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Kalpesh Patel

Classics Inspirational

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Kalpesh Patel

Classics Inspirational

लकीर

लकीर

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लकीर

नैनीताल की पहाड़ियों पर उस सुबह हल्की धुंध उतर आई थी। झील का पानी शांत था, मानो किसी पुराने रहस्य को अपने भीतर छिपाए बैठा हो। उन्हीं पहाड़ियों के बीच एक छोटी-सी बस्ती में रेखा रहती थी।

रेखा जब मात्र पाँच वर्ष की थी, तभी एक दुर्घटना में उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। उसके बाद उसका पालन-पोषण उसके मामू ने किया। मामू स्वयं कोई अमीर आदमी नहीं थे। वे एक छोटी-सी दुकान पर काम करते थे और बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे। फिर भी उन्होंने कभी रेखा को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अनाथ है।

लेकिन दुनिया इतनी दयालु नहीं थी।

स्कूल जाते समय कई बार बच्चे उसे "बेचारी अनाथ" कहकर चिढ़ाते। त्योहारों पर जब दूसरे बच्चों के माता-पिता उन्हें नए कपड़े दिलाते, तब रेखा खिड़की से बाहर झांकते हुए चुपचाप आँसू पोंछ लेती।

उसके जीवन में अभाव थे, लेकिन सपनों की कोई कमी नहीं थी।

एक दिन गाँव में एक प्रसिद्ध बूढ़ा ज्योतिषी आया। लोग दूर-दूर से अपनी किस्मत जानने उसके पास पहुँच रहे थे। उत्सुकतावश रेखा भी वहाँ चली गई।

ज्योतिषी ने उसकी छोटी-सी हथेली अपने झुर्रियों भरे हाथों में ली। कुछ क्षण तक ध्यान से देखकर उसका चेहरा गंभीर हो गया।

"बिटिया," उसने धीमे स्वर में कहा, "तेरी हथेली में धन रेखा बहुत कमजोर है। जीवन संघर्षों से भरा रहेगा। सुख और समृद्धि आसानी से नहीं मिलेंगे।"

यह सुनकर आसपास खड़े लोग सहानुभूति से उसे देखने लगे।

रेखा का चेहरा तमतमा उठा।

वह कुछ पल चुप रही, फिर पास रखे फल काटने वाले छोटे चाकू को उठाया। किसी के कुछ समझने से पहले उसने अपनी हथेली पर एक पतली-सी रेखा खींच दी।

हल्का-सा रक्त निकल आया।

सभी लोग घबरा गए।

मगर रेखा की आँखों में आँसू नहीं थे, आग थी।

उसने दृढ़ स्वर में कहा—

"अगर भगवान ने लकीर नहीं दी, तो मैं खुद बना लूँगी।"

वहाँ सन्नाटा छा गया।

बूढ़ा ज्योतिषी कुछ क्षण तक उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर आश्चर्य और चिंता दोनों थे।

लेकिन उस दिन रेखा ने केवल अपनी हथेली पर ही नहीं, अपने जीवन पर भी एक अदृश्य रेखा खींच दी थी—संघर्ष से सफलता तक की रेखा।


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समय बीतता गया।

रेखा बड़ी होती गई।

घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। कई बार स्कूल की फीस भरने के लिए मामू को उधार लेना पड़ता था। कई रातें ऐसी होतीं जब घर में केवल दाल और सूखी रोटी होती।

लेकिन रेखा ने कभी शिकायत नहीं की।

वह सुबह चार बजे उठकर पढ़ाई करती। स्कूल के बाद बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती। रात को देर तक लालटेन की रोशनी में किताबों से जूझती रहती।

कई बार थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, लेकिन वह खुद को याद दिलाती—

"भाग्य की लकीरें खुद बनानी पड़ती हैं।"

यही उसका मंत्र बन गया।

कॉलेज में दाखिला लेने का समय आया तो पैसे फिर आड़े आ गए। रिश्तेदारों ने सलाह दी—

"लड़की है, ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करेगी?"

"कोई छोटा-मोटा काम कर ले।"

"शादी कर दो, जिम्मेदारी खत्म।"

लेकिन मामू ने पहली बार सबके सामने दृढ़ता से कहा—

"मेरी बेटी पढ़ेगी। जितना पढ़ना चाहेगी।"

उस दिन रेखा ने पहली बार महसूस किया कि दुनिया में उसका कोई अपना भी है।

उसने छात्रवृत्ति हासिल की और उच्च शिक्षा के लिए निकल पड़ी।


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इसके बाद शुरू हुई असली लड़ाई।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी।

एक छोटे से किराए के कमरे में रहते हुए उसने दिन-रात मेहनत की। कभी पैसे खत्म हो जाते, कभी किताबें खरीदने के लिए भोजन तक छोड़ना पड़ता।

पहले प्रयास में असफलता मिली।

दूसरे प्रयास में भी सफलता नहीं मिली।

तीसरी बार इंटरव्यू तक पहुँचकर रह गई।

उस रात वह बहुत रोई।

उसे लगा शायद ज्योतिषी सच कह गया था।

शायद उसकी किस्मत में सचमुच सफलता नहीं थी।

लेकिन अगले ही क्षण उसे अपनी हथेली का वह पुराना निशान दिखाई दिया।

वह हल्का-सा सफेद दाग आज भी मौजूद था।

उसने आँसू पोंछे और फिर किताब खोल ली।


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चौथे प्रयास में परिणाम घोषित हुआ।

सूची में उसका नाम था।

रेखा भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गई थी।

उस दिन नैनीताल की झील के किनारे खड़ी होकर उसने आसमान की ओर देखा।

उसे लगा जैसे उसके माता-पिता कहीं ऊपर से मुस्कुरा रहे हों।

मामू की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।

वे बार-बार केवल एक ही बात कह रहे थे—

"मुझे पता था तू कर दिखाएगी।"


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कुछ वर्षों बाद रेखा ज़िला कलेक्टर बनकर वापस नैनीताल लौटी।

वह वही शहर था।

वही पहाड़।

वही झील।

वही गलियाँ।

लेकिन रेखा बदल चुकी थी।

अब लोग उसे सम्मान से देखते थे।

जिस लड़की को कभी लोग दया की दृष्टि से देखते थे, आज उसी के निर्णय पूरे जिले का भविष्य तय करते थे।

एक शाम वह अपने कार्यालय की खिड़की से झील को देख रही थी।

झील पर पड़ती सूर्यास्त की सुनहरी किरणें उसे बचपन की यादों में ले गईं।

उसे वे अकेली रातें याद आईं।

वे ताने याद आए।

वे भूखे दिन याद आए।

और वह छोटी-सी हथेली भी याद आई, जिस पर उसने एक दिन खुद अपनी तकदीर लिखने की कोशिश की थी।


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उसी दौरान एक वृद्ध व्यक्ति पेंशन संबंधी आवेदन लेकर कार्यालय पहुँचा।

फाइल उसके सामने आई।

रेखा ने जैसे ही आवेदक का नाम पढ़ा, वह ठिठक गई।

यह वही बूढ़ा ज्योतिषी था।

अब उसकी कमर झुक चुकी थी। आँखों की चमक फीकी पड़ गई थी।

रेखा ने उसे अंदर बुलवाया।

वृद्ध उसे पहचान नहीं पाया।

रेखा मुस्कुराई।

"बाबा, मुझे पहचानते हैं?"

वह उलझन में सिर हिलाने लगा।

रेखा ने अपनी हथेली उसकी ओर बढ़ा दी।

उस पुराने निशान पर उसकी नज़र टिक गई।

कुछ क्षण बाद उसकी आँखें फैल गईं।

"तू... वही लड़की?"

रेखा मुस्कुराई।

"हाँ बाबा। वही लड़की, जिसकी हथेली में धन रेखा नहीं थी।"

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।

रेखा ने आगे कहा—

"उस दिन आपकी बात ने मुझे तोड़ा नहीं, जगा दिया था। अगर आप वह बात न कहते, तो शायद मैं खुद को इतना मजबूत बनाने की ठानती भी नहीं।"

वृद्ध की आँखें भर आईं।

उसने काँपते हाथों से रेखा की हथेली थाम ली।

"बिटिया," वह बोला, "मैं सारी उम्र लोगों की हथेलियाँ पढ़ता रहा। लेकिन आज समझ आया कि सबसे बड़ी रेखा हथेली में नहीं होती।"

"फिर कहाँ होती है, बाबा?" रेखा ने पूछा।

वृद्ध ने उसकी ओर गर्व से देखते हुए कहा—

"इंसान के इरादों में।"

रेखा की आँखें भी नम हो गईं।

उसने पेंशन की फाइल पर हस्ताक्षर किए और सम्मानपूर्वक वृद्ध को विदा किया।


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उस शाम नैनीताल की झील पहले की तरह शांत थी।

फर्क सिर्फ इतना था कि आज वह एक अनाथ लड़की के अकेलेपन की नहीं, उसकी विजय की साक्षी थी।

और हवा में मानो एक संदेश तैर रहा था—

"भाग्य की लकीरें हाथों में नहीं बनतीं। वे साहस, संघर्ष और अथक मेहनत से जीवन के पन्नों पर लिखी जाती हैं।"


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✨ संदेश

भाग्य शायद हमें प्रारंभिक परिस्थितियाँ देता है, लेकिन मंज़िल नहीं।
मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता हमारे निर्णय, परिश्रम और धैर्य तय करते हैं।
जो लोग परिस्थितियों से हार नहीं मानते, वे अंततः अपनी किस्मत स्वयं लिखते हैं।



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