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हिमांशु द्विवेदी

Comedy


4.5  

हिमांशु द्विवेदी

Comedy


ताऊ, ताई और मैं

ताऊ, ताई और मैं

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उस दिन ऑफिस में तड़के एक ट्रेनिंग सेशन था, यही एक मात्र वजह थी कि मैं सुबह 7 बजे उठ कर अपनी दैनिक क्रियाओं में व्यस्त था। मैं बाथरूम से नहाकर बाहर निकला ही था कि अचानक माता जी मेरी तरफ भागती हुई आगे बढ़ी। उनके चेहरे पे चिंता लकीरों साफ देखी जा सकती थी। क्या हुआ, मैंंने पतलून में एक पांव डालते हुए पूछा। 

माता जी - "उनका फोन आ गया, वो आने वाले हैं।" सर्दियों की सुबह आठ बजे मेहमानों के घर पधारने का दर्द भला कौन नहीं समझेगा। शायद ये पिता जी की बातों में अतिशयोक्ति अलंकार का अत्यधिक प्रयोग ही था कि ताऊ - ताई ने सुबह आठ बजे घर आने निर्णय लिया ।


पिता जी की मानें तो वो हर रोज़ सुबह पांच बजे उठ कर योगा करते हैं, ऐसे में आठ बजे मेहमानों का आना लाज़मी है। ये बात अलग है कि उस दिन पिता जी की आंख आठ बजे ताऊ का फोन सुनकर ही खुली। खैर, पिता जी अपने बिछाए हुए जाल में फंस चुके थे और साथ में ले डूबे थे माता जी को । घर की हलचल से अंदाज़ा कुछ ऐसा था कि ताऊ - ताई शाम तक यहां से चले जाएंगे। 


इन सब बातों से परे, मैं नौ बजे ऑफिस के लिए निकल चुका था। काफी समय बाद शाम में ऑफिस से घर जल्दी आने का मौका मिला, सोचा क्यों ना आज जल्दी पहुंच कर माता जी और पिता जी के लिए टिक्की पैक करवा कर लेता जाऊं। तीन प्लेट टिक्की पैक करवा कर, सीढियां लांघता हुआ मैं बिजली की रफ्तार से घर की चौखट तक जा पहुंचा। डर था कि कहीं ये सर्द शाम टिक्की की गर्माहट को कम ना कर दे। 


माता जी ने हर रोज़ की तरह दरवाज़ा खोला, अलग था तो उनके सर पे पड़ा वो घूंघट जो उनकी आंखो तक आ रहा था और कमरे में हीटर के सामने बैठी ताई की नजर जो लगातार टकटकी लगाए दरवाज़े पे देख रही थी ।काफी दिनों बाद पूरी एक प्लेट टिक्की के जायके का लुत्फ उठाने का ख्याल धूमिल होता नज़र आ रहा था। 


ये दृश्य देख कर मैंं हतप्रभ था। ताई जी की नज़रों से बचता बचाता, मैंंने एक हाथ से माता जी का हाथ पकड़ा और उनको किचन की ओर ले गया। दूसरे हाथ से टिक्की किचन के एक कोने में टिकाते हुए मैंंने माता जी से पूछा - "ये गए नहीं अभी !"

माता जी- "कोई बात नहीं बेटा, ताई जी का व्रत है।" ये जवाब मेरे सवाल का तो नहीं था, लेकिन ना जाने क्यों एक अजीब सा सुकून देने वाला था। और पूछने पे पता चला कि मेहमान आज रात यहीं रुकेंगे और कल सुबह चले जाएंगे। 


अब बारी थी ताऊ - ताई का सामना करने की। गहरी सांस लेते हुए मैं कमरे दाखिल हुआ और ताई जी के चरणों में जा गिरा। 

पधारिए शंकराचार्य जी - ताई जी मेरी ज़ुल्फों को निहारते हुए बोलीं। ताऊ जी को कमरे से नदारद देख मैं समझ चुका था कि किचन में माता जी से बात करने के दौरान बाथरूम से वायु घूमने की आवाज़ क्यों आ रही थी। जिसका एक मतलब ये भी था कि ताऊ जी जब आएंगे तो अलग से लेंगे। इस बीच माता जी ने ताई जी का परिचय ये कहते हुए कराया की ये कवियत्री हैं, शेष परिचय ताई जी ने अगले एक घंटे में स्वयं पूरा किया। 

चेहरे पढ़ने की कला में भी मशहूर ताई जी ने माता जी और पिता जी को बताया कि लड़का आपका विद्वान है, इसके हाव भाव बता रहें कि बहुत अच्छा और समझदार है। इसके चेहरे पे एक तरह का तेज है। बहुत आस लगाए मैंंने ललचाई नज़रों से माता जी और पिता जी की तरफ देखा कि शायद कम से कम आज तो ये भी मेरी तारीफ़ में कुछ बोल ही देंगे। मगर ये हो ना सका। मेहमानों की बात काटना हमारे संस्कारों में नहीं आता, इसलिए माता जी पिता जी ने चुप रहना ही उचित समझा। खैर, ताई जी को मेरे चेहरे पे नज़र आने वाला तेज असल में बारह घंटे की नौकरी के बाद निकला हुआ तेल था, जो मेरे माथे पे नज़र आ रहा था। यहां वो मात खा गई थीं। उनकी बातों का कारवां यहीं नहीं रुका, ये मेरी नई ताई जी हैं जिनसे मैं ज़िन्दगी में पहली बार अभी एक घंटे पहले मिला हूं, लेकिन इस बीच उन्होंने अपने पूरे परिवार से रूबरू करवा दिया था। मधुर जो उनका बेटा है, बहुत मधुर गाता है। बकौल ताई जी, ' जब वो 'कसमें वादे ' गाता है तो मानो मंदिर के घंटे अपने आप हिलने लगते हैं। वो खींचता बहुत अच्छा है' । ताई जी यहां भी नहीं रुकीं, उनकी बहू यानी मधुर की पत्नी की सुंदरता की पूरी कायनात कायल है। वो एकदम दूध जैसी सफेद है और किसी अंग्रेज़ से कम नहीं लगती। साथ ही अगर ताई जी की माने तो उनका बेटा मधुर देखने में सुंदर नहीं लगता लेकिन उनको बहू सुंदर चाहिए थी, जब बहू निकले तो मोहल्ले के लोग लाइन लगाकर देखें और आगे आने वाली पीढ़ी की शक्ल और सूरत भी सुधर जाए। ऐसा मानना है हमारी पूजनीय ताई जी का। ये सब सुनकर मेरे अंदर बहू के लिए एक संवेदना तो उत्पन्न हुई लेकिन मैंंने उसे अपने अंदर ही दबा लिया। वैसे अभी कुछ ही देर पहले ताई जी ने मुझे पाश्चात्य सभ्यता के दुष्प्रभावों को विस्तार से समझाया था और अंग्रेज़ो से दूर रहने और उनकी नकल ना करने की एक दुरुस्त सलाह दी थी। ऐसे में उनकी ' अंग्रेज़ो की तरह सुंदर बहू ' वाली बात मेरे समझ से परे थी । साथ ही उनके सुंदरता के मापदंडों को भी मैं अभी समझ नहीं पाया था। अब ताई जी से मिले हुए दो घंटे बीत चुके थे और वो मुद्दे की बात पे आ गई थी। वो मेरे लिए भी अपनी बहू की तरह एक सुंदर लड़की की बायो डाटा लेकर तैयार बैठी थी। मानो मेरे विवाह की चिंता उनको अंदर ही अंदर से खोखला किए जा रही थी । ये कुछ इस तरह था जैसे उन्हें धरती पर छत्तीस नव युवकों की शादी करवाने का टारगेट मिला हुआ था। ताई जी ने बताया कि एक लड़की नजर में हैं। लंबाई में पांच फीट पांच इंच है और शरीर से हाष्ट पुष्ट और सुडौल है। लड़की में गांव वाली मजबूती है। ये व्याख्या लड़की की है या गांव की मजबूत लकड़ी की, ये तो नहीं पता मगर हां, अगर लड़की थी तो मुझे पटखनी देने के लिए पर्याप्त थी। ताई जी एक और बिंदु पे प्रकाश डाला कि बी टेक वाली लड़कियों से शादी नहीं करना चाहिए, सब भ्रष्टाचारी होती है। भ्रष्टाचारी से याद आया, ताई जी को ज़िन्दगी में सिर्फ एक चीज़ का मलाल था कि उन्हें बीजेपी से टिकट नहीं मिल पाया।


इस बीच कपड़े बदल कर मुंह हाथ धोने का ख्याल आया और मौका देख कर मैं कमरे से बाहर आया। आज घर पे मेहमान आए थे, पकवान बनने का मौका भी था और दस्तूर भी। इसी उपलक्ष्य में आज पूडी और मटर मखाने की सब्जी बनी। खाना खाने के लिए सभी लोग बैठे ही थे कि अचानक,

ताई जी : बिट्टू, भोजन मंत्र पढ़ो।

ताई जी की उम्मीदों के उलट मैंंने भोजन मंत्र का संस्कृत में उच्चारण कर दिया । और साथ में एक मंत्र एडवांस में सुबह की पूजा के लिए भी सुना दिया, कारण अगली सुबह भी ऑफिस जल्दी जाना था। उनके लिए ये वाकई हैरान करने वाला था, आजकल की जेनरेशन पर पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव को वो मुझे काफी विस्तार में समझा चुकी थी।


अब बारी थी भोजन काल के बाद वाली कक्षा की, जिसका शुभारंभ और अंत ताई जी ने एक बार फिर कई मधुर कविताओं साथ किया । इस बीच उन्होंने अपना परिचय एक बार फिर करवाया और बताया कि उनका बेटा मधुर बहुत ही मधुर गाता है, वो जब कसमें वादे गाता है तो मानो मंदिर के घंटे अपने आप हिलने लगते हैं, वो खींचता बहुत अच्छा है। उनकी बहू दूध की तरह सफेद है और अंग्रेज़ से कम नहीं लगती। साथ ही अपने बेटों की तारीफों के लंबे और टाइट पुल बांधने में उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। ये सब सुनकर मैंंने एक बार फिर माता जी और पिता जी की ओर ललचाई नज़रों से देखा कि शायद इस बार तो मेरी भी तारीफ़ हो ही जाएगी। मगर..। ख़ैर इस बीच उन्होंने लल्ला को फोन भी लगाया और फोन मेरे हाथो में पकड़ा दिया। और मैंंने और लल्ला ने कुछ इस तरह बात की जैसे हम वर्षों से एक दूसरे को जानते हैं, उस दो मिनट की बातचीत में हम एक दूसरे के घर आने और मिलने तक का प्लान बना चुके थे। असल में और कुछ बात करने के लिए था भी नहीं। इसके बाद ताई जी ने मुझे कुछ ऐसा बोला जिसे सुनकर मैं सकपका गया।

ताई जी : "हमने लल्ला को तुम्हारे बारे में बता दिया है, अब लल्ला तुम्हे देख लेगा ।" उस पल मुझे अपनी ज़िन्दगी में किए गए सारे पाप याद आ गए। शायद उनको टिक्की ना खा पाने का मलाल था या कुछ और..।

फिर जो मुझे कुछ देर बार समझ आया उससे मैं थोड़ा और सकपका गया। लल्ला मुझे मेरी शादी करवाने के लिए देखने वाला था। इस बीच मैंंने ताई जी को फोन पर किसी और से कहते हुए सुना: लड़का लंबा है, सुंदर भी है। ये सुनकर मैंंने एक बार फिर ललचाई नज़रों से माता जी पिता जी की ओर देखा कि शायद इस बार..... खैर । कमरे में मंडप लगने से पहले मैं वहां से निकल जाना चाहता था लेकिन तभी, 

ताई जी: "गाना सुनाओ।" इस बार मेरी तरफ से मोर्चा माता जी ने संभाला । समा बंध चुका था । ताई जी और आंखो तक घूंघट किए माता जी को एक साथ भजन गाते देखना अत्यंत शोभनीय था। यही मौका था कि भजन की धुन पर नाचते हुए मैं किसी भी तरह दूसरे कमरे तक पहुंच जाना चाहता था। इस बार मैंं सफल रहा और ताई जी की नज़रों से बचते हुए दूसरे कमरे में पहुंच गया । खैर, ऑफिस में कल होने वाले ट्रेनिंग सेशन के संबंध कुछ काम करने के लिए मैंंने लैपटॉप खोला ही था कि बराबर वाले मिश्रा जी ने दरवाज़े पे दस्तक दी। रात के दस बज रहे थे, मिश्रा जी दनदनाते हुए उस कमरे की ओर चल दिए जहा से कविताओं की आवाज़ आ रही थी । नए शिकार को आता देख ताई की आवाज़ की तीव्रता कई गुना बढ़ चुकी थी । इस बीच दूसरे कमरे में लैपटॉप लेकर बैठा मैं कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा था। अगली सुबह जल्दी उठने के बारे में सोचना तो दूर, फिलहाल मैं अभी सोने के बारे में भी नहीं सोच पा रहा था। घर में चार रिटायर्ड लोगों के बीच फंसने की लाचारी का अहसास काफी अलग था। दूसरे कमरे से आती आवाज़ों से प्रतीत हो रहा था कि पिता जी भी जोर आजमाइश कर रहे थे। बीच बीच में मिश्रा जी कोरस में सुर लगा रहे थे। जैसे जैसे रात ढल रही कवियों का जोश ठंडा पड़ रहा था और मैं राहत की सांस ले रहा था। कुछ देर बाद कमरे में कुछ अलग से हलचल हुई, पता चला कि कवि सम्मेलन का समापन हो रहा है। मिश्रा जी ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया और हमने सोने की तैयारी। अब आधी रात का वक्त था और मैंं ताई जी के सामने पड़ने का दुस्साहस नहीं कर सकता था, इसलिए सीधे रजाई में घुस जाना चाहता था। सिर्फ एक रात की बात है ये सोचकर मैं भी सुबह छः बजे का अलार्म लगाकर सो गया। 


अगली सुबह:


सोचा जब तक ताई जी सुबह उठेगीं तब तक अपना काम निपटा कर ऑफिस निकल जाऊंगा । सुबह नौ बजे ऑफिस पहुंचना था ऐसे में ताई जी के सामने पड़ने का साहस नहीं था। सुबह छह बजे अलार्म की आवाज़ कानों में पड़ी, अलार्म बंद करते ही एक और आवाज़ कानों में पड़ी। जी हां, ये थी ताई जी के भजन गुनगुनाने की आवाज़, ज़िन्दगी में मैंंने खुद को कभी इतना लाचार महसूस नहीं किया था। अब कमरे से बाहर निकालने में डर लग रहा था, अगर ताई जी ने रोक लिया तो नौ यही बजेगा। कमरे से बाहर निकलने की कोशिश में कई बार चौखट तक जाकर वापिस लौट गया। हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। पेट में वायु घूमने का सिलसिला शुरू हो चुका था और प्रेशर साफ तौर पे फील किया जा सकता था। अब मुझे किसी भी हालत में कमरे से बाहर निकलकर संडास तक जाना था। ज़िन्दगी में अभी तक की गई पढ़ाई और साइंस पहली बार काम आने वाली थी। एक बात साफ थी, अगर कमरे से निकलकर तेज गति से संडास की तरफ सीधे चला जाऊं जिसकी दूरी कमरे से तकरीबन पंद्रह फीट है, तो ताई जी की नज़रों से बचा जा सकता है। एक गहरी सांस भरी और सीधे संडास की तरफ तेज गति से दौड़ लगाई। मेरी पढ़ाई रंग ला रही थी, गति अच्छी थी, दूरी का हिसाब भी सही लग रहा था और ऐसा लगा कि अब मैं संडास तक पहुंच ही जाऊंगा। जैसे जैसे मैं संडास के दरवाज़े के करीब पहुंच रहा था वैसे वैसे मेरा प्रेशर बढ़ रहा था जैसे वो निकलने को बेताब हो। मैंंने दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पीछे से आवाज़ आई, अरे बिट्टूूूूूू.....! लग गई...मेरे मुंह से निकला। प्रेशर अपने मुहाने पे निकलने के लिए तैयार था ऐसे में ताई जी के बुलावे की कीमत में बहुत अच्छे से जानता था। लेकिन जवाब देना मजबूरी थी। अतिथि देवो भव:। कच्छे का क्या था वो तो धुल जाता। मैंं रुका, पलटा और ताई जी की तरफ बढ़ा.

मैंं: "जी ताई जी"

ताई जी: "तो बेटा क्या सोचा ?"

मैंं: "किस बारे में."

ताई जी: "शादी के बारे में"

ये सुनकर मेरे चेहरे की हवाइयां उड़ चुकी थी। 

ताई जी: "कैसी लड़की चाहिए ?"

इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाता 

ताई जी: "शादी तो करोगे ना?"

यही वो मौका था जब पहले सवाल के डिटेल्ड डिस्कशन से बचकर अपना समय और अपना कच्छा दोनों बर्बाद होने से बचा सकता था।

मैंंने तपाक से जवाब दिया: "नहीं करूंगा।"

ताई जी ने एक बार फिर लड़की का बायो डाटा दोहराया: लड़की लंबाई में पांच फीट पांच इंच है और शरीर से हष्ट पुष्ट और सुडौल है। लड़की में गांव वाली मजबूती है। 

ऐसा पहली बार हुआ था कि सुबह सात बजे कोई मेरी शादी को लेकर तत्पर था और मैं संडास जाने को लेकर। 

कुछ देर बाद:

मैं ऑफिस जाने के लिए तैयार था। ब्रेकफास्ट के दौरान के एक बार फिर ताई जी से सामना हो रहा था । 

ताई जी: "बिट्टू तुमने गाना नहीं सुनाया."

मैंं: "हम्म"

ताई जी: "बेटा, हमारा लड़का मधुर...कसमे वादे...मंदिर...घंटा...खींचता"

मैं: "हम्म"


मेरे ऑफिस निकलने से पहले ताऊ ने मुझसे अपने गंतव्य तक जाने का तरीका, उचित समय इत्यादि की जानकारी ली। अब ये निश्चित हो चुका था कि अतिथि आज चले जाएंगे।

मैंंने भी निकलने से पहले ताऊ ताई की चरण स्पर्श कर तरीके से विदा ली। फिर जल्दी अाइएगा वाली फॉर्मेलिटी करनी हमारे यहां ज़रूरी होती है, सो वो भी मैंंने कर दी। हालांकि ये कहते वक्त मैंंने उनके जवाब का इंतज़ार नहीं किया और चलता बना। आज दोपहर तक उनके यहां से निकलने का कार्यक्रम था।


तो इस तरह पिछले चौबीस घंटे नए नवेले ताऊ ताई के साथ बिताकर काफी अलग महसूस कर रहा था। आज भी ऑफिस जल्दी पहुंचने के बाद घर वापसी भी कुछ जल्दी हो रही थी। माथे पे आज भी कुछ था, तेज या तेल नहीं पता।

घर पहुंचा, रोज़ की तरह माता जी ने दरवाज़ा खोला लेकिन उनके सर पर आंखो तक आता वो घूंघट आज भी था। इससे पहले कि मैंं कुछ समझ पाता, एक आवाज़ कानों में पड़ी, अरे बिट्टू, आज टिक्की नहीं लाए क्या....।


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