दासी फ़ातिमा.
दासी फ़ातिमा.
“दासी फ़ातिमा”:
मुगलिया सल्तनत का दौर था।
शाही महल रोशनी से जगमगा रहा था, मगर उन रोशनियों के पीछे कई ज़िंदगियाँ अंधेरे में कैद थीं।
उनमें से एक थी—फ़ातिमा।
एक दासी…
खामोश, झुकी हुई, मगर आँखों में अनकही कहानियाँ लिए।
कभी वह नवाब यूसुफ अली की बेटी थी।
इज़्ज़त, दौलत, शान—सब कुछ था उसके पास।
मगर एक साज़िश ने सब छीन लिया।
उसके अब्बा को गद्दार ठहराकर सरेआम मौत दी गई…
और फ़ातिमा को बेच दिया गया—उसी महल में, जहाँ कभी वह मेहमान बनकर आई थी।
साल बीतते गए।
फ़ातिमा ने बोलना कम कर दिया…
और सहना सीख लिया।
एक रात, महल में अफरा-तफरी मच गई।
शहजादा सलिम ज़हर से तड़प रहे थे।
हकीम नाकाम हो चुके थे।
मौत दरवाज़े पर खड़ी थी।
फ़ातिमा आगे बढ़ी।
“मुझे कोशिश करने दीजिए…”
दरबार में हँसी गूँज उठी—
“एक दासी… शहजादे को बचाएगी?”
मगर जब उम्मीद मरने लगे,
तो मज़ाक भी सहारा बन जाता है।
उसे इजाज़त मिल गई।
फ़ातिमा ने नब्ज़ देखी…
ज़हर पहचान लिया।
वही ज़हर…
जिससे उसके अब्बा को मारा गया था।
उसकी आँखों में एक पल के लिए आग भड़क उठी।
उसके पास दो रास्ते थे—
एक…
चुप रहे, और शहजादे को मरने दे।
दूसरा…
उसे बचाए, उसी सल्तनत के लिए, जिसने उसका सब कुछ छीन लिया।
कुछ देर बाद…
उसने काढ़ा तैयार किया।
अपने हाथों से शहजादे को पिलाया।
घंटों की जद्दोजहद के बाद—
शहजादे की साँसें लौट आईं।
महल में जश्न मनाया गया।
मगर फ़ातिमा के अंदर…
कुछ मर चुका था।
अगले दिन उसे दरबार में बुलाया गया।
“मांगो, क्या चाहती हो?” बादशाह ने पूछा।
फ़ातिमा ने पहली बार सिर उठाया—
“इंसाफ…”
दरबार खामोश हो गया।
उसने साज़िश का सच बताया।
नाम लिए… सबूत दिए।
दरबार हिल गया।
जिन लोगों ने उसके अब्बा को मरवाया था—
वही शहजादे को भी मारना चाहते थे।
कुछ ही दिनों में,
गुनहगारों को सज़ा-ए-मौत सुना दी गई।
फ़ातिमा को आज़ादी मिली।
मगर उस रात…
महल के एक कोने में
फ़ातिमा खामोशी से बैठी थी।
उसके हाथ में वही ज़हर था—
जिससे उसके अब्बा मरे थे।
उसने आसमान की ओर देखा—
“अब्बा… आज इंसाफ मिल गया…
मगर जो खोया है… वो कभी वापस नहीं आएगा…”
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
सुबह…
महल में एक और खबर फैली।
शहजादा ज़िंदा था…
मगर फ़ातिमा नहीं रही।
वह ज़हर…
जिसे उसने पहचाना था,
उसी को पीकर उसने अपनी कहानी खत्म कर दी।
महल में फिर से रौनक थी…
मगर एक कोना हमेशा के लिए सूना हो गया।
और इतिहास के पन्नों में उसका नाम नहीं लिखा गया…
मगर हवा आज भी कहती है—
“जिसने दूसरों को जिंदगी दी…
वो खुद जी नहीं पाई…”
