एक शहर का अजनबी होना
एक शहर का अजनबी होना
कभी यह शहर मुझे अजनबी लगता था
और इस शहर को मैं…
हर तरफ़ अजनबी लोग…
हर तरफ़ भागते लोग…
एक कॉस्मोपॉलिटन शहर की तरह…
यह भी तो एक कॉस्मोपॉलिटन शहर था…
लेकिन धीरे धीरे यह शहर और मैं एक दूसरे से घुलने मिलने लगे…
धीरे धीरे हमारी अजनबियत मिटने लगी
अमूमन जैसे रिश्तों में होता हैं…
कभी पास कभी दूर…
इस शहर से मैं भी एक रिश्ते में बंधने लगी…
एक शहर और उसके बाशिन्दों का रिश्ता…
धीरे धीरे इस शहर को मैं जानने लगी…
अपने बाशिंदों को आशियाना देता यह शहर…
उनको रोज़ी रोटी देता यह शहर…
उनके ख़्वाब सँजोता यह शहर…
दुनिया को रंगबिरंगी बनाने वाला शहर…
धीरे धीरे इस शहर में मैं रमने लगी…
क्योंकि यहाँ इतिहास की धरोहरें थी…
चमकदार बड़े बड़े मॉल्स भी थे…
नाटक,सिनेमा और रंगीन लाइट्स की चकाचौंध थी…
किताबें, फैशन की भरमार भी थी
यह शहर था ही बेहद ज़िंदा दिल…
किसी फेयरी टेल की मानिंद…
लेकिन कुछ दिनों से शहर पर धुंध छा रही हैं
हवा बदली बदली सी लगने लगी हैं…
कभी पंगा नहीं लेनेवाला शहर अब दंगा करने लगा हैं
भाषा और धर्म के फेर में पड़ने लगा हैं…
जाने क्या कुछ बदला हैं शहर में अब …
शहर का मिज़ाज ही बदल गया हैं अब…
