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Vinita Rahurikar

Abstract Drama


4.7  

Vinita Rahurikar

Abstract Drama


गुलमोहर और बोगनवेलिया

गुलमोहर और बोगनवेलिया

11 mins 893 11 mins 893

“ये जो रिश्ते होते हैं न बड़े डिमांडिंग होते हैं. सारी उम्र खर्च हो जाती है इनकी डिमांड पूरी करने में. इसलिए मुझे रिश्तों से बड़ा डर लगता है.” वीथी ने पार्क की हरीभरी घास से नजर घुमाते हुए कोने में लगी बोगनवेलिया पर स्थिर कर दी.

“ऐसा नहीं है, रिश्ते हमे जीने की वजह भी देते हैं. अकेला आदमी परिवार नहीं बन सकता. रिश्ते हमे परिवार देते हैं. जीवन में स्थायित्व देते हैं. सुख-दुःख बांटने को साथी देते हैं.” वरुण ने एक गहरी मगर आत्मीय दृष्टि से विथी को देखते हुए कहा तो बोगनवेलिया पर टिकी वीथी की दृष्टि घास से होते हुए बैंच के नीचे की घास रहित मिट्टी पर चली आई.

“मैंने माँ को अपनी पूरी उम्र पिताजी की डिमांड्स पूरा करने में खर्च करते देखा है. उम्र भर वो उनके इशारों पर नाचती रही . क्या मिला उन्हें? बंजर ही रह गयी. कभी हरी नहीं हो पायी. उनकी इच्छाओं की कोई कोपल उनकी ही जमीन पर कभी उग नहीं पायी, फलफूल नहीं पायी.”

“तुम सिर्फ एक पक्ष देख रही हो...” वरुण ने कुछ कहना चाहा.

“बस नमक की तरह घुलकर अपना सम्पूर्ण अस्तित्व एक व्यक्ति के पीछे विलीन कर दो.” वीथी अपनी रौ में बोल गयी.

“लेकिन वही नमक तो खाने में स्वाद देता है, ठीक वैसे ही रिश्ते जीवन को स्वाद्नुमा अर्थ देते हैं.” वरुण ने कहा.

“मैं तो उस बोगनवेलिया जैसी बनना चाहती हूँ. पूर्णतः स्वावलम्बी. न खाद-पानी की दरकार न देखभाल की, अपने में मग्न, झूमती और फलती-फूलती रहती है.” वीथी ने बोगनवेलिया के उपर लहराते स्वच्छ नीले आसमान को देखते हुए कहा.

वरुण अब कुछ नहीं कह पाया. मुस्कुराकर रह गया. वीथी की दृष्टि का अनुसरण करते हुए वह भी बोगनवेलिया की झड़ी को देखने लगा. ताज़े हरे पत्तों के बीच सुंदर गुलाबी फूल. वर्ष भर हरी रहती है. और वर्ष भर अपने ही रंग में रंगी फूल बरसाती रहती है. सचमुच

बोगनवेलिया को किसी से कोई सरोकार नहीं होता. अपने में मग्न, अपने में मस्त. न संगी-साथी न सन्तति.

वरुण के दिल में एक अजीब सा खालीपन भर आया. वीथी बोगनवेलिया की तरह अलमस्त रहकर बंधन से दूर होना चाहती है. और एक वह है जो वीथी को हमेशा के लिए एक प्यारे से सुरक्षित बंधन में बाँधने को आतुर है. चाहता है की उसकी मुस्कुराहट की हरीभरी डालियाँ उसके जीवन के आकाश में झूमती रहें. प्रेम की सुगंध मन मन्दिर में महकती रहे. कितने सपने देख डाले थे उसने पिछले डेढ़ वर्षों में वीथी के साथ आने वाले भविष्य के. तीन साल जूनियर थी वीथी उससे, पर वह उससे तब मिला जब इन्जिनीरिंग पूरी करके नौकरी मिलने थ वह उसी कोलेज में पढाने लग गया.

कुशाग्र बुध्ही वीथी ने बहुत जल्दी ही वरुण का ध्यान आकर्षित कर लिया. और उसकी स्थायी मुस्कुराहट ने उसे दीवाना कर दिया. ‘सर’ और ‘स्टूडेंट’ की औपचारिकता त्याग कर बहुत जल्दी ही दोनों इतने गहरे दोस्त बन गये मानो बचपन की दोस्ती हो. जब वीथी की पढ़ाई पूरी हुई तो उसे भी वरुण की कम्पनी में ही जॉब मिल गया. बस से साथ आना-जाना, साथ में लंच करना. दोनों ही एकदूसरे के दिल में, जीवन में बहुत ख़ास जगह रखते थे.

जब वीथी अपनी नौकरी में स्थिर हो गयी और वरुण भी जीवन में सुदृढ़ आर्थिक स्थिति पर पहुंच गया तब वरुण ने इस दोस्ती को रिश्ते में बाँधने की इच्छा जाहिर की.

“इतने अनमने क्यों हो गये? देखा रिश्ते का नाम लिया और इतना तनाव घिर आया. बस नाम लेने भर से ये हाल है तो सोचा बाद में क्या होगा. तुम मुझसे वादा करो इस बेकार के रिश्ते के चक्कर में दोस्ती पर आंच नहीं आने डोज. तुम्हारी दोस्ती बहुत कीमती है मेरे लिए.” वीथी ने उदास चेहरा बनाकर कहा.

“अरे अनमना नहीं हूँ मेरी माँ. चिंता मत करो हमारी दोस्ती सलामत रहेगी.” वरुण ने हंसकर कहा लेकिन अंदर से उसका मन बहुत टूटा सा हो रहा था. पार्क की हरियाली अब आँखों को ठंडक नहीं दे रही थी. हाथ में हाथ डाले घूमते जोड़े मन में एक इर्ष्या, एक सूनापन उपजा रहे थे. उसने सपने में भी नहीं सोचा था की वीथी शादी से मना कर देगी. वह तो मन में उसके साथ पक्का गठ्बन्धन कर चुका था. बस परिवारों की स्वीकृति की मुहर लगना बाकी था. तो उनकी तरफ से भी वह पूरी तरह निशिंत था. चार सालों का इतना गहरा, आत्मीय,

मधुर साथ बिना पूर्णता तक पहुंचे ही बीच राह में छुट जाएगा. वीथी के बिना उसे जीवन की कल्पना भी व्यर्थ लगती थी. वह तो उसे अपने मन, जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बना बैठा था. इस एक पल ने अचानक ही हाथ रीते कर दिए.

चमकते सूरज को मिटाकर जैसे किसी ने जिन्दगी के केनवास पर स्याह रंग पोत दिया हो. और वही स्याही वरुण के चेहरे पर उतर आई थी. वीथी पहले की तरह ही खुले मन से बातें कर रही थी किन्तु वरुण का मन क्लांत हो गया था. आज तक जो अपना होकर इतना निकट था आज इस पल अचानक ही पराया सा होकर दूर छिटक गया था.

अगले कई दिन वरुण अनमना ही रहा. उपर से सारे काम, सबसे मिलना-जुलना, ऑफिस सबकुछ पूर्ववत सुचारू रूप से चलता रहा लेकिन मन को भीतर एक दर्द सालता रहता था. घरवाले निरंतर विवाह की बात कह रहे थे और वह उस तरफ से उदासीन हो चुका था. वीथी उसकी मन्हस्थिति समझ रही थी किन्तु अपने जीवनानुभवों की वजह से इस बंधन में न बंधने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध थी. बहुत कच्ची उम्र में ही इस बंधन के प्रति उसके मन में एक उपेक्षा, अनचाहा सा भाव घर कर चुका था. अपनी मान का जीवन देखकर.

पिता का शासनात्मक रवैया देखकर समस्त पुरुषों की एक वैसी ही छवि उसके कोमल मन पर अंकित हो चुकी थी. पुरुष सिर्फ शासन करना जनता है, साथ देना नहीं.

और वह किसी के आधीन नहीं रह सकती. विरक्त थी इस ओर से और खुद में ही मगन रहना चाहती थी. भरसक वह पुराने दिनों की तरह वरुण के साथ वही सरल-सहज दोस्ती निभा रही थी. कुछ दिन बीते की एक सुबह माँ का फोन आया, पिताजी की तबियत खराब है, अस्पताल में एडमिट किया है. पिता के लिए उतना नहीं लेकिन माँ अकेली कैसे मैनेज करेगी सोचकर ही वीथी का दिल भर आया. और फिर सच यह भी था की पिताजी माँ के साथ चाहे जैसे भी रहे हों लेकिन वीथी को तो भरपूर स्नेह-दुलार देकर सर-माथे रखा है उन्होंने. उसकी हर इच्छा पूरी की है. वीथी चिंतित हो गयी. वरुण ने फटाफट फ्लाइट की टिकट बुक करवाकर उसे एयरपोर्ट पहुंचाया. रात के साढे नौ बजे वह अस्पताल में थी, माँ के साथ. पिताजी आय.सी.सी.यु. में थे. हार्ट अटैक आया था, हालत नाजुक नहीं थी लेकिन भविष्य में सावधानी रखना जरूरी था. पांच-छः दिनों में ही पिताजी घर आ गये. उनकी देखभाल में ही दिन कट जाता. दस-बाढ़ दिनों में उनकी हालत काफी कुछ सुधर गयी थी.

एक दिन दोपहर में जब पिताजी सो रहे थे तो माँ-बेटी बाहर के बरामदे में फुर्सत से बातें करने बैठी. बड़ा खुला-खुला मौसम था. नीली आसमानी चादर पर कढे सफेद रुई से बादल और हरी-भरी डालियों के बेलबूटों के बीच में उडती रंग-बिरंगी तितलियाँ और मुस्कुराते फूल. आत्मीय बातचीत के बीच ही माँ ने आत्मीय सा विषय छेड़ दिया.

“बुआ ने अपने रिश्ते में एक बहुत अच्छा लडका देखा है तेरे लिए, फिलहाल सिंगापुर में जॉब कर रहा है. फोटो भेजी है. तू भी देख लेना, पसंद हो तो बुआ को खबर करूं आगे बात करने को मुझे और तेरे पापा को तो अच्छा लगा है.” माँ ने बताया.

“कोई जरूरत नहीं है. और वैसे भी मुझे नहीं करनी शादी मैं तुम्हे छोडकर नहीं जाउंगी.” वीथी ने ठुनकते हुए कहा.

“ऐसा कहने से तो काम नहीं चलेगा. अकेले तो जीवन काटा नहीं जा सकता. जब मैं नहीं रहूंगी तब क्या करोगी. ये लडका पसंद नहीं आया तो दूसरा सही.” माँ ने कहा.

“मुझे नहीं बंधना किसी बंधन में....”

“बंधन में नहीं बंधना मतलब? हे भगवान कहीं तुम लिव इन... तो नहीं सोच रही.” माँ की आँखे फ़ैल गयी.

“अरे नहीं माँ! आप भी क्या सोचने लगीं. इतने कच्चे नहीं हैं आपके दिए संस्कार कि आपकी बेटी लिव इन रिलेशन-विलेष्ण के चक्कर में पड़ जाये. मैं पुरुष के साथ किसी बंधन में ही नहीं बंधना चाहती.” वीथी ने बात स्पष्ट की.

“ऐसा क्यों लेकिन. ये फैसला कैसे लिया तुमने अचानक?” माँ आशंकित हो गयीं, कहीं किसी पुरुष ने....

“अचानक नहीं माँ बहुत बचपन से ही तय कर रखा है आपकी स्थिति देखकर.” वीथी झिझकते हुए बोली.

“मेरी स्थिति देखकर? मुझे ऐसा क्या दुःख है?” माँ बहुत बुरी तरह से चौंक गयी.

“दुःख क्या? मैंने क्या देखा नहीं, पापा कितने डिमांडिंग रहें हैं शुरू से. आपकी तो पूरी उम्र उनके पीछे नाचते ही गुजर गयी.” वीथी ने अपने मन की सारी बातें आज खुलकर कह सुनाई

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जो वह बचपन से देखती आई थी.

सुनकर पहले तो माँ चकित हुई, फिर देर तक हंसती रही. फिर कहने लगी-

“तुम अपने मन से ही रिश्ते का और पिताजी का बस एक ही रूप देखती रही. तुमने बस यही देखा की पिताजी बहुत डिमांडिंग हैं. यह नहीं देख पायी की वे उससे भी अधिक केयरिंग थे. बहुत छोटी थी तुम जब एक बार मैं गिर पड़ी थी. रीढ़ की हड्डी में चोट आने की वजह से डॉक्टर ने मुझे जरा भी हिलने-डुलने को मना किया था. तब पूरा एक महिना तुम्हारे पिताजी ने ऑफिस से छुट्टी ली और मेरी देखभाल की. मैं तो बाथरूम तक भी नहीं जा सकती थी. सोचो अगर तुम्हारे पिताजी नहीं होते तो मेरा क्या होता?”

वीथी आश्चर्य से सुन रही थी पुरुष के इस रूप के बारे में.

“दरअसल सच तो यह है की तुम्हारे पिताजी ‘डिमांडिंग’ नहीं बल्कि ‘डिपेंडेंट’ हैं. बच्चे की तरह ही वो अपनी जरूरतों के लिए मुझपर निर्भर है.” माँ ने प्यार से मुस्कुराते हुए कहा “और यह मत भूलो कि सिर्फ उनकी वजह से ही मैं तुम्हारी जैसी प्यारी बेटी को पा सकी. वह पुरुष ही है जो अपने प्रेम से स्त्री को मातृत्व का सुख देकर उसे पूर्णता प्रदान करता है.”

“लेकिन उन्होंने आपको नौकरी कहाँ करने दी. घर बिठाकर आपके सारे सपने तो तोड़ दिए न. उच्च शिक्षित हैं आप पता है मुझे कि आप अपने जीवन में करियर की कितनी उंचाई पर पहुंचना चाहती थीं.” वीथी ने अपनी आखरी शंका भी प्रकट कर ही डाली.

“हाँ मैं एक सफल करियर बनाना चाहती थी सच है. नौकरी भी करती थी. इसलिए शादी भी थोड़ी देर से ही की थी मैंने. शादी के बाद भी नौकरी कर ही रही थी लेकिन जब तीन साल बाद तुम्हारा जन्म हुआ तो मातृत्व का जो अवर्णनीय सुख मिला उसके आगे करियर, सफलता जैसे शब्द बेमानी लगने लगे. तब मेरा ही फैसला था की मैं जॉब नहीं करूंगी क्योकि मैं हर एक पल तुम्हे बढ़ते देखना, तुम्हारे साथ ही रहना चाहती थी. पिताजी ने तो बहुत चाह था की मैं बंधन में न रहकर अपने अस्तित्व का विकास करके सपने पुरे करूँ लेकिन मैं ही तुमसे कुछ घंटे भी अलग रहने का सोच नहीं पायी.” माँ की आँखों में वीथी के लिए ढेर सारा प्यार और ममता छलक रही थी.

वीथी पुरुष के इस नये स्नेही रूप का विश्लेष्ण करने लगी मन की ग्रंथियां खुल रहीं थीं.

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पूर्वाग्रह और मन पर जमी गलत धारणाओं की काई धीरे-धीरे उतरने लगी थी. कारण क्या था माँ का अपनी जॉब छोड़ने का और वह जीवन भर पिताजी को दोषी मानती रही.

“तो अब बुआ को फोन लगाऊं?” माँ ने दस मिनट के मौन के बाद पूछा.

“बुआ को नहीं माँ कोई और है जो...” कहते हुए वीथी ने वरुण से हुए पूरी बात बता दी.

“यह तो बहुत ही ख़ुशी की बात है. देखाभाला सभ्य, सुसंस्कृत लडका है. हमें स्वीकार है. लेकिन अब तुम यहाँ क्या बैठी हो, जाओ उसे फोन करके खुशखबरी सुनाओ की तुम शादी के लिए राजी हो.” माँ ने मुस्कुराते हुए कहा.

“फोन पर नहीं माँ मैं उससे मिलकर ही सुनूंगी. उस दिन ना कहकर उसके चेहरे पर एक उदासी सी स्याही फैला दी थी अब हाँ बोलकर उसके चेहरे पर छाई ख़ुशी की चमक भी देखना देखना चाहती हूँ.” वीथी ने कहा.

“ठीक हैं.” माँ बोली फिर संजीदा स्वर में बोली “हाँ थोड़े समझौते करने पड़ते हैं रिश्तों को निभाते हुए लेकिन ये सिर्फ स्त्री को ही नहीं पुरुष को भी करने पड़ते हैं, बस फर्क है तो ये की वो कभी जताते नहीं. परन्तु बदले में जो प्यार, जो साथ जो सुख मिलता है न वो अनमोल होता है.”

तभी अंदर से पिताजी ने माँ को आवाज लगाई.

“जाइए आपके ‘डिपेंडेंट’ बुला रहे हैं.” वीथी ने हंसते हुए माँ को छेड़ा.

“बदमाश कहीं की” माँ ने हंसते हुए उसके सर पर एक चपत लगाई.

और चार दिन बाद वीथी वरुण के साथ बैठी थी उसी पार्क में और उसकी हाँ सुनने के बाद वरुण उसे छेड़ रहा था- “लेकिन रिश्ते तो बड़े डिमांडिंग होते हैं न, सारी उम्र खर्च हो जाती है.” तिरछि नजर से उसे देखते हुए वरुण बोला.

“रिश्ते डिमांडिंग तो होते हैं, लेकिन केयरिंग भी तो होते हैं. अब मैं समझ गयी हूँ. वीथी ने उसका हाथ थामते हुए कहा. वरुण ने भी प्यार से उसका हाथ थपथपा दिया.

6

“चलो एक चीज दिखाता हूँ.” कहकर वरुण उसे थोड़ी दूरी पर ले गया “वो देखो गुलमोहर के पेड़ का सहारा लेकर तुम्हारी बोगनवेलिया कितनी ऊंचाई तक पहुंचकर खिल रही है. गुलमोहर से भी ऊँची. मैं वादा करता हूँ तुम्हारे लिए हमेशा गुलमोहर का पेड़ बना रहूँगा. सहारा दूंगा, साथ दूंगा और तुम अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ खूब फलना-फूलना.”

वरुण ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो वीथी ने उसके कंधे पर सर रख दिया. सामने हरेभरे गुलमोहर से लिपटी, इठलाती बोगनवेलिया अपनी डालियाँ फैलाए आसमान में झूम रही थी


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