Dr. Pradeep Kumar Sharma

Comedy

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Dr. Pradeep Kumar Sharma

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आती क्या खंडाला

आती क्या खंडाला

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"ए जी।" श्रीमती जी ने बहुत ही प्यार से कहा।

"हाँ जी, फरमाइए।" श्रीमान् जी अखबार को साइड में रखते हुए बोले।

"एक बात पूछनी थी जी आपसे।" श्रीमती जी ने सकुचाते हुए कहा।

"अरी बेगम साहिबा, आप एक तो क्या दस बात पूछिए न। पूछिए क्या पूछना है आपको ?" 

श्रीमान् जी ने अपनी पत्नी की आंखों में आंख डालते हुए कहा।

"ये वेलेन्टाईन डे क्या होता है जी।" श्रीमती जी ने एकदम सपाट लहजे में पूछा।

"क्या ? तुम वेलेन्टाईन डे के बारे में नहीं जानती ? अब क्या करेगी जानकर इस उम्र में ?" श्रीमान् जी ने सपने में भी नहीं सोचा था, कि उनकी पत्नी शादी के तीस साल बाद ऐसे प्रश्न पूछेगी।

"इस उम्र में से क्या मतलब है जी आपका ? मेरी उम्र चाहे जो भी हो, आपसे पाँच साल कम ही है। समझ गए। इसलिए उम्र की तो कभी बात ही मत करना आप।" श्रीमती जी ने डायरेक्ट धमकाने वाले लहजे में कहा।

"ओ के, ओ के डार्लिंग, सॉरी। गलती हो गई मुझसे, माफ़ कर दो।" श्रीमान् जी ने कान पकड़ कर कहा।

"ठीक है, ठीक है जी। अब तो बता दो कि ये वेलेन्टाईन डे क्या होता है ?" श्रीमती जी ने एक बार फिर से वही सवाल दोहराया।   

"क्या मैं जान सकता हूँ कि तुम ये क्यों जानना चाहती हो ?" श्रीमान् जी ने पूछा।

"आज का पूरा अखबार पटा है। टी.व्ही. पर हर पाँचवाँ विज्ञापन वेलेन्टाईन डे का ही आ रहा है, जिसे देखो वही वेलेन्टाईन डे की बात कर रहा है। लगभग सभी न्यूज़ चैनल में एक्सपर्ट डिबेट पर डिबेट किए जा रहे हैं। इसलिए मुझे भी यह जानने की इच्छा हो रही है जी कि यह है क्या बला ?" श्रीमती जी ने बच्चों की तरह उत्साहित होकर पूछा।

"कुछ नहीं बेगम साहिबा, ये सब चोंचले हैं आजकल के यूथ के। और ये सब फालतू के काम हैं। तुम इन सबके बारे में मत सोचा करो।" श्रीमान् जी ने उन्हें टालने वाले लहजे में कहा।

"अच्छा..., आप बेवकूफ समझते हैं मुझे ? आप कुछ भी बोल देंगे, तो मान लूँगी मैं ? चोंचले हैं ये सब यूथ के ? और आप क्या हैं, जो नकली दांत लगाकर और बालों की सफेदी डाई से छुपाकर पिछले हफ्तेभर से अपने स्टेटस में शेर-ओ-शायरी के साथ सेलिब्रेट कर रहे हैं ?" श्रीमती जी ने लताड़ते हुए कहा।

"अरी भागवान, तुम तो नाराज हो गई। देखो, ये वेलेन्टाईन डे इतना गंभीर विषय नहीं है कि उस पर हम दोनों आपस में ही लड़ बैठें।" श्रीमान् जी ने उन्हें एकदम कूल अंदाज में समझाने का प्रयास किया।

"अच्छा..., एक आप ही समझदार इंसान हैं इस दुनिया में ? यदि ये इतना गंभीर विषय नहीं है, तो फिर मीडिया में इतना शोर क्यों मचा है ? बताइए ज़रा मुझे ?" श्रीमती जी ने आँखें तरेरते हुए पूछा।

"अच्छा, फिर सुनो। वेलेन्टाईन डे पाश्चात्य संस्कृति की देन है। आजकल हमारे देश में भी इस दिन याने चौदह फरवरी को लोग प्यार का त्योहार मानकर सेलिब्रेट करते हैं। इस दिन प्रेमी जोड़े और विवाहित कपल्स अपने-अपने पार्टनर को तोहफे, चॉकलेट, टैडी, गुलाब वगैरह देकर प्यार का इजहार करते हैं, जश्न मनाते हैं। लोग वेलेंटाइन डे के आगे-पीछे भी सात-आठ दिन तक रोज डे, प्रपोज डे, चाकलेट डे, टैडी डे, प्रॉमिस डे, हग डे, किस डे और भी न जाने क्या-क्या डे मनाते हैं। हालांकि इन सबके पीछे ईमोशन कम मार्केट ज्यादा हावी रहता है। छोटे-बड़े सभी व्यापारी लोग अपने फायदे के लिए ऐसा माहौल बनाते हैं, जिससे हमारे देश का आम आदमी उनके झांसे में आ जाता है।" श्रीमान् जी ने संक्षिप्त में समझाने का प्रयास किया।

"अच्छा-अच्छा... ईमोशन कम मार्केट ज्यादा... व्यापारियों का झांसा... आपने कभी सेलिब्रेट किया है ऐसा ?" श्रीमती जी ने तपाक से पूछा।

श्रीमान् जी अवाक। उनको इस उम्र श्रीमती जी से ऐसे किसी प्रश्न की उम्मीद थी नहीं। पल भर सोचने के बाद बोले, "देखो डार्लिंग, हमें अलग से वेलेन्टाईन डे मनाने की क्या जरुरत है ? हमारे लिए तो रोज ही वेलेन्टाईन डे है। रोज ही रोज डे, प्रपोज डे, किस डे और वो क्या कहते हैं, हग डे है। कहां हिसाब रखते हैं इन सबका। पिछले तीस साल से हम दोनों साथ में हैं। जब भी हम एक दूसरे को गुलाब, चाकलेट या कोई भी गिफ्ट देते हैं, तो क्या केलेंडर देखकर देते हैं ? नहीं न ?"

"यही मानसिकता हमारे देश बहुसंख्यक शादीशुदा पुरुषों की रहती है। ऐसा कहकर वे अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। पत्नी, उनका क्या है ? वे तो घर की मुर्गी दाल बराबर लगती हैं न ?" श्रीमती जी ने नाराजगी भरे स्वर में कहा।

"अरे अरे, तुम तो बुरा मान गई यार। मेरा मतलब ये बिलकुल नहीं था। मुझ पर विश्वास करो, मैं ऐसा कभी नहीं सोचता।" श्रीमान् जी सफाई देते हुए बोले।

"वो तो ठीक है जी, पर आप ऐसी चिकनी-चुपड़ी बातों से मुझे बेवकूफ नहीं बना सकते‌।" आज श्रीमती जी सारा कसर निकालने के मूड में लग रही थी।

"अरे नहीं यार। मेरी ऐसी क्या मजाल कि तुम्हें बेवकूफ बनाने की कोशिश भी करूं।" श्रीमान् जी बोले।

"अच्छा तो मेरी बात ध्यान से सुनिए, फिर सोच समझकर जवाब दीजिए। आपको तो पता ही है कि हम लोग हर सोमवार को शिव जी की पूजा करते हैं, गुरुवार को लक्ष्मी जी की। करते हैं न ? अब हर सोमवार को शिव जी की पूजा करने के बाद भी महाशिवरात्रि को शिव जी की विशेष पूजा करते हैं। वैसे ही हर गुरुवार को लक्ष्मी जी की पूजा करने के बाद भी दिवाली और अगहन माह के सभी गुरुवार को हम लोग लक्ष्मी जी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं ? तब ये तो नहीं कहते कि हर सोमवार या गुरुवार को तो पूजा करते हैं, फिर महाशिवरात्रि, दिवाली या अगहन माह के गुरुवार को फिर से विशेष पूजा-अर्चना करने की क्या जरुरत है ?" श्रीमती जी ने श्रीमान् जी की आंखों में आंख डालकर पूछा।

"हूँ... बात तो तुम्हारी काबिल-ए-गौर है। वैसे हमारी शादी के बाद दोनों की नई-नई नौकरी और फिर दोनों बच्चों की परवरिश में तीस साल कैसे गुजर गए, कि पता ही न चला कि कब चाकलेट डे है, कब रोज डे और कब किस या वेलेंटाइन डे है ? अब दोनों बच्चों को सेटल करने के बाद हम दोनों एक फिर नए सिरे से जीवन की शुरुआत कर सकते हैं न ?" श्रीमान् जी ने भी श्रीमती जी की आँखों में आँख डालकर कहा।

"हूँ... लगता है अब बुढ़ापा उबाल मारने लगा है।" श्रीमती जी ने शरारती लहजे में कहा।

"सही पहचाना मैडम, तो चलें ?" श्रीमान् जी ने आँख मारते हुए पूछा।

"पर कहाँ ?" श्रीमती जी ने आश्चर्य से पूछा।

"खंडाला...?" श्रीमान् जी ने फिल्मी स्टाइल में कहा।

"खंडाला...? क्या... करेंगे जाकर वहाँ ?" 

श्रीमती जी ने भी उसी अंदाज में पूछा।

"घूमेंगे, फिरेंगे, नाचेंगे, गाएंगे, खायेंगे और...?"

"और क्या ?"

"ऐश करेंगे।"

और एक लंबे अरसे बाद मियां-बीबी दोनों ठहाका मारकर हँसने लगे। 



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