डरावना
डरावना
हम पॉंच मित्र कॉलेज में पढ़ने के लिए काशी हिन्दू विश्व विद्यालयके छात्रावास में पहुंचे। तीन पुराने परिचित थे। दो नए मित्र बने। यूँ उसजमाने में,( यह घटना 1965 - 66 की है, )रात्रि 10 बजे के बाद जागनेकी ही अनुमति नहीं थी और दूसरे के कमरे में तो जाने की अनुमतिबिल्कुल ही नहीं थी। लेकिन उस रात हम पॉंच मित्रों ने तो कुछ और हीठान रखा था। सो रात 12 बजे तक हमें साथ रहना ही था। हम अपनेनिश्चय में सफल भी हुए। चुपके से एक कमरे में पाँचों एकत्रित हुए।पूरा सन्नाटा हुआ तो हमने अपनी गतिविधि शुरू की।
आज हमें भूत सवार हुआ था आत्मा बुलाने का। थोड़ा अधकचराज्ञान ले कर हम अपने आप को महाज्ञानी समझ बैठे थे।
हमने अपनी प्रक्रिया प्रारम्भ की।
जितनी जानकारी थी उस हिसाब से गोलाकार सीमा बॉंधी । अंकलिखे, हाँ / ना शब्द लिखे एक ढक्कन पकड़ा और केन्द्र में रख कर होगए तैयार ।
किसकी आत्मा बुलाई जाए सोचने लगे। अच्छी आत्मा को बुला करउन्हें तकलीफ़ नहीं देना। सुना था कि जिस आत्मा को बुलाते हैं उसे उसलोक से इस लोक में आने में बहुत कष्ट होता है। बुरी आत्मा बुलाने सेहमें ख़तरा था। किसे बुलाया था यह तो ठीक-ठीक याद नहीं है पर हाँकिसी भले आदमी की ही आत्मा बुलाया था हमने ।
आत्मा आ गई हम चिन्तित और ख़ुश दोनों ही हुए। जल्दी - जल्दीसभी ने अपने- अपने प्रश्न पूछे।प्रश्न वहीं आम से हुआ करते थे वहींहमारे भी थे। पास होंगे? कितने प्रतिशत आएँगे ? शादी कब होगी ? कैसा दूल्हा मिलेगा ? आदि-आदि ।
अब उन्हें विदा करने की बारी आई। विदा के लिए आदेश दिया औरपूछा कि “ आप गए “
तो वो “नहीं “ पर जा कर बताए कि नहीं ,हम नहीं गए हैं।
अब तो हम पाँचों के होश उड़ गए हम परेशान हो गए कि अब क्या करें।काफ़ी समय तक हमें परेशान किया उस आत्मा ने।
किसी तरह याद आया कि किसी
को यदि कोई मंत्र आता हो तो वह बोल दे ।तब आत्मा जाती है। हमचार तो कुछ ऐसा जानते ही नहीं थे । एक मित्र थी जिन्हें गायत्री मंत्रआता था उसने यह मंत्र उच्चारण किया ।
पॉंच बार इस मंत्र का उच्चारण करते ही वह आत्मा आराम से
छोड़ कर चली गई।
उसके जाने के बाद हमारी सॉंसें मानो सामान्य गति पा सकीं।
वो दस मिनट हम पाँचों के लिए जीने- मरने का प्रश्न बन गए थे।
क़सम खाई कि अब कभी कोई आत्मा नहीं बुलाएँगे। बुलाया भी नहीं।
ऐसी रही हमारी आत्मा से मुलाक़ात
एक डरावना सपना सी।
आज भी याद करने से मन सिहर उठता है।

