न प्रकृति से विद्रोह करके।

बल्कि एक मूक आईना बनकर।

ऐसा आईना, जिसमें शायद कलयुग का इंसान पहली बार अपना चेहरा देख सके—

क्योंकि सूरज से मुँह फेरना उतना बड़ा अपराध नहीं,
जितना अपनों से मुँह फेर लेना।



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