Subhash Chander

Comedy


5.0  

Subhash Chander

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फेसबुक पर प्रेम: एक सच्ची कथा

फेसबुक पर प्रेम: एक सच्ची कथा

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पिछले कई सालों से मनोज यादव उर्फ मन्नू बाबू इश्क की क्लास के परमानेंट स्टूडेंट थे पर लाख कोशिशों के बाद भी वह यह क्लास पास नहीं कर पाये थे तो इसके पीछे कई पुख्ता कारण थे।      

पहला कारण तो यह था कि उनके चेहरे का जुगरफिया थोड़ा प्रागैतिहासिक किस्म का था। उनके गालों में हल्दी-घाटी के अवशेष गड्ढों के रूप में दिखाई देते थे। दूसरे उनके दांत हाथी के बच्चे से कम्पीटीशन करते थे। यह कम्पीटीशन नाक भी कर सकती थी पर वह मूंछो की रेख से ज्यादा नीचे नहीं जा पाई थी। होठों तक आ जाती तो कुछ संभावना बन भी सकती थी। आँखें भी गड्ढों से निकलने की भरपूर कोशिश कर रही थीं और अपनी कोशिशों में नाकाम रहीं थी। सर पर बाल थे और दोनों कनपटियों पर थे। बीच के हिस्से की फसल ठीक से हवा-पानी न मिलने के कारण जरूर थोड़ा उजड़ गयी थी। यह बात पक्की है कि उनका जुगरफिया जरूर थोड़ा गड़बड़ाया हुआ था पर दिल जो था, वो प्यार से लबालब भरा था। इतना भरा था कि हॉर्ट अटैक तक की नौबत आ सकती थी। सो मन्नू बाबू दिल में भरे इस प्यार को बांटने के लिए बेचैन थे और बड़ी शिद्दत से इसकी तैयारी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने गर्ल्स कॉलेजों के चक्कर लगाये। हाट-मेलों में ट्राई मारी। मौहल्ले की सारी छतें, अपनी नजरों से नाप डालीं पर उनके प्रेम पुष्पों का किसी ने सम्मान नहीं किया।   

इस चक्कर में वह दर्जनों बार पीटे गये। कभी यह काम सीधा लड़कियों की सैंडिलों ने किया तो कभी उनके भाई-बापों ने। इस चक्कर में एक बार उनके तीन दांत भी शहीद हो गए, पर हड्डी सिर्फ़ एक ही टूटी। यह सब हुआ पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसी तरह हिम्मत दिखाते-दिखाते वह पैंतीस बरस की उमरिया को प्राप्त हो गये। यह भी संभव था कि कुंआरेपन की इस गाड़ी को हांकते-हांकते, वह अल्लाह मिंया के दरबार में भी हाजिरी बजा आते। पर ऊपर वाले को उन पर दया आ गयी और उन्होंने उनकी मदद के लिए बिन्नू बाबू को भेज दिया।

विनोद कुमार पाण्डे उर्फ बिन्नू पांडे आशिकी के खेल के चैम्पियन थे। कई गोल्ड मैडल ले चुके थे। उन्होंने इश्क के लगभग चार दर्जन इम्तिहान दिये थे और लगभग सभी में डिस्टिंक्शन लेकर पास हुए थे। एक इम्तिहान थोड़ा मुश्किल था, करोड़पति बाप की इकलौती लड़की से जुड़ा था। उसमें उन्हें काफ़ी पढ़ाई करनी पड़ी पर आखिर में जीत उन्हीं की हुई। अब वह करोड़पति ससुर के दामाद थे। उनका भविष्य सुरक्षित था। सो वह और लोगों के भविष्य सुधारने की फ्री-सेवा उपलब्ध कराते थे। ऐसे सेवाभावी सज्जन से एक दिन मन्नू बाबू टकरा गये। बस समझ लो जिंदगी की गर्म कड़ाही में इश्क का हलवा पकने का जुगाड़ हो गया 

 मन्नू बाबू ने बिन्नू पांडे को अपनी सारी राम कहानी सुनाई। इस फील्ड में क्या-क्या गुल खिलाये उनका किस्सा बयान किया। टूटी हड्डी वाली जगह दिखाई, बदन पर पड़े नील दिखाये। अलबत्ता टूटे हुए दांतों की कहानी बिन्नू पांडे खुद ही समझ गये। बिन्नू पांडे ने सारी कहानी सुनी, एक बार फिर गौर से मन्नू बाबू के जुगरफिया का इन्सपेक्शन किया। उसके बाद होठो ही होठो में कुछ बुदबुदाये बोले, ''बेट्टे, लगते तो तुम पूरे बकलोल हो, हरकतें भी तुम्हारी ऐसी ही हैं, पर तुम हमारी शरण में आये हो तो हम तुम्हारे इश्क का डौल भी बैठायेंगे और तुम्हारे हाथ भी पीले करायेंगे।''    

मन्नू बाबू ने बड़ी श्रद्धा से बिन्नू पांडे के वचन सुने। उनकी मिचमिची आँखों में आशा टाइप के कुछ दिये जलने लगे। पर फिर भी मन के किसी कोने में संशय का मच्छर भिनभिना रहा था। वह उसकी अनदेखी ना करते हुए बोले, ''पाण्डे जी, क्या सच्ची में ऐसा हो सकैं है?   

बिन्नू पांडे ने बड़ी हिकारत से पान की पीक नाली में थूकी। पीक से खाली हुए मुँह में एक मोटी सी गाली भरी, पहले उसे मन्नू बाबू की तरफ़ उछाला और बोले, ''बेट्टे, बिन्नू पांडे हैं हम। ससुरे, हम कब्र में जाते बूढ़े को घोड़ी चढ़ा दें। फिर तुम्हारे जैसे बजरबट्टू की तो बात ही क्या है। हमने कहा ना, हो जायेगा तुम्हारा काम?"      

मन्नू मिनमिनाये, "कैसे पाण्डे जी, कैसे?"      

बिन्नू पांडे ने उनके प्रश्न का उत्तर देने की जगह प्रश्न की गेंद उनके ही कोर्ट में डाल दी। बोले – "ये बताओ, तुम कुछ फेस बुक – वेसबुक चलाते हो। इन्स्टाग्राम, व्हाटसैप वगैरह के बारे में जानते हो?"      

मन्नू अचकचाकर बोले, ''नाम तो सुना है जी, पर कभी इस्तेमाल नहीं किया।" फिर कुछ सोचकर अपनी शंका रख दी, ''पर पांडे जी, फेसबुक से हमारे ब्याह का क्या सम्बंध है?"    

पांडेजी घोड़े की हिनहिनाहट से मुकाबला करते हुए हँसे। बोले, ''बेटा, तुम शक्ल से ही नहीं, सच में ही उल्लू हो। अबे बेट्टे, फेसबुक तो वो जादू की छड़ी है, जिसे छुआने पर तुम्हारे जैसा गधा भी घोड़ी चढ़ जाता है, समझे कुछ?" कहकर पांडे जी ने ठहाका लगाया।     

मन्नू अचकचाये से उनके ठहाके के अन्दर छुपी वह घोड़ी तलाशने लगे, जिस पर उन्हें चढ़ना था। पर वह काफ़ी खोजने के बाद भी नहीं मिली।     

बिन्नू पांडे समझ गये कि मन्नू गैजेट्स के तेल में पके पकोड़ों का स्वाद नहीं चखे हैं। सो उन्होंने मन्नू बाबू को अपने पास आने को कहा। फिर उनके कानों में कुछ फुसफुसाया। मन्नू बाबू ने फिर अचकचाने की क्रिया का प्रदर्शन किया। बिन्नू पांडे ने उन पर ध्यान नहीं दिया। वह फुसफुसाते रहे। मन्नू हूँ–हाँ... करते रहे। लगभग दस मिनट गुरुमंत्र लेने के बाद उन्हें लगा कि अब उनकी नैया पार लग जाएगी। उनके गुटखे से सने पीले दाँतों पर गाढ़ी मुस्कान की परत जम गयी। उन्होंने बड़ी श्रद्धा से बिन्नू पांडे के चप्पलों में सजे पांवों का स्पर्श किया। पांडे जी ने आर्शीवचन के रूप में कहा, ''चढ़ जा बेटा सूली पर भला करेंगे राम।" मन्नू बाबू बाहर आ गये।    

तिवारी जी उनका फेसबुक का एकाउन्ट बन चुका था। पर उसमें उनके फोटों की जगह बंगला देश के फिल्मी हीरो की फोटो लगी थी जिसे भारत में बहुत कम लोग ही पहचानते होंगे। इसके बाद मन्नू ने पांडे जी के गुरुमंत्रों को स्मरण करते हुए, कन्याओं की प्रोफाइलें तलाशनी शुरू कर दी। जो-जो कन्या पसंद आती गयी, उन सबको फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजते गये। चार-पाँच दिन में उनके सौ के लगभग फेसबुक फ्रैंड बन गये। कहना न होगा कि उनमें एक भी पुरुष नहीं था। पुरुषों का उनको करना भी क्या था?  

उसके बाद अगला काम शुरू हुआ। मन्नू बाबू ने कबाड़ी बाज़ार से शायरी की कुछ पुरानी किताबों का जुगाड़ किया। उसमें से कुछ शेरों का चुनाव किया। उस चुनाव के क्राइटेरिया में शेरों में हुस्न की तारीफ़, दर्द के तालाब में डूबने की मंशा वगैरह थे। ऐसे सारे शेर इकट्ठे करके उन्होंने, एक दिन में चार शेरों के हिसाब से, उन्हें फेसबुक पर पोस्ट करना शुरू किया। कहना ना होगा कि वह शेर के नीचे अपना नाम लिखना नहीं भूले।    

उनकी 'शेरी' मेहनत रंग लाई। दस-बारह दिनों में ही 'उनके' शेरों पर आह, वाह, क्या बात है, जबर्दस्त, बधाई जैसे कमेंट वैसे ही उभरने लगे वैसे ही जैसे गर्मियों में ज्यादा आम खाने पर फुंसियाँ उभरती हैं। अब मन्नू बाबू का रोज़ का नियम हो गया। वह सुबह उठते ही पहले, रात के कमेंट देखते, उनके जवाब लिखते। कन्याओं की पोस्ट देखते। इश्किया कविताओं वाली पोस्टों पर खास ध्यान देते। कन्याओं की रचनाओं की तुलना महादेवी वर्मा तक से कर देते। शादीशुदा महिलाओं के फोटो पर 'नाइस' लिखते तो सिंगल स्टेटस वाली कन्याओं के सौंदर्य की तारीफ़ में, उस समय तक कसीदे गढ़ते, जब तक कि टाइप करते-करते अंगुलियां नहीं थक जातीं।

यह सब कुछ चल रहा था, पर मन्नू बाबू अभी पूरे खुश नहीं थे। बकौल पांडे जी अब तक तो उन्हें इश्क की गाड़ी में सवार हो जाना था, पर जैसी गाड़ी वह चाह रहे थे, आ ही नहीं पा रही थी। इस चक्कर में वह रोज़ रात को एक-डेढ़ बजे तक जगे रहते। कुछेक कन्याओं के चैट बॉक्स तक में उनकी आवाजाही हो गयी थी, पर मामला कविताओं के आदान-प्रदान तक ही रहा। जहाँ उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश की, वहाँ कहीं वह ब्लॉक हो गये तो कहीं उन्हें डांट खाने के एवज में अगली को ब्लॉक करना पड़ा। मतलब मामले का दही जमा नहीं। आखिर एक दिन उनके भाग्य की लॉटरी का नम्बर लग गया। उस दिन वह सुबह आठ बजे सोकर उठे। उठते ही मोबाइल चैक किया। फेसबुक में लौग इन किया तो देखा कि एक कन्या की फ्रैंड रिक्वेस्ट थी। नाम था मिस शीतल।    

मन्नू बाबू की तो बांछे खिल गयी। लड़की फोटो में खासी खूबसूरत लग रही थी। मन्नू ने फोटो जूम करके देखा तो लार टपकते-टपकते बची। सेब जैसे लाल गाल। संतरे की फांक जैसे होंठ आँखें तो इतनी मोटी कि लगता था कटोरे में से बाहर निकल आयेंगी। पूरा प्रोफाइल चैक किया तो देखा कन्या कानपुर में सरकारी स्कूल में मास्टरनी थी। मन्नू बाबू फ्लैट हो गये। सोच लिया कि इसी से मामला जमायेंगे। दन्न से फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार की और सीधे चैट बॉक्स में स्वागत का मैसेज और एक शेर लिख मारा। सुबह से शाम तक वह इंतजार करते रहे कि कब जवाब आये। रात को नौ बजकर पाँच मिनट पर उसका जवाब आया। कन्या ने उनकी शायरी की तारीफ़ की, मन्नू ने बदले में उसके हुस्न के कसीदे काढ़ डाले। कन्या ने प्रत्युत्तर में शर्माने की इमोज़ी डाल दी, फिर वह ऑफलाइन हो गयी। कहना ना होगा कि उस रात मन्नू बाबू के सपने की शोभा बढ़ाने का काम, उसी कन्या ने सम्पन्न किया।  

अगले दिन से मन्नू बाबू ने बाकी सब कन्याओं को छोड़कर, मिस शीतल पर ही फोकस करना शुरु कर दिया। अब वह सुबह गुड मार्निंग का मैसेज भेजते, दोपहर गुड डे का, रात को गुडनाइट का। इश्किया शेरों का भी गाहे-बगाहे उसकी बातों पर छिड़कते रहते। शुरु में तो कन्या मतलब मिस शीतल ने उनके मैसेजों पर कृपा नहीं की। उनका जवाब नहीं दिया। फिर वह उन पर अंगूठा (थम्ब इम्प्रेशन) लगाने लगी। कुछ दिनों बाद उनकी कृपा 'थैंक्यू' के रूप में बरसने लगी। होते-होते हालात इतने सुखद होने शुरु हो गये कि उसकी तरफ से भी गुडनाइट आनी शुरू हो गयी। जिस दिन मन्नू बाबू को पहली गुडनाइट मिली। उस रात उनकी रात वाकई में गुड हो गयी। उस रात उन्होंने सपने में मिस शीतल से कुछ ज्यादा लिबर्टी भी ले डाली।  

इसी तरह लगभग एक महीना बीत गया। पर मन्नू बाबू की हिम्मत आगे बढ़ने की नहीं हुई। वह जैसे ही प्रेम निवेदन की सोचते। उन्हें अपना जुगरफिया याद आ जाता। वह आईने से पूछने जाते, आईना मना कर देता। हारकर उन्होंने एक दिन अपना दुखड़ा बिन्नू पांडे के आगे रोया। सारी कहानी बताई। सलाह मांगी। बिन्नू पांडे ने पूरी कहानी सुनकर फैसला दिया, ''बेट्टे, ज्यादा देरी मत करो। वरना चिड़िया फुर्र हो जायेगी। सोशल मीडिया में जगह-जगह बहेलिये जाल लिए बैठे हैं। चुग्गा फेंक रहे हैं। कन्या ने दाना चुग लिया तो फिर जय जगन्नाथ ही करते रह जाओगे।'' मन्नू बाबू ने पांडे जी की बात पर गौर किया और उसी रात को उसके मैसेज़ बॉक्स में टाइप कर दिया, ''शीतल जी, प्लीज़ नाराज़ मत होना। मुझे आप बहुत पसंद हैं। मैं हमेशा आपके बारे में ही सोचता रहता हूँ। आई लाइक यू।" साथ में लव की इमोज़ी लगा दी।  

लिखने के बाद उन्हें याद आया कि यार ऐसा ना कहीं, लड़की बिदक जाये और स्नैपशॉट लेके फेसबुक पर डाल दे। किरकिरी जो होगी, वो तो होगी ही। बाकी कन्याओं की संभावनाएँ भी आत्महत्या कर लेंगी। फिर नये सिरे से फेसबुक एकाउन्ट का पौधा उगाना पड़ेगा। जो महीनों में जाकर फल देने लायक होगा। यह सब सोचकर उन्होंने फिर उसकी वाल पर लिखा।

"प्लीज़ मेरी बात का बुरा मत मानियेगा। मैं जीवन में पहली बार प्रेम निवेदन कर रहा हूँ। अगर आपको मैं पसंद नहीं हूँ तो भी कोई बात नहीं, मैं दिल पर पत्थर रख लूंगा। पर आपको मरते दम तक चाहता रहूँगा। आपसे निवेदन है, यह बात किसी से कहियेगा मत, मैं बहुत शर्मदार आदमी हूँ। बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा, दुनिया को हमेशा के लिए छोड़कर चला जाऊँगा... प्लीज़।"   

इतना लिखने के बाद मन्नू बाबू धड़कते दिल से इंतज़ार करने के काम में लग गये। एक दिन गुज़रा, दो दिन गुज़रे, धीरे-धीरे एक हफ्ता गुज़र गया। पर मन्नू को अपनी वाल पर शीतल जी की शीतलता का एहसास नहीं हुआ। आठवें दिन उन्होंने सोच लिया कि इस प्रोजेक्ट पर अब और टाइम इन्वेस्ट करना बेकार है। आज रात को अगर जवाब नहीं आया तो मिस शीतल को ब्लॉक कर दूँगा। फेसबुक पर और भी तो कन्याएँ हैं, उनमें संभावनाएँ खोजूंगा।  

उस रात को मन्नू बाबू ने फेसबुक पर लॉगिन किया। मिस शीतल का मैसेज बॉक्स देखा। खाली था। किलसकर वह ब्लॉक करने ही वाले थे कि तभी मैसेज बॉक्स की हरी बत्ती जली। मन्नू बाबू अलर्ट हो गये। उन्होंने जल्दी से गुडनाइट फेंकी। मिस शीतल ने लपक ली। बदले में इमोजी आ गयी। मन्नू बाबू ने उत्साहित होकर बात-चीत की ट्रेन चला दी –   

"क्या बात है मुझसे नाराज़ हैं क्या?" 

"नहीं तो।"

"फिर जवाब क्यों नहीं दिया?"

"क्या जवाब देती। देखिये, मैं आपको बता देती हूँ। मैं ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूँ। मैं अच्छे खानदान की लड़की हूँ। हमारे यहाँ ये सब ठीक नहीं समझा जाता है।"

''अरे, आप तो नाराज़ हो गयीं नाराज़मत होइये। मैं भी अच्छे घर से हूँ। और फिर ये बताइये कि क्या किसी से प्यार का इजहार करना गुनाह है – बोलिये... "   

"नहीं तो ... मगर..."   

"अगर मगर मत कीजिये। ये देखिये... मैं आपको सच्चे दिल से चाहता हूँ। अगर मैं आपको पसंद हूँ या नहीं बस यह बताइये।"   

"अरे... यह क्या... ये कोई पूछने की बात है।"   

"बताइये ना, मेरा दम निकल रहा है – प्लीज़ बताइये, अगर मैं आपको पसंद नहीं हूँ तो भी बता दीजिये। हमारी दोस्ती बनी रहेगी पर मैं आपको फिर कभी तंग नहीं करूंगा।"   

"हे राम, ये आपने कैसे धर्म संकट में डाल दिया प्लीज़, मुझे सोचने का मौका दीजिये। चलती हूँ, स्कूल की कॉपियाँ जांचनी है। बॉय।"   

"अरे सुनिये तो... कल आएंगी ना चैट पर... प्लीज मैं इंतजार करूंगा।"   

"देखूंगी..."

इसके बाद चैट बॉक्स की लाइट बुझ गयी पर मन्नू बाबू के दिल की लालटेन भक्क से जल गयी। उसमें संभावनाओं का कैरोसिन जो पड़ गया था। उस रात वह सो नहीं पाये। 'देखूंगी' शब्द की मनचाही व्याख्याएँ करते रहे। 

अगली रात को वह फिर फेसबुक पर थे और इंतजार की गाड़ी में सवार थे। रात के दस बजे चैट बॉक्स में मिस शीतल अवतरित हुईं। आवश्यक ना-नुकुर हुई। शीतल की ओर से खानदान की इज्जत, मुझे इन सबमें रुचि नहीं है, प्लीज़ मान जाओ, जैसे डॉयलॉग टपकाये गये। मन्नू बाबू ने ऐसे मौंको के लिए याद किये डॉयलॉगों पर ज्यादा भरोसा किया। रात डेढ़ बजे तक चैटिंग चलती रही। बात का तोड़ इस बात पर हुआ कि मिस शीतल मन्नू बाबू को पसंद तो करती हैं, पर प्यार नहीं करती। वह ऐसी वैसी लड़की नहीं है।

उन्हें ऐसी-वैसी लड़की बनने में पूरी सात रातें लगीं। आठवीं रात तक उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वह भी मन्नू बाबू से 'लव' करती हैं। इसी रात को एक सेशन लव यू, पुच-पुच का भी हुआ। कहना न होगा कि उस रात सपने में मन्नू बाबू ने सुहागसेज़ पर बैठी मिस शीतल का घूंघट उठा दिया।    

धीरे-धीरे इश्क की गाड़ी रफ्तार पकड़ने लगी। पुच-पुच, आह-ऊहं तक पहुँची। साथ जीने-मरने की कसमें खाई जाने लगीं। एकाध दिन चैटबॉक्स में न आने पर रूठने-मनाने के दौर भी चले। पर सभी चैट बॉक्स में। मन्नू बाबू खुश तो थे पर संतुष्टि की चिड़िया अभी दूर थी। वह आगे बढ़ना चाहते थे, वह फेसबुक से व्हटसैप, इंस्टाग्राम में भी यात्रा साथ करना चाहते थे। उनसे फुनियाना चाहते थे, सामने बैठकर बतियाना वगैरह चाहते थे। पर मिस शीतल इस सबके लिए तैयार नहीं थीं।

हारकर मन्नू बाबू को बिन्नू पांडे की शरण में जाना पड़ा। उनकी सलाह के अनुसार, मन्नू बाबू तीन दिन के लिए फेसबुक से गायब हो लिये। चौथे दिन जब उन्होंने फेसबुक खोली तो देखा- मिस शीतल के पचासों मैसेज थे। एक मैसेज में उनका व्हाटसैप नम्बर भी था। मन्नू बाबू ने यह देखकर बिन्नू पांडे की जय का नारा लगाया। उस दिन रूठने मनाने की कार्रवाई चैट बॉक्स की जगह व्हाटसैप पर सम्पन्न हुई।  

काफ़ी दिन व्हाटसैप कृतार्थ होता रहा। फिर इंस्टाग्राम का नम्बर आया। एक दिन वो भी आया जब मन्नू बाबू के नम्बर पर एक कॉल आयी। कॉल किसी मीठी सी आवाज़ वाली कन्या की थी। कहना ना होगा कि उस दिन मन्नू बाबू खुशी से इतनी जोर से उछले कि चारपाई से नीचे जा गिरे। पर जल्दी ही कपड़े झाड़कर फिर आशिकी के टेलीफोनिक मैदान में कूद पड़े। 

इन तीन-चार महीनों में इश्क की ट्रेन काफ़ी रफ्तार पकड़ चुकी थी। रोज़ घंटों बातें होती थीं। प्यार-मोहब्बत के वादे होते थे। जीवन भर साथ निभाने की कस्में होती थी। होने वाले बच्चों के नाम तक तय हो लिये थे पर मिलने का जुगाड़ नहीं बन रहा था। होता भी कैसे। जैसे ही मिलने की बात होती, मिस शीतल बहानों की पोटली खोल के बैठ जातीं। मन्नू ने लाख कोशिश की, कसमें खिलाईं, रूठने का सेशन किया। पर मिस शीतल तैयार नहीं हुई।

अब मन्नू बाबू का धैर्य जवाब देने लगा था। वह अब बात-बात पर भिनकने लगे थे। झगड़ने लगे थे। बात भी उन्हें घोड़ी पर चढ़ना था, घर का बना खाना खाना था, अपने सगे बच्चे गोद में खिलाने थे। पर बच्चों की भावी माँ मिलने को तैयार नहीं थी। साइंस ने भी इतनी तरक्की नहीं की थी कि ये सारे काम फेसबुक या टेलीफोन पर सम्भव हो पाते। उन्होंने हारकर, फिर बिन्नू पांडे से सम्पर्क किया। 

बिन्नू पांडे ने उनसे नम्बर लिया। ट्रू कॉलर पर डाला। नम्बर कानपुर के एक कस्बे का था। अब क्या था, कन्या का नाम था, कस्बे का नाम था, स्कूल का नाम था फिर रुकने का क्या काम था?

मन्नू बाबू ने अगले दिन की ट्रेन का टिकट बुक करा लिया। मन में मिलन के लड्डू थे जो रह-रहकर फूट रहे थे। पर एक दिक्कत थी कि मिस शीतल तो इतनी सुन्दर है, उन्हें अपना चौखटा पसंद नहीं आया तो... । इस तो... से मन्नू का ब्लड प्रेशर बढ़ गया। उन्होंने काफ़ी देर सोचा। उसके बाद वह ब्यूटी पॉर्लर में घुस गये। पॉर्लर वाली ने उनसे महज दो हजार रुपये चार्ज किये और उनके चेहरे की ऑवर हॉलिंग कर दी। अलबत्ता दांत, आँखें और गालों के गड्ढे अपरिवर्तनीय रहे।   

अगले दिन रविवार को सारी तैयारियों के बाद, मन्नू बाबा कानपुर के लिए रवाना हुए। पूरे रास्ते मुलाकात में बोले जाने वाले डॉयलागों की रिहर्सल करते रहे। सपनों के स्वेटर उधेड़ते-बुनते रहे। कानपुर आ गया। वहाँ से बस पकड़कर सीधे रतनपुर कस्बे पहुँचे। वहाँ से पूछते-पूछते विद्यावती गर्ल्स प्राइमरी स्कूल।

गेट पर चपरासी से मिस शीतल मैडम के बारे में दरियाफ्त कीं। मिलने की इच्छा जाहिर की। चपरासी उन्हें शीतल मैडम से मिलाने ले गया। मुश्किल से पचास कदम की दूरी होगी पर इस दूरी को पार करने में मन्नू को पसीने आ गये।

 हे भगवान, कहीं शीतल ने मुझे ठुकरा दिया तो... मेरी शक्ल देखकर मेरी बेइज्जती कर दी तो ... तो... तो की यह गाड़ी स्टॉफ रूम तक चली। चपरासी मैडम को बुलाने गया। मन्नू का दिल तब तक धड़कता रहा।

इतनी देर में चपरासी एक ३५-३६ बरस की औरत के साथ आया। वह छोटे कद की लम्बोतरे से चेहरे वाली औरत थी। उसके चेहरे पर मुंहासों की फसल लहलहा रही थी। उस पर पिचके गाल और धँसी हुई आँखों का कोम्बो, उसकी खूबसूरती बढ़ा रहा था। वह औरत उसके पास आई और बोली, ''जी कहिए, मैं ही शीतल हूँ, बताइये क्या काम है? आप कौन?"

आवाज़ सुनते ही मन्नू बाबू कांप गये। आवाज़ तो शत प्रतिशत शीतल की ही थी। पर उसकी खूबसूरती... ? वह सन्न थे। उनके सपनों के ताजमहल को किसी ने तेजाब से धो दिया था, वहाँ से धुंआ उठ रहा था। वह उस धुंए और धुंए उठाने वाली को फटी-फटी आँखों से निहार रहे थे।

औरत उन्हें ऐसे घूरते देखकर गुस्से से बोली, "मिस्टर, क्यों घूर रहे हैं। कौन हैं आप?"

"मैं...मैं... मनोज... मन्नू... दिल्ली से..." बड़ी मुश्किल से उनके मुँह से आवाज़ फूटी।   

उनकी आवाज सुनते ही औरत मतलब मिस शीतल की भी सेम टू सेम हालत हुई। आँखें फटी रह गयी, जुबान तालू से चिपक गयी। वह बेहोश होती-होती बचीं।

कुछ देर तक दोनों में युद्ध शुरू हुआ जिसमें पहले राउन्ड में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पहले झूठ बोलने के प्रहार किये। दूसरे राउन्ड में एक-दूसरे को धमकी दी गयी। तीसरे राउन्ड में एक-दूसरे को धोखेबाज़ बताते हुए, कभी भी फोन न करने की हिदायत दी गयी। चौथे राउन्ड में सिर-फुटव्वल की संभावना बन रही थी। तभी चपरासी दो गिलासों में पानी ले आया। दोनों ने पानी पीते-पीते एक दूसरे को देखा। उसके बाद जाने क्या हुआ कि दोनों हँस पड़े। हँसने से फुर्सत पाते ही दोनों ने एक दूसरे के बारे में जानकारी प्राप्त की। पता चला मिस शीतल सच में मिस हैं और मन्नू बाबू भी चिर कुआरें हैं। दोनों की उम्र और शादी न होने की उम्मीद भी बराबर है। ऐसा ज्ञान प्राप्त होते ही, वे फिर हँसे।

मन्नू बाबू ने इस बार प्यार से मिस शीतल की ओर देखा। मिस शीतल ने भी उनकी ओर देखा। उसके बाद मिस शीतल शर्मा गयी।  

मन्नू को शर्माती हुई शीतल इतनी प्यारी लगी कि उन्होंने जेब में से अंगूठी निकालकर शीतल को पहना दी। शीतल ने चुपचाप अंगूठी पहन ली। उसके बाद वह फिर शर्मा गयी। आगे की कहानी बस इतनी है कि कालान्तर में दोनों पति-पत्नी के पद को प्राप्त हुए ।

भगवान! फेसबुक ने जैसे उनके घर बसाए, वैसे सबके बसाए।

        


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