Shubhra Varshney

Abstract


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Shubhra Varshney

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धुंधली आँखें

धुंधली आँखें

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टन्न की आवाज से एकाग्रता भंग होने पर रोहित खीज उठा। अपनी पत्नी मिताली को जोर से आवाज देकर पुकारा ,"क्या हुआ ?"

अपनी कंपनी से मिले प्रोजेक्ट पर काम करते हुए उसने रात दिन एक कर दिए थे और इसमें तनिक भी व्याधान उसको विचलित कर देता था।

उसके पूरे कक्ष में बेतरतीबी से फैली ऑफिस की फाइलें इस बात की सूचक थी कि वह अपने काम में कितना डूबा हुआ था।

उनका शयन कक्ष, शयन के स्थान पर कब रोहित का ऑफिस बन गया था मिताली को पता ही नहीं चला था।

रोहित की परेशान आवाज सुनकर जब मिताली बच्चों के कमरों से निकलकर बाहर आयी तो देखा उसकी सासु मां गायत्री देवी बाहर डाइनिंग टेबल के पास झुक कर जग उठा रही थी।

"मां मुझे बता दिया होता ,क्या कर रही हैं आप?" मिताली चिंतित होते हुए बोली।

"कुछ नहीं बेटा रोहित बहुत देर से काम कर रहा है सोच उसको फल दे आऊं।

वही उठा रही थी तभी गलती से यह जग छूट गया।बच्चे सो गए क्या ?उनको सोते हुए दूध जरूर दे दिया करो?"

गायत्री जी के वात्सल्य से भरे स्वर को सुनकर मिताली का दिल भर आया उसने गायत्री जी से कहा," मां आप सोने चली जाओ मैं देखती हूं।"

गायत्री जी जब बच्चों के पास सोने चली गई तो फल काटती हुई मिताली सोचने लगी कि मां कितनी बीमार रहती है फिर भी वह सबका ध्यान रखने में कोताही नहीं बरतती।

सीने में दर्द की शिकायत के बाद गायत्री जी जांच कराने जब बड़े पुत्र राजेश के साथ रोहित के यहां आई तो पता चला उन्हें माइनर हार्ट अटैक आया था यह जानकर मिताली ने उन्हें फिर अपने यहां ही रोक लिया।

सही उपचार और देखरेख का परिणाम ही था कि गायत्री जी अब स्वास्थ्य लाभ कर रही थी पर उन्हें लगातार सघन निगरानी और चिकित्सा की आवश्यकता थी इसी के चलते गायत्री जी के पहले से हुए स्वास्थ्य लाभ के बाद भी मिताली ने उन्हें जाने नहीं दिया।

बार-बार जांच और चिकित्सक परामर्श के लिए गायत्री जी को अस्पताल ले जाने से रोहित के व्यस्त दिनचर्या में अक्सर बाधा पड़ती थी।

उसे मां के अपने साथ रहने से तो कोई भी आपत्ति नहीं थी परंतु बदलती दिनचर्या और अपनी व्यस्तता बढ़ने के चलते वह अक्सर खीज उठता।

"यह पिछले दिनों में तीसरी बार है जब मां के हाथ से कुछ छूटा है लगता है उन्हें देखने में थोड़ी परेशानी हो रही है।"

मिताली ने रोहित को फल देते हुए कहा।

"अभी तीन महीने पहले ही तो उनका चश्मा बदला है।" रोहित ने लैपटॉप से नजरे ना हटाते हुए कहा।

"फ़िर भी मां को आंखों की जांच के लिए ले जाना चाहिए, वह खुद तो कहेंगी नहीं पर मुझे लगता है उन्हें देखने में थोड़ी परेशानी हो रही है।" मिताली के स्वर में चिंता साफ झलक रही थी।

मिताली और भी कुछ कहना चाहती थी पर रोहित ने उसकी बात काटते हुए कहा, "अच्छा देखते हैं ।"और वह दोबारा अपने काम में लग गया।

कार्य की व्यस्तता देखकर मिताली ने उस समय उससे कुछ भी बहस करना उचित नहीं समझा।

सवेरे मिताली ने नाश्ते के समय गायत्री जी को कहा कि आज उन्हें अपनी आंखों की जांच के लिए रोहित के साथ जाना है।

रोहित इसके लिए तैयार नहीं था।

उसने मिताली से कहा कि उसकी जगह वह मां को ले जाए पर मिताली का कहना था कि उसे बच्चों के विद्यालय जाना बहुत जरूरी था।

मां को अपनी तरफ उत्सुकता भरी नजरों से देखते हुए रोहित इंकार नहीं कर पाया और उसने चुपचाप फोन पर चिकित्सक से समय ले लिया।

अस्पताल में भीड़ थी। कॉरिडोर में काफी लोग बैठे थे ।बिना उनकी ओर नज़र उठाए रोहित मां को एक बेंच पर बैठा चिकित्सक के कक्ष की ओर बढ़ गया।

वहां चिकित्सक को अनुपस्थित पा वह अधीर हो गया।

परामर्श का समय हो गया था और चिकित्सक महोदय अनुपस्थित थे । पता करने पर उसे ज्ञात हुआ कि वह ऑपरेशन में व्यस्त थे और आने में आधे घंटे का विलंब हो सकता था।

रोहित सोच ही रहा था कि आज का परामर्श का निर्धारित समय वह रद्द कर दे तभी मिताली का फोन आ गया ,"देखो मां का ख्याल रखना। भीड़ देखकर वह घबरा जाती हैं।"

मिताली के बेचैन स्वर को सुनकर रोहित ने फोन काट दिया और परामर्श रद्द करने का विचार त्याग दिया उसे पता था ऐसा करने पर उसे मिताली के कोप का सामना करना पड़ सकता था।

मां और मरीजों के साथ सुकड़ी हुई बेंच पर बैठी थी और रोहित बेचैनी से चक्कर काटता हुआ समय बिता रहा था।

तभी यकायक एक व्यक्ति उसके सम्मुख आकर प्रसन्नता से उसके गले लग गया। यह उसका बालसखा सरल था।

सरल अपने नाम के अनुरूप ही साफ मन का था, यह बात रोहित जानता था।

उनके बीच मित्रता कम प्रतिस्पर्धा का भाव अधिक रहता था। दोनों पर ही मां सरस्वती की असीम कृपा थी और दोनों ने ही अपने चुने क्षेत्र में सफलता प्राप्त की।

रोहित को उसका गले लगना अच्छा नहीं लगा था ,यह बात सरल आसानी से ताड़ गया था अब उसे छोड़ सरल ने अपने वृद्ध पिता को सहारा देकर सीट पर लिटा दिया और उनके करीब ही बैठ गया।

सरल को अपने पिता को कभी पानी देता और कभी अपनी बातों से हंसाते देख रोहित को बहुत आश्चर्य हो रहा था।

उसे ऐसा करते देख वह भी किसी भावना से वशीभूत होकर मां के पास पहुंचकर पानी को पूछने लगा। मां के चेहरे पर वात्सल्य उमड़ आया।

मां को पानी पिला जब उसने देखा सरल के पिता सो गए हैं तो वह सरल के निकट बात करने पहुंच गया। उसे पता चला था कि सरल पिछले पांच वर्षो से अपने पिता को शहर ले आया था और अपने पास रखे हुए था। रोहित के समान व्यस्त होते हुए भी सरल कैसे अपने पिता के लिए इतना समय निकाल पाता था यह सोच कर रोहित असमंजस में पड़ गया।

जब रोहित को पता चला कि सरल के पिता को अल्जाइमर्स भी था और उनकी नजर भी काफी कमजोर हो गई थी तो उसने सरल को परामर्श दिया कि वह व्यवहारिक जीवन जिए क्यों वह अकेले अपने पिता का दायित्व उठा रहा था। जबकि सरल के परिवार में और भी दो भाई थे। इतना कठिन जिम्मा उसने ही क्यों उठा रखा था?

यह सुन सरल बोला," काम कोई भी तब कठिन लगता है जब बोझिल मन से किया जाए। जब पिताजी ने हम तीनों भाइयों को कभी बोझ न समझा तो मैं अपने कर्तव्य पथ से कैसे हटू। यहां शहर में सब सुविधाएं हैं मैं आसानी से उनका ध्यान रख सकता हूं।"

सरल कहे जा रहा था और उसकी बातें रोहित के मन पर हथौड़े बरसा रही थीं। बरसों से संचित ज्ञान जैसे चूर चूर हो गया था।

उसे स्मरण हो रहा था कि कैसे विद्यार्थी जीवन में असफल होने पर मां ने ही उसकी आंखों में कुछ कर दिखाने के सपने दिखाए थे। वह कभी समझ ही ना पाया कि उसे यहां तक पहुंचाने में मां की वर्षों की तपस्या ही थी।

आंसुओं के आते वेग को बड़ी मुश्किल से रोकता हुआ वह सरल के पास से हटकर बाहर आ गया।

आंसुओं के सैलाब से उसे सब धुंधला दिख रहा था और उसे लग रहा था कि मां की नहीं आंखें तो उसकी धुंधली थीं जो कभी मां के मन के भाव को देख नहीं पाईं।


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