Yashwant Rathore

Abstract Romance Inspirational


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Yashwant Rathore

Abstract Romance Inspirational


चुप

चुप

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सजा धजा के बोल के देख लिया,

कुछ बाकी कुछ अधूरा रह ही गया.

कभी ज्यादा बोलने का दंश सताता है

कभी समझ या न समझा पाना भी उलझाता हैं

इसमें कुछ खिन्नता रह ही जाती है

बाकी थोड़ी भिन्नता रह ही जाती हैं


कभी रस हाथ लगता है तो कभी खटास

कभी रूठे साथी,कभी ना मिटती प्यास


चुप रहना ही पूरा होना लगता है.

तेरी  बाते ध्यान से सुनना अच्छा लगता हैं

उसमे सलग्न होना, मुस्कुराना, साथ होना

बोलने से ज्यादा सुखदायी भला लगता है


अपने बारे में तो जानते ही हो, 

नई जिंदगी कैसे भीग के आयी है.

वो भी देख लो, 

बिना अपने रंग उसपे थोपे

 जैसी है वैसी ही देख लो

गलत सही का हिसाब चित्रगुप्त का

तुम लाला का अब काम छोड़ दो


न जान पाने का डर न बताने जताने का डर

जो भी है उनके मन मे, उन्ही के पास रहने दो.

क्या जरूरी है, जीवन मे वो तो जानते ही हो

हर वक़्त तोलते बदलते भुनाते भी हो

हर बात में कुछ अपना खोज ही लेते हो

वो रस तो है ही  जिसमे मजा भी लेते हो

फिर बोल के क्यों सूखा रहे बहते झरने

वो शीतल, मीठे ठहरे, हसीन  लम्हे


जब समय बहुत हों और किसी की

उत्सुकता उससे भी ज्यादा

तब कोई बात कह भी दो

कुछ पन्ने पढ़ भी लो

कुछ काम का शायद हो 

और कुछ बिल्कुल बेकार

पर जो भी हैं यही बस इतना ही है मेरा

अभी की बस इतनी सी रात, यही सवेरा

फिर किसी का जो होगा घट में बसेरा

उन एहसासों के फ़सानो पर भी हक़ हैं तेरा


पर तुम सुनना न चाहो और में बताता जाऊं

इतनी तो बेकार मेरी कहानी नही

इतनी सस्ती मेरी जुबानी भी नही

मोल इसका भी अनमोल है

तुम न पहचानो तो  क्या 

खैरात में बांटू प्रसाद हैं क्या


कोई इतना भी बुरा नही की

सुन न सके उसकी कहानी

तुम इतने खास भी नही

की हर बात में हो बखानी


तुम्हारे ज्ञान से वो अब डरने लगें हैं

छुप छुप के तुमसे जीने हँसने लगें हैं

तुम्हारे पैमानों से वो डरते है

क्यों आंखों में ले पैमाने चलते हो

हर समय बुद्धि को उलझाए रखते हो

शीतल होके बैठे भर रहो

साथ उनके हर पल रहो


बाहर से खामोश हूँ तो

अंदर ये क्या हलचल  हैं

जो भागता इधर से उधर हैं

 वो पल भी क्या पल हैं.

ठहरे हुवे पलों से भी बाते हुई है

थोड़ी ही सही मुलाकाते हुई हैं

याद बस उन्ही की जीवन भर देती हैं

वो कहानियां ही बस सुखी कर देती हैं.


कुछ और कहानी बने

वो नशा अब और चढ़े

जानता है तो चलना इतना क्यूं है

चुप रहने में हैं मजा 

तो बोलना इतना क्यों है


कुछ सूरज पहाड़ो में छिप जाने दे

धरती में समा  बुझ जाने दे

वो एक होने का सुख तू भी लेले

मन क्यों इधर उधर, दो, हो के डोले

बस इतनी सी ही बात है

तू ही पूरा अपने साथ है।


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