दस्तक जो OTP माँगे
दस्तक जो OTP माँगे
“दस्तक जो OTP माँगे"
(दस्तूर दारूवाला की व्यंग्य कहानी)
मुंबई की एक पुरानी बिल्डिंग—“अवस्ता मेंशन”—में रहते थे
दस्तूर दारूवाला।
नाम दस्तूर, आदतें बिंदास…
और रात के तीन बजे उठने की पुरानी बीमारी।
उस रात भी घड़ी ने जैसे ही तीन बजाए—
ठक… ठक…
दस्तूरजी की आँख खुल गई।
“आ गया… फिर आ गया…” उन्होंने बड़बड़ाते हुए कहा।
पिछले हफ्ते भी यही हुआ था।
दरवाज़ा खोला—
तो बाहर कोई नहीं।
लेकिन अगले दिन…
बैंक से ₹5000 गायब!
“भूत नहीं हो सकता… ये बैंक वाले ही होंगे!”
दस्तूरजी ने उसी दिन फैसला कर लिया था।
आज फिर वही दस्तक।
ठक… ठक…
दस्तूरजी धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँचे।
“कौन है?” उन्होंने पूछा।
बाहर से आवाज आई—
“सर… KYC अपडेट…”
दस्तूरजी झुंझला गए।
“अरे भाई! रात के तीन बजे KYC करने आते हो क्या?!”
कुछ पल खामोशी…
फिर आवाज आई—
“सर… अभी नहीं किया तो अकाउंट फ्रीज़ हो जाएगा…”
दस्तूरजी थोड़े डर गए।
सोचा—“चलो, देख लेते हैं…”
और दरवाज़ा खोल दिया।
सामने कोई आदमी नहीं था।
बस एक मोबाइल की स्क्रीन चमक रही थी।
“OTP बताइए, सर…”
दस्तूरजी समझे नहीं… पर घबरा गए।

“बताऊँ?”
“हाँ सर…”
और बस…
OTP बता दिया।
अगले दिन—
₹50,000 साफ!
दस्तूरजी चाय लेकर बैठे थे।
पड़ोसी ने पूछा—
“क्या हुआ?”
दस्तूरजी ने गहरी साँस ली और बोले—
“तीसरे पहर की दस्तक कभी खाली नहीं जाती…”
थोड़ा रुके…
और फिर जोड़ा—
“इस बार पूरा अकाउंट ही ले गई!”
पड़ोसी हँस पड़ा।
दस्तूरजी उठे, चश्मा ठीक किया और बोले—
“अब अगर कोई रात के तीन बजे आए ना…”
थोड़ा रुके…
“तो दरवाज़ा नहीं खोलूँगा—
सीधे WhatsApp पर ‘Seen’ कर दूँगा!”
अंत 😄
