sushant mukhi

Abstract Drama

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sushant mukhi

Abstract Drama

एक धागे से बना रिश्ता

एक धागे से बना रिश्ता

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वक़्त यही कुछ 9 सवा 9 का था। प्रिया ट्यूशन से घर लौट रही थी। रीमा और प्रिया एक साथ ही ट्यूशन आती जाती है मगर आज उसकी दोस्त रीमा भी उसके साथ नही थी। वैसे तो 8बजे ही क्लास खत्म हो जाती है मगर बेवक़्त बारिश में प्रिया आज ठहर कर आयी क्योंकि उसके पास छतरी नही थी। अब तक बारिश रुक चुकी थी बस ओस की तरह बुन्दे गिर रही थी। प्रिया पैदल अपने घर लौट रही थी मगर रास्ते मे नुक्कड़ के पास उसे कुछ बदमाश दिखे। वो वंहा सिगरेट के धुएं उड़ा रहे थे। प्रिया वंहा से गुजरी तो वो लफंगे उसे घूरने लगे। फिर उसके पीछे पीछे चलने लगे। प्रिया को पीछे से उनके मुह से गीत सुनाई पड़ रहा था जो प्रिया को छेड़ने के लहजे में गाया जा रहा था उनके द्वारा। फिर वो एक दम करीब आ गए।

मगर इतने में एक आदमी अपनी बाइक पर सवार हो उसी रास्ते से आया और प्रिया के पास आकर रुक गया।

बाइक सवार ने कहा ,"अरे छोटी तू यंहा है। पता है घर मे पापा मम्मी कितने परेशान हो रहे है। इतनी छोटी सी बात के लिए तू बैग उठा कर निकल आयी। तेरे को पता पापा पुलिस थाने में भी रिपोर्ट कर दिए है। पुलिस ढूंढ रही है तुझे,,, अच्छा हुआ तू मिल गयी। चल घर चल तेरी शामत आएगी अब। समझना तुम अभी पापा से ,,बहुत गुस्से में है वो। " वो आदमी प्रिया को बहुत जोर जोर से डांट लगा रहा था।

" चल चल ,,, ऐसे देख क्या रही है ,, बैठ जल्दी बाइक पे। घर मे सब परेशान हो रहे है तेरे लिए। " उसने कहा।

बैठो न ..

प्रिया थोडी सी असंजस्य में पड़ी फिर उसे लगा कि बैठ जाना ठीक है क्योंकि आगे रास्ते मे खम्बो की बिजली गुल थी जिससे रास्ता अंधेरा और सुनसान था।

प्रिया बैठ गयी।

वो लफंगे देखते रह गए। पुलिस में रिपोर्ट और बाकी सारी बाते सुन वो ख़ामोश रह गए कुछ कर न सके। मानो उनके हाथ से एक शिकार छूट गया।

थोड़ी दूर जाने के बाद रास्ते मे प्रिया बोली।

मेरा नाम छोटी नही प्रिया है और मैं आपको नही पहचानती हूँ फिर आपने ऐसा ...

हाँ मैं भी तुम्हे नही पहचानता हूँ। दरसअल मेरा नाम राजेश है। मैं काम से घर लौट रहा था। तुम्हे अकेले जाते देख मैंने सोचा कि तुम्हारी मदद कर दूं। मेरी बहन नही तो क्या किसी न किसी की तो बहन हो तुम।

वैसे कंहा जाना है तुम्हे ? राजेश ने पूछा।

" सर्किट रोड " प्रिया ने जबाब दिया।

प्रिया उसकी बात सुन हैरान रह गयी।

कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद प्रिया ने अचानक पूछा , "आपकी कोई बहन है ? "

" हां.. है न। तीन बहने है। " राजेश ने आराम से कहा।

क्यों ? राजेश ने पूछा।

" कुछ नही .. वो तीनो खुश किस्मत वाली है जो आप जैसा भाई मिला है उनको। एक अनजान लड़की को बहन समझ कर मदद करना आजकल के लड़कों में ऐसा गुण कंहा मिलता है। " प्रिया ने संजीदा भाव से कहा।

और तुम्हारे कितने भाई है ? राजेश ने पूछा।

"एक भी नही। न भाई है न पापा। सिर्फ माँ और मैं। "

प्रिया दबी आवाज़ में बोली।

" ओह.. "  राजेश को थोड़ा अफसोस हुआ।

कुछ ही देर में 'सर्किट रोड' यानी प्रिया की मंजिल आ गयी।

" बस यंही रोक दीजिए,, मेरा घर यंही पास में है मैं चली जाऊंगी। " प्रिया ने कहा।

ठीक है।

राजेश ने बाइक रोकी।

प्रिया बाइक से उतर गयी।

" बहुत धन्यवाद आपका। आज आपने मेरी अच्छी मदद की।"  प्रिया ने आभार व्यक्त किया।

" अर्रे कोई बात नही,, इसमे शुक्रिया कैसा। " राजेश ने मुस्कुराते हुए कहा।

प्रिया दो पल रुकी रही जैसे कुछ और भी कहना या पूछना चाहती थी। शायद वो पूछना चाहती थी कि यदि आज से उसके(राजेश) कलाई में तीन बहनों की राखियों के साथ एक और बहन की राखी को जगह मिलेगा क्या.. ?

राजेश भी उसकी आँखों मे कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहा था एक पल के लिए।

मगर प्रिया कुछ कह न सकी और जाने लगी।

इतने में राजेश ने उसे रोका और बाइक से उतर कर खड़ा हो गया । प्रिया समझ नही पाई।

राजेश ने अपने दाहिने हाथ की कलाई आगे कर दी।

ये देख प्रिया खुश हो गई। दोनो एक दूसरे को खुशी से देखने लगे।

पर प्रिया ने मन मे सोचा कलाई पर बांधू क्या ? दुप्पटा फाड़ कर बांध दू या रुमाल। प्रिया ने अपनी कलाई में मौली धागा बांधा हुआ था। उसने तुरंत उस धागे की गांठ खोली और उसे अपने कलाई से उतार कर राजेश के कलाई में बांध दिया।

" आज इस धागे से बांध रही हूँ कल रक्षाबंधन पर राखी बांधूंगी भईया। " प्रिया ने भरे आवाज़ में कहा।

राजेश भी भावुक हो चला था। राजेश ने प्रिया के सर पर हाथ रखा और जल्द मिलूंगा कह कर उससे विदा लिया।

प्रिया की आँखें हल्की सी नम हो चली थी। एक अजनबी से आज भाई का रिश्ता बन गया था।


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