रुकी हुई मुस्कान..
रुकी हुई मुस्कान..
रुकी हुई मुस्कान.
“निरां और निलय की उदासी का सच”निरां को हमेशा लगता था कि
“रूठे_रब_को_मनाना आसान है,
पर किसी के चेहरे पर छिपी उदासी_को_समझना सबसे मुश्किल।
”निलय की चुप्पी उसे कई दिनों से परेशान कर रही थी।
वह मुस्कुराता था, पर उसकी मुस्कान के पीछे एक अँधेरा था—
जैसे कोई तूफ़ान भीतर ही भीतर चल रहा हो।
सच का पहला दरारएक शाम, जब आसमान धूसर था और हवा में नमी थी,
निरां ने धीरे से पूछा,
“निलय, तुम इतने बदल क्यों गए हो?”निलय ने जवाब नहीं दिया।
बस खिड़की के बाहर देखते हुए अपनी उँगलियाँ काँपने दीं।निरां उसके पास गई।
“तुम्हारी उदासी मुझे डरा देती है,” उसने कहा।
“कृपया बताओ, क्या चल रहा है?”निलय की आँखें भर आईं।
वह कुछ क्षण चुप रहा, फिर बोला—
“निरां… मुझे कैंसर है।” उदासी का असली कारणनिरां के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने निलय का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“कब पता चला?”“दो महीने पहले,” निलय ने कहा।
“मैं तुम्हें बताना चाहता था…
पर तुम्हारी आँखों में डर नहीं देखना चाहता था।
मैं खुद से लड़ रहा था,
और तुम्हें अपनी लड़ाई में घसीटना नहीं चाहता था।”निरां की आँखों से आँसू बह निकले।
“तुम अकेले क्यों लड़ रहे थे?
मैं तुम्हारी हूँ, निलय।
तुम्हारी हर साँस, हर डर, हर दर्द में साथ हूँ।”निलय ने सिर झुका लिया।
“मेरी उदासी इसी वजह से थी, निरां।
मैं तुम्हें खोने से डरता था।
मैं तुम्हें बोझ नहीं बनना चाहता था।”
उदासी का पिघलनानिरां ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
“तुम बोझ नहीं हो।
तुम मेरी दुनिया हो।
कैंसर ने तुम्हें नहीं तोड़ा,
तुम्हारी चुप्पी ने तोड़ा है।
अब से हम दोनों मिलकर लड़ेंगे।”निलय की आँखों में पहली बार उम्मीद की हल्की किरण चमकी।
जैसे किसी ने अँधेरे कमरे में छोटा‑सा दीपक जला दिया हो।
अंत — साथ की रोशनीनिरां ने कहा,
“तुम्हारी उदासी अब अकेली नहीं है।
मैं उसे अपने दिल में जगह दे रही हूँ,
ताकि वह तुम्हें कम तकलीफ़ दे।”निलय ने उसकी हथेली पर अपना हाथ रखा।
“शायद यही वजह है कि मैं अब डर नहीं रहा।
क्योंकि तुम मेरे साथ हो।”बारिश थम चुकी थी।
आसमान में हल्की धूप उभर रही थी—
और निलय की उदासी भी धीरे‑धीरे पिघल रही थी।
