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Kunda Shamkuwar

Abstract Others

4.7  

Kunda Shamkuwar

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घर आना…

घर आना…

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आज फिर से हम मिले। हम बहुत दिनों के बाद मिल रहे थे।

हम बहुत देर तक बातें करते रहे। वह मुझसे अंतरंग बातें करती रही….बातों के दरमियान हम चाय ले रहे थे। बातचीत के दरमियान वह हेजिटेट होकर रुक गयी। मैंने कहा, "क्या हुआ?" वह कहने लगी, "एक बहुत पुरानी बात याद आ गयी हैं।" मैंने कहा, " बताओं, तुम मुझे बता सकती हो…" "लेकिन तुम हँसना मत…" "अरे, नहीं…बिल्कुल नहीं… तुम तो मेरा नेचर जानती हों… बता दो, तुम्हारे दिल से बात भी निकल जाएगी।"

वाह कहने लगी, "हाँ, तुम सही कह रही हो… हाँ,  बेहद पुरानी बात हैं…एक दिन ऐसा हुआ की शाम को ऑफिस से निकली तो थी मैं घर जाने के लिए लेकिन वापस घर जाने का मन ही नहीं हो रहा था मुझे।" मैंने कहा, "क्या मतलब? घर नहीं जाना मतलब?" "मतलब घर नहीं जाना…" मुझे अचरज हुआ। क्योंकि मेरे सामने जो व्यक्ति बैठी थी वह एक वर्किंग वुमन थी… एक फाइनेंशियल इंडिपेंडेंट वुमन…जो मैरिड थी…पति था और उसके बच्चें भी थे । उसके लिए वह एक सेंटेंस भर था…अपनी पुरानी कोई याद शेयर करनेवाला सेंटेंस…

लेकिन मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी…क्या नहीं होनी चाहिए थी?

मैंने अपने जहन में आते सारे सवालों को झटक दिया और उसकी ओर मुख़ातिब होते हुए पूछा, "फिर? तुम कहाँ जाना चाहती थी?" वह कहते कहते रुक गयी…मैंने अधीर होकर पूछा, "फिर तुमने क्या किया?"

"पता नहीं क्यों उस दिन मैं घर वापस ही नहीं जाना चाहती थी।मेरे घर की तरफ़ जानेवाले मेरे कदम दूसरी ओर मुड़ते गये…मैं एक पार्क में बैठ गयी गयी..अपना फ़ोन भी साइलेंट मोड में कर लिया…" मैंने कहा, "लेकिन शाम को? कितनी देर तक बैठना हो सकता था शाम को? रात भी तो होने वाली थी? घर से ज़्यादा क्या खुले आसमाँ में बैठना सेफ था?"

"हाँ, मुझे वहाँ ज़्यादा सेफ लग रहा था…तुम कह रही हो वह सब ठीक हैं लेकिन मैं फिर भी वही बैठी रही। घर जाने का मन ही नहीं हो रहा था।"

"लेकिन क्यों? तुम्हें ऐसे कैसे लग रहा था? ऐसा कैसा हो सकता हैं? क्या था वह सब? क्या तुम्हारे घर में कोई नहीं था? या सब लोग थे?" मेरे सवाल ख़त्म नहीं हो रहे थे।वह स्ट्रैट मेरी आँखों में देखते हुए कहने लगी, " सभी घर में ही थे।" "बच्चें भी?" मेरे यह कहते ही वह कहने लगी, " हाँ, बच्चें भी तो स्कूल से आकर घर में ही थे।"

मैं फिर से एकबार अचरज से देखने लगी। मेरे पास फिर से सवालों की एक लंबी लाइन थी… लेकिन वह?

आज वह शांत थी शायद उस वक्त उसकी कैफ़ियत कुछ और होगी।

मैंने सवालिया निगाहों से उसकी और देखा… वह शायद मेरे सवालों को भाँप गयी और आगे बढ़ते हुए कहने लगी, "तुम जानती नहीं, मेरे हसबैंड न तो कोई काम करते थे उल्टा शराब पीकर घर आते थे और उनका बर्ताव मेरे साथ बिल्कुल भी ठीक नहीं था।" वह एक झटके से बोल पड़ी।"फिर आगे क्या किया?कुछ ही देर उस पार्क में मैं बैठी रही बिल्कुल…थोड़ी ही देर में रात होने लगी..लेकिन फिर भी मैं बैठी रही… थोड़ी रात होने पर हसबैंड का फ़ोन आया।मैंने फ़ोन नहीं उठाया।मेरा मन ही नहीं हुआ उनसे बात करने का…थोड़ी और देर के बाद फिर से फ़ोन आया। देखा तो फ़ोन मेरी फ्रेंड का था शायद हसबैंड ने उसे पूछा होगा। मैंने फ़ोन उठाया, उसने कुछ नहीं पूछा बल्कि फ़ौरन अपने घर आने को बोला। हम दोनों के मोहल्लें पास पास थे…मैं अपने मन मन के पाँव से उसके घर गयी। बिना कुछ बोले उसने चाय बनाकर दी जिसकी मुझे उस वक्त बेहद ज़रूरत थी। चाय पीने के बाद उसने मुझे कहा, "अभी घर जाओ क्योंकि रात ज़्यादा होने लगी हैं। तुम्हारे पति का फ़ोन आया था। वह परेशान लग रहे थे।कल दिन में बात करते हैं… एवरी प्रॉब्लम हैज इट्स ओन सलूशन…"

मैं घर वापस आ गयी थी। बच्चें पूछने लगे, "मम्मा आज आप ऑफिस से बहुत लेट आयी हो।"मैंने कहा, "हाँ, बेटा, आज ऑफिस में बहुत काम था…"

मैं उस वक़्त की उसकी कैफ़ियत समझ गयी… मेरे सभी सवालों के जवाब मिल गए। शायद कुछ सवालों के जवाब नहीं होते या फिर उनके जवाब दिए नहीं जाते…

हाँ, वह अब बिल्कुल शांत हो गयी…शायद यह बात उसके दिलोदिमाग़ पर काफ़ी अरसे से क़ाबिज़ होगी…आज उसको वेंट आउट जो मिल गया था…


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