Shakuntla Agarwal

Abstract


4.8  

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"गुनहगार कौन?"

"गुनहगार कौन?"

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सुबह के साढ़े चार बजे हुए हैं | निशा अपने सर पर टोकनी रखकर पानी भरने जाने लगती है | अंदर से निशा की माँ की आवाज़ आती है - अरे निशा ! आज इतनी जल्दी पानी भरने क्यों चल दी ? निशा - बाद में भीड़ हो जाती है माँ, कुएँ पर | कहकर तेजी से निकल जाती है | कुएँ पर पहुँचते ही, इंढ़ी को कुएँ के मंढ पर रखकर टोकनी को माँजने लगती है | 

 कमला - अरे निशा ! आज क्या इसको बिल्कुल चमका कर ही दम लेगी ? अपनी सारी ताकत इसी में झोंक देगी क्या ? परंतु वह तो अपने ही ख्यालों में ही खोयी हुई थी | उसको याद आ रहा था कि कैसे उसकी गली का एक लड़का नवीन घंटों खड़ा उसको निहारता रहता था |  

एक दिन जब गली में कोई नहीं था, तो नवीन ने झट से आकर निशा का हाथ पकड़ लिया और कहने लगा - निशा, तुम कितनी सुन्दर हो | बिल्कुल अप्सरा | मेरी आँखें तुम से एक पल भी हटना ही नहीं चाहती | ऐसे लगता है कि आठों पहर तुम्हें अपने सामने बिठा कर तुम्हें ही निहारता रहूँ |  

निशा (हाथ छुड़ाते हुए) - कोई आ जाएगा तो गज़ब हो जायेगा |  

नवीन - अभी गर्मियों की दोपहर हैं, सन्नाटा छाया हुआ है, कोई नहीं आयेगा, चिंता मत करो | वह निशा के गालों से लटों को हटाते हुए, हल्के से उसके कपोलों को छू कर कहता है - निशा तुमने कभी अपने - आप को शीशे में देखा हैं, कि तुम कितनी खूबसूरत हो ? अगर तुम मेरी जीवन - संगिनी बन जाओ तो मैं अपने - आप को धन्य समझूँगा | 


निशा - नवीन, तुम क्या बात कर रहे हो ? तुम कहाँ और मैं कहाँ ? मेरे पापा तुम्हारें यहाँ मुनीम हैं | तुम्हारें घर - वाले मुझे कभी अपने घर की बहू कबूल नहीं करेंगे |  

नवीन - कैसे नहीं करेंगे ? मैं कबूल करवाना जानता हूँ | कहते हुए, धीरे से निशा का हाथ पकड़कर दबाता है और आँखों ही आँखों में इशारा करता है | जिसको देखकर निशा शर्माकर सीढ़ियों से होती हुई भाग जाती है | दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगता है | आते - जाते कनखियों से देखना, मुस्कुराना और इशारें करने का सिलसिला चलता रहता है | 

एक दिन नवीन के रिश्तें में किसी की मौत हो जाती है | पूरा परिवार वहाँ जाता है, परंतु नवीन सर दर्द का बहाना बनाकर मना कर देता है | भाभी नवीन से कहती है - भईया आप भी चलते, अकेले कैसे रहोगे ? चलो मैंने खाना बना दिया है, खा लेना, हम जल्दी आने की कोशिश करेंगे | जैसे ही सब जाते हैं, नवीन निशा को आने का इशारा करता है | निशा घर वालों की नज़रें बचाकर, अपने घर से निकलकर, उनकी सीढ़ियों से होकर नवीन के पास आ जाती है |  

नवीन (निशा से) - मैं तो तड़प रहा था, तुमसें मिलने के लिये | यह कहते हुए, निशा को आलिंगन में भर लेता है | निशा शर्माते हुए नीचे मुँह कर लेती है |  

नवीन - अब तुम शर्माकर यूँ मेरा दिल न तोड़ो, बड़ी मुश्किल से यह मौका मिला है | कहते हुए उसके अंगों को छूने लगता है | निशा के पूरे शरीर में सिरहन सी उठती है, जैसे किसी ने उसे नंगे तारों से छुआ दिया हो | निशा और नवीन वासना की अग्नि में जलने लगते हैं और दोनों हमबिस्तर हो जाते हैं | जैसे ही निशा वासना की भट्टी से निकलती है, कहती है - हमने यह बहुत बड़ा पाप किया है |  

नवीन - चिंता मत करों, हमने कुछ गलत नहीं किया | मैं तुम्हें अपनी जीवन संगिनी बनाऊँगा, लेकिन अभी तुम जाओ, अगर किसी ने देख लिया तो मुश्किल हो जायेगी | निशा वहाँ से चली जाती है |  

लेकिन यह क्या, अब नवीन आँखें चुराने लग जाता है | जो नवीन घंटों तक निहारता था, वो अब कहीं नज़र नहीं आ रहा था |  

एक दिन नवीन को अकेला पाकर, निशा ने कहा कि - मैं तुम्हारें बच्चें की माँ बनने वाली हूँ |  

नवीन - क्या बात कर रही हो ? मुझे क्या पता तुम किस - किसके के साथ मुँह काला करती हो और इल्ज़ाम मेरे सर मंढ रही हो ? चल - निकल यहाँ से | यह कहकर उसे धक्का दे देता है |  

अरे निशा ! आज पानी नहीं भरेगी क्या, टोकनी ही माँजती रहेगी ? निशा चौंककर अपने ख़्वाबों से बाहर आती है, और टोकनी लेकर कुएँ के पास आ जाती है |              

और अपनी इंढ़ी को कुएँ में धकेल देती है | और मेरी इंढ़ी - मेरी इंढ़ी करते हुए खुद भी कुएँ में छलाँग लगा देती है | छपाक की आवाज़ के साथ, सभी औरतें स्तब्ध रह जाती है | जब तक वह कुछ समझती, तब तक निशा कुएँ में डूब चुकी होती है |


निशा की नासमझी, नवीन की दरिंदगी, पारिवारिक दबाव और सामाजिक परम्परावादी सोच ने निशा को जान देने पर मजबूर कर दिया |


"शकुन" यहाँ गुनहगार कौन हैं - नवीन, निशा, घरवालें या समाज़ ?


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