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Vijaykant Verma

Abstract Tragedy


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Vijaykant Verma

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डियर डायरी 12/04/2020

डियर डायरी 12/04/2020

2 mins 162 2 mins 162

Dear Diary 12/04/2020 कोई 10 साल पहले की बात होगी। मैं सिक्स क्लास की एक लड़की को ट्यूशन पढ़ाता था। एक दिन भी मैं जब उसको पढ़ाने गया, तो घर में कोहराम मचा था। दरअसल उस दिन उसकी बहन का गला कट गया था एक तार वाली पतंग की डोर में फंस कर, जब वो अपनी स्कूटी से ऐशबाग के पुल से होकर गुजर रही थी। उसकी जान तो बच गई लेकिन कितना दर्द हुआ होगा उसे, यह सोच कर दिल कांप जाता है..! और कल की तारीख में लॉकडाउन के दौरान ठीक इसी प्रकार अपनी ड्यूटी पर जा रही एक महिला सिपाही का मांझी से गला कट गया पॉलिटेक्निक ओवर ब्रिज पर। उक्त महिला सिपाही को लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी हालत काफी गम्भीर है। इस तरह के पहले भी कई हादसे हो चुके हैं। यहां बच्चों से ज्यादा बच्चों के मां-बाप की गलती है। उन्हें अच्छी तरह मालुम होता है, उनके बच्चे पतंग उड़ा रहे हैं। तो उनको इस बात को जरूर चेक करना चाहिए, कि पतंग में डोर कौन सी है! अगर तार वाली पतंग उड़ा है आपका बेटा और पतंगबाजी में बादशाह बनना चाहता हैं, तो यह गलत है। चीटिंग है। धोखा है। और किसी की जान के साथ खिलवाड़ भी है। हर माता-पिता को अपने बच्चों को समझाना चाहिए और उन्हें खुद ही मांझा खरीद कर अपने बच्चों को देना चाहिए अगर थोड़ा सा भी वो ध्यान देंगे, तो इस तरह के हादसे नहीं होंगे..! एक और खबर दिल को दहला देने वाली है। कंटेनर में छिपकर 109 मजदूर अलीगढ़ से अपने वतन बिहार जा रहे थे और गोसाईगंज में पुलिस चेकिंग के दौरान इन्हें पकड़ लिया गया। कंटेनर चालक ने इन सभी श्रमिकों से पंद्रह पंद्रह सौ रुपये भाड़े के लिए थे। इन मजदूरों को कटिहार भागलपुर और पूर्णिया जाना था। पकड़े जाने के बाद इन्हें मोहनलालगंज स्थित राधा स्वामी सत्संग व्यास में बने आइसोलेशन सेंटर में क्वारंटाइन किया गया। आगे क्या कानूनी कार्रवाई होती है, ये उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, परंतु मजदूरों की मजबूरी पर सरकार को ध्यान ज़रूर देना चाहिए। और हमारा यह विचार है, कि इन मजदूरों को वहीं पर क्वॉरेंटाइन करने से बेहतर है, कि उन्हें उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था की जाए, जहां अपेक्षाकृत वो ज़्यादा सुरक्षित रहेंगे और कोरोना के फैलने का खतरा भी न्यूमतमी होगा। अगर मजदूरों ने डेढ़ डेढ़ हजार रुपया भी दिया, और अपनी जान पर खेलकर कंटेनर में बैठकर सफर कर रहे थे, तो वो सजा के पात्र नहीं है, बल्कि दया के पात्र हैं..! कोरोना विदेशी फैला रहे हैं, ये सीधे सादे बेबस मजदूर नहीं..! रहम करो इन पर, न भेजो इन्हें अपने घर परिवार से दूर कहीं..!!


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