Vinita Rahurikar

Inspirational


3.8  

Vinita Rahurikar

Inspirational


सीट नम्बर 37 के सामने

सीट नम्बर 37 के सामने

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ट्रेन अपनी मद्धम रफ्तार से चल रही थी। अजय अपने विचारों में खोया हुआ खिड़की से बाहर निर्निमेष दृष्टि से देख था। खिड़की के बाहर एक-एक करके पेड़, पौधे, मकान, गाँव और पोखर-तालाब ट्रेन की ही गति से विपरीत दिशा में चले जा रहे थे। 

लेकिन अजय की दृष्टि में कुछ नहीं आ रहा था। वह तो शून्य में तकते हुए अपने अतीत को देख रहा था जो कुछ ही घण्टों पहले सच था, वर्तमान था परन्तु अचानक ही ऐसा लगने लगा है कि जाने कितने बरसों पुरानी बात है। जबकि उसे घर छोड़े हुए मात्र छह घण्टे ही हुए हैं फिर भी ट्रेन के इस डिब्बे की इस सीट पर बैठने के बाद से जैसे एक पूरा युग गुज़र चुका है और वो सारा जीवन पिछले जन्म की बात लगने लगी है।

एक-एक कर माँ, बाबूजी, नैना, सोना सब याद आने लगे और अजय की आँखों मे आँसू आ गए। उसने खिड़की के सरियों के बीच मुँह करके आँखे पोंछ ली ताकि सबको लगे कि हवा के कारण उसकी आँखों में पानी आ रहा है। 

ट्रेन धीमी होते हुए एक हिचकोले के साथ किसी स्टेशन पर रुकी। छोटा सा कस्बा ही था। साधारण सा स्टेशन। दस-बीस लोग प्लेटफॉर्म पर इधर-उधर हो रहे थे। एक खोमचे वाला, एक चाय का कंटेनर लिए हुए और एक समोसे की डलिया लिए हुए खिड़की के सामने से निकलने लगे। 

चाय के कंटेनर को देखकर अजय को चाय पीने की इच्छा हुई। आज उसने चाय कहाँ पी है सुबह से। देर रात ही तो सबको नींद में छोड़कर चला आया था वह घर से। और स्टेशन पर टिकट खरीदकर जो ट्रेन सामने दिखी उसी में बैठ गया था। उसने चाय वाले को पास बुलाया और एक कप चाय ले ली उससे। दो घूँट चाय पेट में जाते ही जैसे भीतर जमा हुआ कोहरा छँटने लगा। उसने अपने आसपास देखा अब। पास में बैठे लोग उतर गए थे। सामने वाली सीट पर एक वृद्ध दम्पति बैठे थे। सीट के नीचे चादरों की पोटलियाँ रखी थी। एक लोहे का सन्दूक रखा था जिस पर पुराना ताला टँगा था। ऊपर सामने वाली सीट पर कोई मुँह ढँके सो रहा था।

अजय चुपचाप चाय के घूँट भरने लगा। पिछले काफी समय से घर के हालात बहुत तंग चल रहे थे। उसका बापू दर्जी था। लोगों के कपड़े सिलकर जैसे-तैसे घर का खर्च चलाता है। छोटा सा कस्बा होने से सिलाई तो ज्यादा मिलती ही नहीं। क्योकि कस्बे में कमोबेश सभी तो गरीब या साधारण परिस्थिति के ही लोग हैं। माँ पास वाली बस्ती में कुछ घरों में बर्तन माँज कर खर्च में काफी हाथ बंटा देती है और साथ ही लोगों के घरों से सिलाई के कपड़े भी ले आती है। नैना साड़ियों में फॉल लगा देती है। और सोना...


उसकी सीट पर एक परिवार आ बैठा। पति-पत्नी और तीन बच्चे। दो लड़कियाँ और एक लड़का, सात-आठ साल का। अजय ने तीनों बच्चों को बड़े ध्यान से देखा। उसे अपना परिवार याद आ गया और उसकी आँखें फिर भर आयीं। 

पति-पत्नी दोनों छोटी लड़कियों को अपनी गोद में लेकर उसकी सीट पर बैठ गए और लड़का सामने वाली सीट पर वृद्ध दम्पति के साथ खिड़की के पास बैठ कर बाहर देखने लगा। ट्रेन ने सिटी दी और थकी हुई सी पटरियों पर रेंगने लगी। 


अजय की सोच फिर अपने परिवार पर चली गयी। कस्बे के सरकारी स्कूल में ही तीनों की पढ़ाई हुई। पिता की इच्छा थी कि अजय तो कम से कम आगे पढ़ ले। माँ ने अपने काम वाले घरों से उधार ले-ले कर अजय को पास के शहर के कॉलेज में पढ़ने भेजा। जैसे-तैसे अजय बी.कॉम. कर पाया। लेकिन ग्रेजुएट को नौकरी देता कौन है। अनपढ़ माता-पिता के लिए तो वह "बहुत पढ़ा लिखा बाबू साहब" है, वे फूले नहीं समाते उस पर गर्व करते लेकिन बाहर की विशाल दुनिया में उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। न उसकी डिग्री किसी काम की, उनके लिए उसकी कीमत एक कागज़ के बेकार टुकड़े से अधिक कुछ नहीं। इधर माता-पिता की उम्मीदें और उधर बाहरी दुनिया की उपेक्षा और निरन्तर असफलता ने उसे बुरी तरह तोड़ दिया। वह अवसादग्रस्त हो गया। इससे तो वह अनपढ़ रहता तो ही अच्छा था कम से कम मेहनत मजदूरी तो कर पाता। 

अभी तो वह अधर में लटक गया है, अजीब हो गई है उसकी स्थिति। न वह बड़े बंगलों में रहने वालों की गाड़ियाँ धो पाता क्योंकि उसे वह काम छोटा लगता और न उसे कहीं ढंग की नौकरी ही मिल रही है। पिछले चार साल से वह रोज दिन भर चप्पलें घिस कर शाम को गर्दन झुकाए माता पिता और बहनों की आशा भरी आँखों को निराशा से झुका देता। रात में रोटी का कौर बड़ी मुश्किल से गले से उतरता। कोई कुछ नहीं कहता लेकिन घरवालों की चुप्पी दिन पर दिन उसे असह्य होती जा रही है। सब अपने अपने काम में लगे रहते। एक वही है जो निकम्मा बैठे बैठे टुकड़े तोड़ता रहता है।

बहने बड़ी हो गई हैं। माँ के बालों में सफेदी बढ़ती जा रही है। पिता के चेहरे पर झुर्रियाँ बढ़ती जा रही हैं। भरी जवानी में वह नकारा है और बूढ़ा पिता काम मे खटता रहता है।

और अजय बस दिन भर अपनी डिग्री को कोसता है। यह कमबख्त नहीं होती तो वह आराम से कहीं मजदूरी कर लेता। यूँ जीवन में अंधेरा तो नहीं होता। अब तो उम्मीद की एक भी किरण नहीं दिखाई देती। जीवन की घुटन से वह घबरा गया था। घर में नैना के ब्याह की चिंता होने लगी है। आठ दिन पहले से नैना ने भी माँ के साथ दो घरों में काम पर जाना शुरू कर दिया था तबसे अजय को लग रहा था जैसे किसी ने उसे भरे बाजार गाल पर तमाचा मार दिया है। बस उसी दिन से उसे घर में रहना दुश्वार लगने लगा। अपना आप तुच्छ लगता। घरवालों पर बोझ लगता। बहन को बड़े भाई का बोझ उठाना पड़े इससे बढ़कर शर्म की बात और क्या होगी। वह यह अपमान और अपनी अकर्मण्यता सह नहीं पाया।

अब घर में उसे बहन की कमाई के टुकड़े खाने पड़ते। उनकी दया पर जीना होगा। किसी का ताना न मारना, कुछ न कहना और तोड़ देता उसे। 

और कल की रात जेब में थोड़े से रुपये लेकर वह निकल आया था, न जाने कहाँ जाने के लिए। टिकट खरीदकर जो पहली ट्रेन दिखी वह उसी में बैठ गया। कुछ नहीं सोचा उसने बस निकल गया। सहारा नहीं बन सकता तो बोझ भी तो न बने उन पर। बस कई दिनों से यही सोच दिमाग में घर कर बैठी थी। चारों तरफ सिवाय अँधेरों के कुछ नजर नहीं आता था।


उसका दिमाग फटने लगा। उसने विचारों को झटकने के लिए इधर-उधर देखना शुरू किया। बगल में बैठी लड़कियों में से बड़ी लड़की माँ की गोद में सो रही थी। छोटी वाली पिता की गोद में बैठी खेल रही थी। अजय को फिर नैना-सोना की याद आ गई और उसका मन भर आया। वह वहाँ से ध्यान हटाकर सामने देखने लगा। 

वृद्ध दम्पति बहुत थके हुए, निराश, हारे हुए दिख रहे थे। जीवन की कोई उमंग नहीं, आँखें निस्पृह, देह जैसे निस्पंदन। कृशकाय देह, एक यतीम लाचारी सर से पाँव तक। मरे नहीं है इसलिए साँसों की गति चल रही है। जीवन की दयनीयता की साक्षात प्रतिमूर्ति। पता नहीं सच में अथवा अजय को अपनी मनःस्थिति के कारण लग रहा था। उसे उन वृद्ध दम्पति में अपने माँ-बाबू दिखने लगे। उसके माथे पर पसीना छलक आया। उसके न रहने पर वे भी ऐसे ही करुण, एकाकी, असहाय हो जाएँगे। 

अजय ने उधर से भी दृष्टि घूमा ली। वह खिड़की के पास बैठे लड़के को देखने लगा। लड़का खिड़की पर हथेली रखकर बार-बार मुट्ठी बन्द करता मानो कुछ पकड़ रहा हो, फिर कौतूहल से मुट्ठी की झिरियों से झाँकता और फिर हथेली खोल कर मुस्कुरा देता। फिर बड़े जतन से उंगलियाँ पास लाकर मुट्ठी बन्द करता। अजय देर तक उसका खेल देखता रहा। उसे समंझ नहीं आया वो लड़का क्या पकड़ रहा था। हवा को या कुछ और।

कुछ देर बाद अजय से रहा नहीं गया। उसने लड़के से पूछ ही लिया-


"तुम यह क्या पकड़ रहे हो बच्चे?" 

"मैं धूप को पकड़ रहा हूँ।" लड़का बोला। 


तब अजय का ध्यान गया। सूरज ट्रेन की खिड़की की ऊँचाई तक पहुँच गया था और खिड़की पर उसकी किरणें झिलमिला रही थीं। 


"धूप भी भला कोई पकड़ सकता है?" अजय ने दार्शनिकों की तरह कहा।

"मैं पकड़ सकता हूँ।" लड़का बड़े आत्मविश्वास से बोला "यह देखो मेरी मुठ्ठी में धूप है।" 


कहते हुए लड़के ने अपनी मुट्ठी खोल दी और हथेली फैला दी। उसकी हथेली पर किरणें झिलमिला रही थीं।


"यह तो तुमने हथेली खोली इसलिए। बन्द मुट्ठी में कोई धूप को पकड़ थोड़े ही सकता है। बन्द मुट्ठी में तो सदा अंधेरा ही रहता है बच्चे।" अजय ने बड़े गम्भीरता से उसे जीवन का दर्शन समझाना चाहा। 


"बन्द मुट्ठी में वही होता है जो हम सोचते हैं। जो हमारे दिमाग में होता है। मैं सोचता हूँ कि मेरी मुट्ठी में धूप है तो मेरे लिए है। 

आप अंधेरा सोचते हो इसलिए आपको मुट्ठी में अंधेरा लगता है।" लड़के ने अकड़ कर कहा। उसने अजय को ऐसे देखा जैसे वह कितना नादान, नासमझ है जिसे मुट्ठी के भीतर का इतना सा सच भी नहीं पता।


"मैं धूप सोचता हूँ इसलिए मेरी मुट्ठी में धूप ही भरी हुई है। मैं अंधेरा नहीं सोचता। और क्यों सोचूँ जब मैं धूप सोच सकता हूँ तो।" लड़का बहुत आत्मविश्वास से बोला और फिर अजय पर से ध्यान हटाकर अपने खेल में मग्न हो गया। 

लड़के की बात सुनकर पहली बार वृद्ध दम्पति मुस्कुराए। उनकी झुर्रियों में कहीं जीवन की सलवटें दिखाई देने लगी। आँखों मे जीवन की हल्की सी चमक कौंध गयी। देह में स्पंदन दौड़ गया और उन्होंने लड़के के सर पर हाथ फेर दिया। 

पिता की गोद में बैठी छोटी लड़की अचानक किसी बात पर किलकारी मारकर हँसने लगी। भाई ने खुश होकर अपने बहन को देखा और हाथ बढ़ाकर उसे पिता की गोद से लेकर अपनी गोद में बिठा लिया। अब वह अपनी बहन को भी मुट्ठी में धूप भरने का खेल सिखाने लगा। वह हथेली खोलता तो बहन भी खोलती, फिर वह बन्द करता तो बहन भी मुठ्ठी बन्द कर लेती फिर दोनों हथेली फैलाकर उस पर झिलमिलाती धूप देखकर खुश होते और किलकारी मारकर हँस देते। 

वृद्ध दम्पत्ति के चेहरों पर अब मुस्कान चौड़ी होती जा रही थी। आँखों मे ममत्व झलकने लगा। बच्चों के माता-पिता विभोर होकर देख रहे थे। ऊपर की सीट पर सोया आदमी जागकर कौतूहल से दोनों का खेल देख रहा था।

बगल वाली दोनों सीट पर बैठे यात्री भी गम्भीरता का चोला उतार मुस्कुरा रहे थे।


अजय देख रहा था कि किस तरह एक भाई मन प्राण से अपनी बहन की हथेली में धूप भरने की चेष्टा कर रहा है और एक भाई वह है जो अपनी मुट्ठी का अंधेरा अपनी बहनों की हथेलियों में भरकर भाग आया। भाग तो आया लेकिन भागकर जाएगा कहाँ। अपनी अकर्मण्यता, असफलता तो साथ ही ले आया। जिससे सारी तकलीफें थी, जो सभी मुसीबतों की जड़ है वह झूठा अहम तो अब भी सर पर बैठा हुआ है। अभी भी तो दो जून रोटी के लिए कहीं किसी बंगले पर गाड़ी ही धोनी होगी या सड़क पर मजदूरी करनी पड़ेगी। 

तो अपने घर रहते ही क्या बुरा था। अजय की सोच पहली बार परिवार की ओर गयी। माँ की हालत कितनी खराब होगी। बाबू कस्बे भर में ढूंढ रहे होंगे उसे। सोना-नैना दीवार से टिकी दुख में स्तब्ध शून्य में ताक रही होगी।

क्या वह इतना नकारा है कि थोड़ा श्रम करके दो सुखी रोटी नहीं कमा सकता। किस बात का इतना अहम है उसे, उस डिग्री का जिसका कोई मोल नहीं, जो उसे दो जून की रोटी नहीं खिला सकी। उसके लिए वह उस बाबू को छोड़कर आ गया जो जन्म से उसे रोटी खिला रहा है। 

अजय की आँखों से अब आँसू की मोटी बूँदें गिर पड़ी।

सोना पास वाली कॉलोनी के एक पार्लर में काम करने जाती है। साफ-सफाई का काम करते हुए धीरे-धीरे उसने धागा चलाना और मेकअप, मेंहदी के गुर भी सीख लिया। अब दो पैसा वह भी ले आती है घर।

लेकिन वो...

लड़का क्या सच ही कह रहा है कि मेरी सोच में ही अंधेरा है। क्या मेरी हथेली में एक भी किरण नहीं उजाले की। 

बहुत सालों का जमा अवसाद और कुंठा पिघलने लगी। सीने में कुछ अटक गया। रात घर छोड़ने का जो उन्माद अचानक दिमाग पर हावी हो गया था वो उतरने लगा। घरवालों की बेतरह याद आने लगी। 

एक छोटा सा लड़का आठ लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट ला सकता है, अपनी मुट्ठी में धूप भरने का विश्वास रखता है और वो...

खुद पर अचानक शर्म आने लगी, मन ग्लानि से भर गया। लड़का अभी भी अपनी बहन की हथेली में धूप भर रहा था। धूप की चमक अब उसके चेहरे से होती हुई पूरे कम्पार्टमेंट में फैल गयी थी। सबके चेहरों पर छा गई थी।

अजय ने धीरे से अपनी हथेली भी खिड़की पर रख दी। धीरे से मुट्ठी बंद करके फिर खोल दी। हथेली पर धूप झिलमिला रही थी।

करने को बहुत से काम हैं। आज का छोटा काम कल बड़ा भी हो जाएगा। छोटा काम पैसा न सही पर अनुभव तो देगा। बाहर ही जाना हो तो घरवालों से कहकर भी जाया जा सकता है।


ट्रेन की गति धीमी होती हुई आखिर में एक हिचकोला खाते हुए थम गई। अजय उठ खड़ा हुआ।


"आपका स्टेशन आ गया क्या?" लड़के ने पूछा।

"नहीं, ये मेरा स्टेशन नहीं लेकिन मैं समझ गया कि मेरी मुट्ठी में भी धूप है।" अजय ने मुस्कुराते हुए कहा "अब मैं भी अपनी बहनों की हथेली पर धूप रखने जा रहा हूँ।"


"देखा पता चल गया न आखिर कि मुट्ठी में धूप हमेशा होती है। अंधेरा तो दिमाग में होता है।" लड़का अपनी समझ पर बड़े गर्व और प्रौढ़ता के साथ बोला।

"हाँ दोस्त, शुक्रिया" अजय ने कहा।


लड़का फिर अपने खेल में मगन हो गया। कम्पार्टमेंट के सभी यात्री मुस्कुरा रहे थे। अजय स्टेशन पर उतर गया। आते हुए उसे मालूम नहीं था कि वह कहाँ जा रहा है लेकिन अब उसे अपना गंतव्य पता था। टिकट खिड़की से उसने अपने कस्बे का टिकट लिया और ट्रेन का समय पूछ कर इंतज़ार करते हुए बेंच पर बैठ गया।

उसने अपनी हथेली फैलाई, धूप आकर उस पर बैठ गयी। अजय ने उस धूप को मुट्ठी में भर लिया।



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