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Vijaykant Verma

Abstract


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Vijaykant Verma

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डियर डायरी 22/04/2020

डियर डायरी 22/04/2020

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जिंदगी की डराने वाली सच्चाई है, कि जो लाखों मजदूर लॉकडाउन में फंसे हैं, उनके पास आधार कार्ड नहीं है। उनके पास राशन कार्ड नहीं है।उनके पास कोई पहचान पत्र भी नहीं है। और लॉकडाउन के पहले जितना पैसा था उनके पास, वो सारे पैसे खत्म हो गए हैं। और हकीकत में उनकी हालत भिखमंगो जैसी की हो गई है..!


मतलब वह कहीं जा भी नहीं सकता। वह कई काम भी नहीं कर सकता।अगर उसको दो रोटी मिल जाती है खाने को, तो खा लेगा..! और नहीं मिली रोटी खाने को, तो भूखा मर जाएगा..!


उसके पास दवा इलाज के भी पैसे नहीं है। और उसकी सुनने वाला भी कोई नहीं है।


क्या इनको ₹1000 मिल रहा है क्या इनको ₹500 मिल रहा है क्या इनके रहने की वास्तव में सही व्यवस्था है क्या इनको वास्तव में दोनों टाइम रोटी मिल रही है..?


दोस्तों, इन सभी प्रश्नों के उत्तर बहुत डरावने है.! आप अपने घर में बैठकर इनकी मदद की बात करते हो इनको दो टाइम रहने खाने की व्यवस्था करते हो आप सारी व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बताते हो आप दावा करते हो कि कोई भूखा नहीं मर रहा है लेकिन जिस पर पड़ती है वही जानता है कि वह किस तरह जी रहा है और किस तरह एक-एक पैसे को तरस रहा है और दो दो रोटी को तरस रहा है।


अपने घर परिवार से दूर, अपने देश दुनिया से दूर, नर्क से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है वो..!


दोस्तों, बहुत डराने वाली सच्चाई है यह। अगर इन मजदूरों को तुरंत इनके घर परिवार गांव में पहुंचाने की व्यवस्था ना की गई तो कल को और भी विषम स्थिति आ सकती है..! केंद्रीय सरकार को इस बारे में अपना हस्तक्षेप करना चाहिए और कोई मजदूर कहीं भी हो उसे अपने घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।


इतना भी जुल्म ठीक नहीं, इंसानियत का दम घुट जाए..!

तुम कहते रहो सब ठीक है, और गरीब बे-मौत मर जाए..!!



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