Richa Baijal

Abstract

4.2  

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डे 34 : आगरा के आँसूं

डे 34 : आगरा के आँसूं

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डिअर डायरी,

सदियों से अपने "चार्म" से दुनिया को रिझाता हमारा अपना 'ताजमहल '। ताजमहल की तारीफ करके मैं अपना वक्त बर्बाद नहीं करूंगी क्यूंकि जो इमारत विश्व के सात अजूबों में शामिल हो, उसका नाम ही काफी है। आपकी यही अपनी चहेती इमारत विश्व में ' मोहब्बत की मिसाल ' रही है। लेकिन आज सिर्फ वीराना है इसके इर्द -गिर्द। हर वक्त चमकने वाला सितारा भी कभी न कभी गर्दिश में होता है।

हर वक्त सफलता और चमक में रहने वाला इंसान भी एक वक्त को अँधेरे में होता है। बस वही हाल इस वक्त मखमली ताजमहल का है। दुनिया में अपनी शान का लोहा मनवाने वाला ताजमहल आज गुपचुप सा एक कोने में खड़ा है। कारण है : वैश्विक महामारी ' कोरोना '। जिस राज्य ने ताजमहल से आने वाला करोङो का पर्यटन कर सरकार को दियाआज उसके पास कोरोना से निबटने की उचित सुविधाएँ नहीं है।

वहाँ कोरोना के 380 मरीज़ तो हैं ही लेकिन मेयर का प्रधानमंत्री को पत्र कि मेरे राज्य को बचा लीजिये नहीं तो इसे ' चीन का बुहान ' बनते देर नहीं लगेगी कुछ और ही तस्वीर दिखाता है। वहां का क वीडियो भी वायरल हुआ जिसमे कोरोना पेशेंट्स को एक जाली के गेट से सामान फेंक कर दिया जा रहा था। अपना 'पर्सनल व्यू ' दूँ तो आगरा में सफाई बिलकुल भी नहीं है, सड़को पर कचरे के ढेर लगे होते हैं मालूम देता है कि प्रशासन सारा समय ताजमहल को चमकाने में ही लगाता है। आगरा वाला क्षेत्र अधिकांशतः मुस्लिम एरिया है और छोटा सा शहर है ये। तो 380 पेशेंट्स एक बड़ी संख्या हो जाता है फिर। प्रशासन सकते में भी है, डरा हुआ ही है और अलर्ट भी आगरा के मेयर डरे हुए से नज़र आये।

हम आगरा को जल्दी से जल्दी 'कोरोना -मुक्त ' देखना चाहते हैं। मुश्किल है लेकिन असंभव बिलकुल नहीं है।

गेट वेल सून आगरा।


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