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Kunda Shamkuwar

Abstract Others

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Kunda Shamkuwar

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पुराने ख़त

पुराने ख़त

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किसी ज़माने में कभी ख़त लिखे जाते थे…

और मज़मून भी लिफ़ाफ़ा देखकर भाँपा जाता था…ख़तों और चिट्ठियों के लिए अंतहीन इंतज़ार हुआ करता था…चिट्ठी को घर लानेवाला डाकिया न होकर वह जैसे कोई दूत लगता था…उन पलों को और उनसे बावस्ता सभी यादों को सहेजने के लिए ख़तों को किसी संदूक या दराज़ में संभालकर रखा जाता था…उसमे लिखें मज़मून की यादें उस काग़ज़ की ख़ुशबू में बसा करती थी…

लेकिन आज? आज ज़माना बदल गया हैं…अब तो बस एक क्लिक और मैसेज सेंट…न तो किसी डाकिये की चिंता और ना ही उसका इंतज़ार भी…ईमेल के फॉर्मल और प्रोफ़ेशनल मैसेज…एकदम ड्राय लेटर्स...और बस इनफार्मेशन..एसएमएस के शॉर्ट मैसेज…ह्वाट्सऐप के कामकाज़ी मैसेज या फिर गुडमॉर्निंग गुडनाइट वाले मैसेज…इन ईमेल, टेक्स्ट और ह्वाट्सऐप मैसेज में उन ख़तों जैसी ख़ुशबू हो सकती हैं भला?

ऑफिस से थक कर आने के बाद भी मेरा मन अटकने लगता हैं दराज़ों में रखें उन पुराने ख़तों में…उस सुरमयी शाम का ही कुछ असर था शायद…मैं किसी नॉस्टेल्जिया में उन दराज़ों की तरफ़ मूडने लगती हूँ…न चाहते हुए भी मैं वह पुरानी दराज़ ढूँढने लगती हूँ…कई मुड़े तुड़े ख़तों में मुझे एक पुराना ख़त मिला…गुलाबी लिफ़ाफ़े में…वह ख़त था मेरे अल्हड़ प्रेम का…अल्हड़ उम्र का अल्हड़ प्रेम…उस मज़मून में..उस ख़त में बस प्रेम था…आज उम्र के पाँचवे दशक में मैं एक वर्किंग वुमन हूँ जिसकी अपनी एक प्रोफ़ेशनल लाइफ़ हैं…आज की अपनी प्रोफेशनल लाइफ़ में मुझे वह ख़त और अल्हड़ प्रेम का वह मज़मून बेहद बचकाना लगता हैं…उस बचकाने मज़मून को पढ़ कर मैं हँसने लगती हूँ…हँसने ही लगती हूँ…

आज इतने सालों के बाद उस दराज़ में रखें सारे ख़तों की क्या बिसात?लेकिन फिर भी मैं उन ख़तों में बसी ख़ुशबू में खों जाती हूँ…किसी नॉस्टेल्जिया की तरह मैं उन पलों में खोनें लगती हूँ…अचानक फ़ोन में आये ईमेल के नोटिफिकेशन से फिर हक़ीक़त की दुनिया में वापस आती हूँ…बिल्कुल किसी प्रोफेशनल की तरह मैं ईमेल ओपन करती हूँ…उस ईमेल में फ़क़त और फ़क़त इनफार्मेशन थी…बस एक इनफार्मेशन…

मेरा मन फिर से उलझने लगता हैं…अचानक आहट होने पर मैं मूड के देखती हूँ…पीछे पति खड़े थे…ऑफिस के बाद क्लब से वापस आकर वह चाय के लिए मुझे ढूँढ रहे थे…मुझे काग़ज़ के पुराने ख़तों और चिट्ठियों के साथ देख उनको मेड के ना आने का यकीन हो गया था…वी आर मेड फॉर इच अदर..लेट्स हैव टी टुगेदर कहते हुए हम दोनों चाय के लिए चल पड़े…पीछे रह गये वे सारे ख़त…और वहाँ बिखरीं पुरानी यादें भी…



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