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Kalpesh Patel

Drama Inspirational Children

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Kalpesh Patel

Drama Inspirational Children

पुरानी संदूक

पुरानी संदूक

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पुरानी संदूक

रामु गाँव का एक चंचल लड़का था। उसकी आँखों में हमेशा जिज्ञासा चमकती रहती थी। दादाजी अक्सर उसे पुराने किस्से सुनाते—कभी अपने बचपन के, कभी आज़ादी के दिनों के। लेकिन रामु को सबसे ज़्यादा आकर्षण था दादी की पुरानी संदूक से।  

वह संदूक लकड़ी का बना था, ऊपर पीतल की नक्काशी और भारी ताले से बंद। दादी उसे बड़े जतन से संभालती थीं। जब भी रामु उसके पास जाता, दादी मुस्कुराकर कहतीं—  
“बेटा, इसमें हमारी यादें हैं, खज़ाना नहीं।”  

एक दिन दादाजी ने रामु को बुलाया और कहा,  
“रामु, आज मैं तुम्हें उस संदूक का राज़ बताऊँगा।”  

रामु की आँखें चमक उठीं। दादी ने चाबी निकाली और धीरे-धीरे ताला खोला। संदूक खुलते ही उसमें से पुराने कपड़े, पीले पड़ चुके खत, और कुछ खिलौने निकले।  

रामु ने आश्चर्य से पूछा, “दादी, ये सब क्या है?”  

दादी ने प्यार से समझाया,  
“ये तेरे पिताजी के बचपन के कपड़े हैं, ये खत तेरे दादाजी ने मुझे जवानी में लिखे थे, और ये खिलौने तेरे चाचा के हैं। यह संदूक हमारी पीढ़ियों की यादें समेटे हुए है।”  

संदूक खुलने पर जब रामु ने पुराने कपड़े और खत देखे, तभी उसकी नज़र एक छोटे कपड़े में लिपटे पैकेट पर पड़ी। दादी और दादाजी ने एक-दूसरे को देखा, जैसे वे उस पैकेट को पहचानते हों।  

रामु ने उत्सुकता से पूछा, “ये क्या है?”  

दादाजी ने धीरे से कपड़ा खोला। अंदर एक पुराना चाँदी का सिक्का था, जिस पर अजीब-सी आकृति बनी थी। दादी ने बताया,  
“ये सिक्का हमारे गाँव के मंदिर से जुड़ा है। कहते हैं कि इसे जिसने भी संभाला, उसके घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।”  

रामु ने सिक्के को हाथ में लिया और अचानक उसे लगा जैसे कोई ठंडी हवा उसके चारों ओर घूम गई हो। दादाजी मुस्कुराए,  
“बेटा, यह सिर्फ़ सिक्का नहीं, हमारी आस्था और विश्वास का प्रतीक है। यही कारण है कि हम इसे संदूक में छिपाकर रखते थे।”  

रामु ने समझा कि संदूक में सिर्फ़ यादें ही नहीं, बल्कि रहस्य भी छिपे हैं। उस दिन से उसने तय किया कि वह इस सिक्के की कहानी आगे भी सुनाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि उनके परिवार में सिर्फ़ वस्तुएँ नहीं, बल्कि विश्वास और परंपराएँ भी विरासत में मिलती हैं।

रामु ने उन चीज़ों को छूते हुए महसूस किया कि यह सिर्फ़ सामान नहीं, बल्कि परिवार की कहानियाँ हैं। दादाजी ने कहा,  
“बेटा, असली खज़ाना सोना-चाँदी नहीं होता, बल्कि वो यादें होती हैं जो हमें जोड़कर रखती हैं।”  

उस दिन से रामु ने तय किया कि वह भी अपनी छोटी-छोटी यादें सँभालेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसे देखकर मुस्कुराएँ।  

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