अधूरी कहानी...

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राजा-रानी की कहानियां आपने बहुत सुन रखी हैं, आज आप तो भीखू की कहानी सुनिए! जैसे अपने मूड को बदलने के लिए आप कभी-कभी भारतीय संस्कृति पर तरस खा कर शास्त्रीय संगीत सुन लेते हैं। वैसे ही सही...

भीखू एक शहर में रहता है। (शहर का नाम शरारतन आपको नहीं बताया जा रहा है।) वह यहां बिन बुलाया मेहमान था। भीखू शहर को बर्दाश्त कर रहा था या शहर भीखू को यह बता पाना जरा मुश्किल है। भीखू इस देश का होकर भी इस देश का नहीं है, क्योंकि उसके पास वोटर कार्ड नहीं है। इस वक्त शहर के एक अति व्यस्त बाजार की एक सड़क फिलहाल फौरी तौर पर उसका ठिकाना बनी हुई है। (सड़क का नाम इरादतन आपको नहीं बताया जा रहा है।) तो भीखू की कहानी शुरू होती है अब...

भीखू अगर अपनी वाली पर आ जाए, तो क्या नहीं कर सकता! यह कोरी डींग नहीं साहब! अभी पिछले दिनों की बात है, भीखू ने बहुत ही नाटकीयता से पुलिसवाले की जेब से  पैसे निकलवा ही लिए। सहसा घटित हुए विश्व के इस आठवें आश्चर्य पर उसके संगी-साथियों की आंखें फटी की फटी रह गईं। इस घटना से भले ही अघोषित रूप से ही सही, मगर भीखू की हैसियत अपने बिरादरी वालों में राजा की सी हो गई। वैसे, वह है भी अपने मन का राजा। अपने मन की सुनता है, अपने मन की करता है। मन हुआ तो आज का धंधा किया, नहीं तो आरामतलबी से सौदा कर दिन को खूंटी पर टांग  पांव पसार सो गया। मन आया तो पहर दो पहर मांगा, नहीं तो लगा अखबार बांचने (पुराना ही सही)। ऐसे ही एक दिन भीखू को अखबार बांचते एक राहगीर ने देखा तो ऐसे भड़का गोकि जिले के कप्तान को दौरे पर थानेदार साहब सोते हुए मिल गए हों। वह बड़बड़ाया, ‘अगर पढे़-लिखे हो तो कोई काम करो!’ राहगीर की धमकी रूपी यह नसीहत भीखू के सिर के ऊपर से निकल गई, क्योंकि भीखू को उसकी बातें भरी दोपहरिया में किसी चलती हुई गाड़ी की जलती हुई हैडलाइट सरीखी नितांत बेतुकी लगी। मगर राहगीर की इसी एक बात को थोड़ी-बहुत रद्दो-बदल के साथ बार-बार दोहराने पर भीखू को आखिरकार बोलना ही पड़ा। वह जो बोला, उसे सुन राहगीर ने फिर उस राह से कभी न गुजरने की कसम खाई। भीखू ने उससे कहा था, ‘कुछ मालूम है आपको, इस समय देश में बेरोजगारी दर कितनी है? उसी का मैं भी एक हिस्सा हूं। मुझे उसमें से अलग क्यों करते हो भाई? बेरोजगारों में मेरी भी गिनती करो न!’

भीखू को मात्र भिखारी कहना उसके साथ अन्याय होगा। भीखू को एक शाही भिखारी कहना ही उचित जान पड़ता है। भिखारी के आगे शाही!!! आप इसे जनता के साथ दी जाने वाली जनार्दन की विरुदावली जैसा कोई कर्मकांडी उपक्रम न समझें, न ही तो भीखू के साथ किया गया कोई निष्ठुर प्रहसन ही। बल्कि इस शाही शब्द के सहारे उसकी शख़्सियत को सामने लाने की एक ईमानदार कोशिश की गई है। क्योंकि उसके मांगने में गिड़गिड़ाने का भाव न होता। न ही तो मांगते वक्त वह कहीं से याचक ही लगता। इस बाबत उसके कुछ संगी-साथियों का मत है थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा होने के कारण ससुरे में अकड़ आ गई है। वह कक्षा आठ तक पढ़ा है या कक्षा दस तक इसको लेकर उनके बीच संशय था। नक्कू तो खुले आम कहता फिरता है,‘पढ़ने के कारण आदमी का दिमाग फिर जाता है...फिर वह अपनी माटी की ही मिट्टी पलीद करता है।’ नक्कू उसका चिरप्रतिद्धंद्वी है। न चाहते हुए भी नक्कू को भीखू का मुंह रोज ही देखना पड़ता है, क्योंकि दोनों एक ही सड़क पर एक-दूसरे के आमने-सामने ही बैठे हैं। आसपास के सारे भिखारियों में नक्कू की आय सबसे ज्यादा है, क्योंकि वह तरह-तरह के स्वांग कर लेता है। भीख मांगते वक्त कभी उसकी मां मरती, तो कभी बाप। कभी उसका हाथ टूटा होता, तो कभी टांग। कभी उसका बेटा बीमार होता तो कभी बीवी। अपने साथियों की बस एक फरमाइश पर वह अपने आंखों से गंगा-जमुना की धार निकाल देता। उसका यह हुनर उसके साथियों के मनोरंजन का सबब था। रात को नक्कू जब ठेक से लौट कर आता तो बहुत कोहराम मचता। आसमान की ओर देख जोर-जोर से चिल्लाते हुए कहता,‘ देख! देख! तू ही नहीं लीला रचता है...मैं भी रचता हूं...मगर तू भगवान और मैं भिखारी...’ फिर फूट-फूट रोता। मगर जब बात आती है साख की, तो नक्कू भीखू से कोसों दूर ठहरता। इस कारण से भी नक्कू भीखू पर ताने मारने का कोई मौका न चूकता। 

भीखू को ताने खिलाने का एक वजह और थी। वह थी, भीखू की कठ-काठी। दोहरे बदन का भीखू। देखने में सुदर्शन। बड़ी-बड़ी आंखें किसी बैल की तरह। आवाज में खनक। सांड़ जैसी ठसक। नूरा, कालू, मुन्ना जैसे कई दूसरे भिखारी भीखू के पीठ पीछे दबी जुबान में कहते भी थे कि अगर इसको धो-पोंछ कर खड़ा कर दिया जाए तो बिल्कुल राजकुमार लगेगा। मगर भीखू इन सब बातों से बेपरवाह अपनी ही दुनिया में खोया रहता। भीखू के इस बैलोस अंदाज से नक्कू जैसे कुछ दूसरे भिखारी को बहुत ईर्ष्या होती। आखिर अभाव में कोई ऐसे-कैसे बेफिक्री से रह सकता है! मगर इसी रहन-अंदाज के चलते भीखू वहीं कुछ दूसरे भिखारी साथियों का आदर्श भी बन बैठा था। भीखू उनके मरे हुए स्वाभिमान का प्रतीक था। अपने मुश्किल घड़ी में वह भीखू का याद कर अपना मनोबल बढ़ाते। मगर भीखू की अपनी इस आदत पर उसे अकसर लोगों के तीखे और व्यंग्य बुझी बातों के तीर भी झेलने पड़ते, जो उसे भीख न मिलने की क्षतिपूर्ति के रूप में मिला करते। मगर मजाल है भीखू ने कभी अपनी टेक छोड़ी हो। वह आज की राजनीति में आई हुई निर्लज्जता की तरह अटल-अडिग रहता। रत्ती भर भी जो डिगा, वो भीखू नहीं। अपनी इस हेकड़ी को (जी हां... उसके मांगने की इस अदा को कुछ लोग हेकड़ी कहते हैं ) वह अपनी प्रकृति, अपनी माटी बताता है। जब किसी ने भीखू की इस हेकड़ी पर ऐतराज जताता, तो भिखू उसे लम्बा चौड़ा लेक्चर पिला देता। लेक्चर कुछ यूं होता- ‘अरे साहब, हर कोई किसी न किसी से मांगता ही है। फिर मांगने में शर्म कैसी! सब अपने-अपने भगवान से मांगते है। मैं भगवान के बनाये बंदों से मांगता हूं। मालूम है, भगवान मुझे मोटर-बंगला देने से रहा। जब ये सब देगा नहीं, तब एक-दो रुपया  के लिए इतने बडे़ भगवान को क्या तंग करना! क्या साहब, सरकार विकास के नाम पर मांगे तो अनुदान, व्यापारी व्यापार बढ़ाने के नाम पर मांगे तो लोन, पंडित-पंडा मंदिर बनवाने के नाम पर मांगे तो दान, कमेटियां त्योहार के नाम पर मांगें तो चंदा, नेता प्रजातंत्र के नाम पर मांगे तो वोट, लड़के का बाप शादी के नाम पर मांगे तो दहेज, सरकारी साहब काम करने के नाम पर मांगें तो घूस और जब भीखू जैसा कोई गरीब मांगे तो ... तो आक्क थूऽऽऽ...पेशा और पोशाक बदल जाने से हमारे साथ इतना बड़ा अन्याय! हम भी तो आपके चिल्लरों के बदले आपको दुआएं देते हैं सरकार! जब अपने यहां आया हुआ कोई विदेशी मेहमान खूब सारा रुपया देता है, तो आप सब तालियां पीटते हो। जब हम आप से अपनी मदद की गुहार लगाते हैं, तो भिखारी कहकर लानत भेजते हो...क्या साहब! मांगतों के देश के एक गरीब मजबूर की मन्नत जल्दी से पूरी करो न!’

 लेक्चर काफी लंबा होता। इसलिए सब का सब यहां नहीं दिया जा सकता। उसका लेक्चर सुन कुछ राहगीर अपने अपशब्दों की बौछार से उसे भीगते हुए आगे बढ़ जाते, तो कुछ अपना पिंड छुड़ाने के लिए उसकी तरफ चिल्लर उछाल देते। मगर अधिकतर राहगीर थोड़ी देर वहीं रुक कर उसके लेक्चर का मजा उसी तरह से लेते जैसे रति क्रिया के परिणामस्वरूप कुत्ते-कुतिया के एक-दूसरे से आबद्ध होने पर गली-मोहल्ले के लौंडे लेते हैं।

भीखू जहां बैठा करता, वह इलाका काफी चर्चित हो गया था। आसपास के दूसरे इलाकों में भी भीखू की चर्चा होने लगी। न सिर्फ भिखारियों के बीच, बल्कि संभ्रांत लोगों के बीच भी। लेकिन भीखू की इस ख्याति कि वजह से आसपास के रहवासी खुश नहीं थे। भीखू उनके लिए एक फूहड़ आइटम सांग के मानिंद था, जो यकीनन ही किसी फिल्म की तरह उनके इलाके का चर्चित तो कर रहा था, मगर था तो वह अश्लील और आपत्तिजनक ही। कई बार तो भीखू के मुंह से निकले एकाध अंगरेजी के शब्द उनके जले पर नमक छिड़कने का काम करते। इसका नतीजा यह निकला कि भले ही अस्फुट ही सही, मगर भीखू के विरोध के स्वर उसके इलाके में उठने लगे। वह कहते भी है कि जो चीज आपकी विशेषता होती है, वही चीज कमजोरी भी बन सकती है। जो जहर सांप की रक्षा करता है, उस जहर के लिए सांप को मारा भी जाता है। भीखू की हेकड़ी, प्रकृति या आदत जो भी कहें, उस पर भारी पड़ने लगी। भीखू का अधिकारपूर्वक मांगना धीरे-धीरे लोगों को अखरने लगा। इलाके के लोगों का मानना था कि वह अधिकारपूर्वक कैसे मांग सकता है। क्या वह कोई राजनेता का वारिस है? या मंदी की मार खाई हुई मल्‍टीनेशनल कंपनी कोई? कुछ टाई पहने हुए बाबू लोग हंस कर व्यंग्य किया करते थे कि जनाब भीख नहीं बेल आउट पैकेज मांगते हैं। जो भी हो, कुल मिला कर भीखू की आमदनी (जिसे भीखू मेहनताना कहता) बहुत कम हो गई। इतना ही नहीं, जब कोई अनजान राहगीर रुक कर अगर भीखू को कुछ पैसे देता तो आसपास के दुकानदार हो-हल्ला मचाकर उसे ऐसा करने से मना कर देते। देश की राजनीति में साधारण कार्यकर्ता से नेता बनने के स्वस्थ-सुलभ अवसर की तरह से धीरे-धीरे भीखू की आय कम से कमतर होती चली गई। नतीजतन भीखू के दिन उपवास के सहारे दिन गुजरते लगे।

तदुपरांत भीखू को कुछ दूसरे भिखारियों से मुफ्त में सुझाव मिलने लगे। जैसे, वह अपना स्वभाव बदल ले! मांगने की अदा बदल ले! गरीबी और अकड़ दोनों साथ नहीं चल सकती! नाज और नखरे तो अमीरों को ही शोभा देते हैं! वगैरह। मगर बेपरवाह भीखू  उनकी बातों पर कान न धराता। वह जानता था, उन सबकी बातों में कितना दूध है और कितना पानी है। जब कोई उसका साथी भिखारी उसे फिरीफंड में सलाह देता तो भीखू के ये बोल फूटते,‘ सब स्याले, किसी घुटे नेता की तरह ही विदेश से काले धन को लाने की बात करते हैं।’ भीखू का यह वाक्य उसके ह्रदय से निकलता तो जरूर था, मगर मुख से बाहर न आता था। वह नहीं चाहता उसके कारन उसके साथियों का दिल दुखे। पहले-पहल तो अपने साथियों द्वारा उसे खूब सुझाव मिले, मगर हाल के दिनों में धीरे-धीरे सुझाव की जगह उसे तिरस्कार मिलने लगा। इसकी एक वजह तो यह थी कि भीखू द्वारा उनके किसी भी सुझाव पर अमल न करने से वे सब अपने को उपेक्षित समझने लगे। इसकी दूसरी वजह यह थी कि उनके इलाके में इन दिनों कुछ नये भिखारी भी आ जमे थे। लिहाज उनके बीच प्रतिस्पर्धा और कड़ी हो चली थी। ऐसी गला काट प्रतियोगिता में भीखू का बाहर होना उनके जमने की संभावना को बल देता था।

भीखू तेजी से कमजोर होने लगा। क्योंकि वह अकसर ही भूखा रहने लगा। इस बात पर उसके संगी साथी खुश होने लगे। मगर इसके साथ ही वे उसकी बिगड़ती हालत पर अफसोस भी जताते। उनकी खुशी भी सच्ची थी, और अफसोस भी। अभाव के पहाड़ को काटते-काटते कब ये सब खुद भी पत्थर के हो चले थे इन्हें स्वयं ही पता नहीं था! लेकिन वह पत्थर जिसके नीचे संभावनाओं से भरी हुई मासूम कोमल दूब उगी रहती है। जैसे, पेट्रोल के बढ़े दाम अपने साथ कई चीजों के दाम भी बढ़वा देता है, वैसे ही कमजोरी अपने साथ भीखू के शरीर में कई बीमारियां भी लाई। उसकी हालत पर तरस खाकर एक दिन उसका चिर प्रतिद्वंद्वी नक्कू वहीं सड़क की दूसरी तरह से ऊंची आवाज से बोला, ‘तू भी लोगों की आंखों में धूल झोंक, क्योंकि धूल झांकने वाला इस देश में कभी भी धूल नहीं फांकता।’ यह सुनकर भीखू मुस्कुराया तो जरूर मगर उसने उसकी सलाह को अपने शरीर पर बैठती मक्खी की तरह उड़ा दिया।

भीखू अपनी ही माटी का बना था। मगर अब माटी झरने लगी थी। बाजार में खरीदार बढ़ने के बावजूद उसकी घटती आमदनी में कोई परिवर्तन नहीं आया। बाजार की रौनक के बीच वह गृह उद्योग की तरह पस्त पढ़ा था। इधर नई-नई इमारतें बन रही थी तो उसके आस-पास नये-नये अपरिचित भिखारियों की नई खेप भी आ रही थी। देखते ही देखते उसके कितना कुछ बदल गया था। पैसे उगलने वाली कितने मशीनें लग गई थी। जिसके सामने चमचमाती हुई कारें रुकती और उसमें एक कार्ड डालने से भक्क से रुपया बाहर आ जाता। इस दृश्य को देखकर सारे भिखारी हतप्रभ रह जाते। मगर भीखू सोच में पड़ जाता। वह सोचता कि इनके पास इतने पैसे हैं तो फिर इन्हें इतने पैसे क्यों चाहिए! वह कल्पना करता कि पैसे उगलने वाली मशीन के बगल में एक रोटी उगलने वाली भी मशीन भी लगी हुई है। जिसमें एक भूखा अपनी जुबान घुसेड़े कर निकला लेता है फिर उसमें से लपलप रोटियां बाहर आ रही है। ‘ये गलत-सलत मशीनें कौन बनवा रहा है!’ वह बोला। मगर गाडियों की चिलपों में उसे कोई सुन न सका। उसने महसूस किया कि इधर नये-नये माल और अंगरेजी शराबों की कितनी दुकानें खुलती जा रही है। वह सारा-सारा दिन उन मजदूरों को देखता रहता, जो यहां काम करने के लिए किसी दूसरे प्रदेश से आए हुए थे। वे ईंटों से बने उनके अस्थायी घरों को देखता तो दूसरी तरफ आसमान को चूमती हुई इमारतों को! जब रोशनी बढ़ रही है, तो दिनों दिन रात और स्याह क्यों होती जा रही! भीखू हाल के दिनों में आए इस परिवर्तन को समझने की कोशिश करता मगर उसकी समझ में कुछ न आता। बरसों हो गए इस जगह बैठते हुए। पहले उन्हें कोई नहीं भागता था। मगर अब समय-समय पर किसी दस्ते द्वारा उन्हें खदेड़ा जाता है। अब अगर कोई भीख देता है, तो इन सब की तरह देखता तक नहीं, जबकि पहले ऐसा नहीं था। भीख मिले या न मिले मगर कोई न कोई संवाद जरूर होता था। भले ही वह प्रवचन के रूप में हो या डांट-फटकार के रूप में।  मगर अब भीख देने वाले उनकी तरफ नजरें भी उठा कर नहीं देखते! फिर उसे सहसा याद आया कि अरे पेड़ कितने कट गए हैं। उसने इधर-उधर अपनी नजरें घुमाई। स्मृतियों में गिनने लगा... एक ..दो ... यकायक उसे लगा कि वह यहां पर अजनबी है...  

भीखू की तबीयत दिनों दिन बिगड़ती चली गई। दस साल पहले वाले और आज के भीखू में जमीन आसमान का अंतर था। आखिर एक दिन जब खांसते-खँखारते, हांफते-कांखते भीखू थक कर पस्त हो गया, तो उसे अस्पताल की ओर रुख करना पड़ा। सरकारी अस्पताल। यह तो गजब बात हो रही थी! भीखू बीमारी से ज्यादा इलाज करने से खौफ खा रहा था। वह उठते-उठते उठा। वह धीरे-धीरे अस्पताल की ओर चलने लगा। इस समय अगर सरकारी योजना उसकी चलने की रफ्तार देख ले तो उसे भी अपने ऊपर घमंड हो जाए! पहुंचते-पहुंचते आखिर अस्पताल पहुंच ही गया। अस्पताल में घुसते ही उसके आंखों के सामने अंधेरा छा गया क्योंकि वहां के अफरा-तफरी वाले दृश्य ने उसके भयावह भूतकाल को सशरीर उसके सामने लाकर खड़ा कर दिया था। उसे लगा कि जैसे बाढ़ आई हुई हो और हेलिकॉप्टर से आलू-पूड़ी का पैकेट गिराया जा रहा हो जिसे पाने के लिए सब आसमान की ओर हाथ बढ़ाये एक-दूसरे को धकियाते हुए भाग रहे हो! यह मनहूस बाढ़ ही तो थी जिसके जलप्रवाह ने एक झटके से सब कुछ बदल दिया था। अब काल प्रवाह में कल का भीखा कुर्मी अपनी मिट्टी से बिछड़ कर इस शिष्ट शहर में भीखू नाम से बहता हुआ एक अवशिष्ट है। इस बार सब्जियां कितनी उतरी हैं! तनिक देख तो जरा! अरे ओ भीखा! भीखा! जैसे कुंए में कोई आवाज गूंज रही हो! एक धक्के से भीखू की चेतना लौटी जो अभी-अभी उसे जाते हुए एक वार्ड बाय ने ‘किनारे हटो!’ कह कर दिया है। उसे अब अस्पताल में भिनभिनाती हुई अनगिनत आवाजें स्पष्ट सुनाई दे रही हैं।

अस्पताल में भीखू ने अपना पर्चा बनवाने के लिए महाभारत का युद्ध लड़ा। डाक्टर दिख जाए इसके लिए रामायण की चौपाइयां पढ़ी। पूछते-पाछते वह संबंधित डाक्टर के पास पहुंच ही गया। डाक्टर साहब के दिखते ही वह ऐसे खुश हुआ कि मानो  कड़ाके की ठंड में किसी भटकते बेसहारे को रैन बसेरे में सिर छुपाने की जगह मिल गई हो। जबकि उसके आगे अभी दिखाने वालों की लंबी कतार थी। कतार में खडे़-खडे़ भीखू को यह डर सता रहा था कि कहीं उसका नंबर आने तक डाक्टर साहब उठ न जाए। तो दूसरी तरफ उसे यह आशंका सता रही थी कि नंबर आने तक कहीं वही उठ न जाए! उसे वहां फैली हुई गंध बहुत ही नागवार गुजर रही थी। उसका दमघुटा जा रहा था। एक बार मन में आया की लौट जाए। फिर सोचा जब इतने कष्ट उठा ही लिए तो थोड़ा सा और उठा लिया जाए। समय काटने की गरज से वह इधर-उधर देखने लगा। सब तरह उसे बदहवास चेहरे भागते-दौड़ते दिख रहे थे। उसे अचानक बाजार की याद आ गई। वह सोचने लगा कि बाजार में ज्यादा भीड़ है कि अस्पताल में। भीखू का कष्ट भले न कम हुआ हो मगर यह राहत की बात थी कि अब उसके ओर डाक्टर के बीच कोई नहीं था। डाक्टर ने भीखू को देखा। अभी तो वैसे ही देखा। जैसे, चलती मर्सीडीज के सामने अचानक आवारा मरियल कुत्ता आ जाने पर कार मालिक का देखना। थोड़ा समय लेने के बाद फिर डाक्टर सहज हुआ। डाक्टर ने पूछा, ‘क्या तकलीफ है?’ और भीखू का जवाब सुने बिना ही, उसके सीने से आला सटा दिया। भीखू की पसलियां गांव के खड़ंजे में टुटही जीप की तरह से उछल रही थीं। डाक्टर जब आला लाकर कर कुछ सुनने-समझने की कोशिश कर रहा था, ठीक उसी वक्त वह थोड़ा सा टेढ़ा होकर भीखू के पीछे लगी हुई कतार पर एक नजर मारी। भीखू ने मरमरे स्वर में बहुत कुछ कहा, मगर बहुत कुछ अनकहा भी रह गया। जैसे, किसी बडे़ अफसर के पास पहुंचे किसी आम शिकायतकर्ता का अपना दुखड़ा सुनाना। मगर बडे़ साहब के इकबाल के खौफ के चलते हड़बड़ाहट में अनर्गल प्रलाप करना और असल बात बाकी रह जाना। भीखू यथाशक्ति लगाकर बोल रहा था और डाक्टर अपना सिर झुकाए पर्चे पर कुछ लिखता जा रहा था। एक पल को भीखू को शंका हुई कि डाक्टर उसे सुन भी रहा है कि नहीं! लिखते हुए डाक्टर बोला,‘कुछ जांचे हैं बाहर से करवानी पडे़गी...’ और भीखू को समझ में नहीं आ रहा था कि जब सब कुछ स्पष्ट दिख रहा है, तो उसमें जांच की क्या जरूरत! डाक्टर ने कागज का पर्चा भीखू की तरफ बढ़ा दिया जिसे भीखू ने ठीक उसी तरह से देखा जैसे खरीदारी करते वक्त निम्न मध्य वर्गीय आदमी परचून की दुकान पर समान खरीदते वक्त रेट लिस्ट को देखता है। पर्चा थमाते वक्त डाक्टर बोला, ‘ये दवाइयां ले लेना।’ दवाइयां ले लेना का मतलब भीखू बखूबी जानता था। वह जानता था कि उसे ये दवाइयां कहां नहीं मिलेंगी। भीखू उठने को हुआ, सहसा डाक्टर को कुछ याद आया। और बोला, ‘पर्चे पर लिखी हुई ऊपर वाली दो दवाएं खाली पेट मत लेना।’ ये सुनते ही, भीखू का पूरा बदन ढिबरी की लौ की तरह कंपकंपा गया। यह सर्द हवा का तेज झोंका था जो अभी-अभी डाक्टर के मुंह से निकला था। भीखू को लगा कि उसके साथ डाक्टर ने गंभीर मजाक किया है। वो तेजी से कक्ष के बाहर निकला और दांत पीसते हुए बोला, ‘खाली पेट मत लेना...हुंह...असल मरज समझे बिना ही दवा दे दी मुए डाक्टरवे ने।’ ‘ मगर इसमें उस डाक्टरवे का भी क्या दोष जब...’ यह कह कर उसने खुद को संभालने की बेतरह कोशिश की। उसकी आंखों में नमी साफ देखी जा सकती थी। उसके कदम उसका साथ नहीं दे रहे थें। उसका मन भी उसके शरीर के साथ कदम ताल नहीं कर रहा था। अस्पताल के गेट पर जब वह पहुंचा तो उसने अस्पताल को एक बार नजर भर कर देखा और पर्चे पर आंसुओं की दो बूंदें टपक पड़ी। अब वह पर्चे को देख रहा था, मगर उसमें कुछ स्पष्ट न दिखता था। अक्षर उसे हवा में तैरते दिखे। पर्चे की लिखावट उसे अपने हाथों की लकीरों की तरह कटी-पिटी अबूझ लगी। पर्चे का एक टक देखते हुए वह मन ही मन बोला,‘ रे दवाई तू भी इनकी तरह ही निकली... कमीनी !!! ’  अब उसके सामने सड़क थी। चलती सड़क थी मगर जाती कहां थी, उसे कुछ याद नहीं आ रहा था! सड़क पर पहुंचते ही उसकी आंखों की नमी सूख चुकी थी। अब उसकी सूखी आंखों में दरारें थी जैसे सूखे के बाद धरती पर पड़ जाया करती है। सड़क पर पहुंचकर वो जोर-जोर से हंसने लगा। वह हंसता ही जाता। जब कोई उसकी तरफ कुतूहल से देखता तो भीखू तरह-तरह से मुंह बनाकर कहता, ‘न अल्लाह के नाम पर, न ईश्वर के नाम पर, कुछ देना है तो दो मुझे, दवा खाने के नाम पर।’

इसके बाद भीखू का क्या हुआ लेखक को नहीं मालूम। उसके कुछ साथियों का कहना है कि पगला कर कहीं चला गया है वो। तो वहीं कुछेक का मत है कि हो न हो वह गांव चला गया होगा। एक अफवाह के अनुसार कल रात उसकी लाश नाले के किनारे पड़ी हुई मिली जिसके दोनों गुर्दे गायब थे। जबकि इस इलाके के रहवासियों में से कुछ मजे लेने के लिए कहते है कि आजकल नीति आयोग के दफ्तर के सामने भीख मांग रहा है। पता नहीं सच क्या है! वैसे भी भीखू जैसों की कहानी पूरी कहां होती है। इन जैसों का जीवन सरकारी आंकड़ों की तरह होता है,जो अपने जन्म लेने के समय से ही लोगों की नजरों में अपनी सार्थकता, अपने अस्तित्व को लेकर एक गहरा प्रश्न चिन्ह देखते हैं! तनिक ठहरिए! अभी-अभी नक्कू ने पूरे विश्वास से लेखक को बताया है कि डाक्टर द्वारा निर्देशित जांच करवाने के लिए भीखू खून बेचने किसी दलाल के साथ कहीं गया हुआ है.... लेखक को तो नक्कू की बात सच लगती है बाकी आप की मर्जी!


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