भटकाव (भाग 1)
भटकाव (भाग 1)
रात के 2 बज रहे थे. मैं स्टेशन पे उतरा तो चारों ओर निस्तब्धता छाई हुई थी. ट्रेन के रुकने के साथ ही एक कोलाहल सा हुआ. मेरे साथ कुछ और भी सवारियां उतरी और अपने-अपने गंतव्य को निकल गयी. उस छोटे से स्टेशन पर कुछ ही देर के पश्चात पुनः सन्नाटे का साम्राज्य स्थापित हो गया. दिसंबर का महीना होने की वजह से ठण्ड कुछ ज्यादा ही लग रही थी. मुझे यहाँ से ट्रेन बदलनी थी जो सुबह 7 बजे आती. तबतक के लिए मुझे इस नामालूम से छोटे से स्टेशन पर किसी तरह वक़्त गुजारना ही था. मैंने अपने आप को एक लम्बे उबाऊ और तकलीफदेह रात के लिए तैयार करते हुए स्टेशन का मुआयना करना शुरू किया.
स्टेशन की अधिकतर दुकाने बंद थी. कुछ लोग उन दुकानों के शेड के नीचे सामान पैक करने वाले कूट के गत्ते को बिछाकर ऊपर से चादर या कम्बल ओढ़े सोये पड़े थे.एक छोटा सा वेटिंग रूम था जिसके दरवाजे पे ताला लगा हुआ था. एक कुत्ता ठण्ड से परेशान हो अपने आप को समेटे हुए निकासी द्वार के पास दुबका हुआ था. यहाँ मुझे कहीं वक़्त काटने का कोई जरिया नज़र नहीं आया.अतः मैंने स्टेशन से बाहर का रुख करने का फैसला किया,
बाहर बड़े से पेड़ के नीचे एक चाय की दूकान खुली थी. दुकान की बगल में एक बेंच भी थी जिसपर एक युवक अपना बैग बगल में रखे सिगरेट पी रहा था. ढाई बज चुके थे. मैंने तय कर लिया की बाकी की रात वहीँ बैठ के चाय पीते हुए काटी जाय.मैं वहां पहुचकर युवक के बगल में बैठ गया और एक चाय के लिए बोलकर सोचने लगा कि कैसे उस युवक से बातचीत शुरू की जाय ताकि समय कटे.
"आज ठण्ड बहुत है " मैंने उसकी ओर मुखातिब होते हुए कहा.
उसने मेरी और देखा, कहा....."हाँ, सो तो है, आप यहीं के हैं या कहीं बाहर से आ रहे हैं"
"नहीं, मैं यहाँ का नहीं हूँ, बस ट्रेन बदलने को रुका हुआ हूँ जो सुबह सात बजे आएगी,और आप"?
" मेरा कोई एक ठिकाना नहीं है, मैं बस यूँ ही भटकता रहता हूँ"
उसके इस अजीब से जवाब से मुझे काफी हैरानी हुई.देखने में वह ठीक ठाक पढ़ा लिखा सुदर्शन युवक लग रहा था. पहनावा भी अच्छा था.बोलने का लहजा भी बिलकुल संयत....पागल वागल तो नहीं ही लग रहा था.
"ऐसा क्यूँ?"----मैंने जानना चाहा.
"लम्बी कहानी है" उसने सिगरेट का अंतिम कश लेते हुए कहा.
मेरे चेहरे पे उत्सुकता को देखते हुए उसने गहराई से मेरा जायजा लिया -- मानों सोच रहा हो कि यह मेरी कहानी सुनने की पात्रता भी रखता है या नहीं...फिर कहा .."चलिए एक-एक चाय और पीते हैं"
मैंने सहमति में सर हिलाया.
कुल्हड़ में नयी भाप उडती हुई गर्म चाय सर्व कर दी गयी थी, चाय का एक गहरा सिप लेते हुए उसने कहना शुरू किया.
"मेरा नाम कुणाल है, मैं मूलतः राजस्थान का रहने वाला हूँ,अच्छे परिवार से हूँ और दिल्ली के एक नामी यूनिवर्नसिटी में PHD कर रहा था.लेकिन एक दिन इन सबसे मोहभंग हो गया और मैं बस.....निकल गया".
"ऐसा क्या हो गया अचानक जो ऐसा निर्णय लेना पड़ा?"
उसने एक नयी सिगरेट सुलगा ली और कहने लगा -- "आप ईश्वर को मानते हैं"
"हाँ"
"क्यों मानते हैं?"
"क्यूंकि सारी सृष्टि का रचयिता और चलाने वाला वो ही तो है".
वह कुछ देर मेरी ओर देखता रहा ..फिर सिगरेट का आखिरी कश खींच कर बोला -- " आप जानते हैं, इस दुनिया में जितने भी अत्याचार हुए हैं वो ईश्वर की मर्ज़ी से कम और इंसानों की मर्ज़ी से ज्यादा हुए हैं -- कुरुक्षेत्र की लड़ाई में सत्ता की भूख किसे थी और उसकी कीमत किसने चुकाई? चंगेज खान की साम्राज्य स्थापित करने की महत्वाकांक्षा की वेदी पर कितने लोग कुर्बान हुए? तैमुरलंग से लेकर नादिरशाह तक किसका खजाना भरने के लिए लोगों की आहुति दी गयी? नाज़ी सुधार गृह में लाखों लोग किसकी ख़ुशी के लिय गैस चैम्बर में जला दिए गए? इतिहास की सारी लड़ाइयों का मकसद केवल और केवल कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति समूहों की स्वार्थ पूर्ति के सिवाय और कुछ भी नहीं था, और आज के लिए भी यही बात सच है जिसकी कीमत पीढ़ियों ने चुकाई और आज भी चुका रही है. इतना ही नहीं.... 1943 के बंगाल के अकाल में तीस लाख से ज्यादा लोग किसकी नीतियों की वजह से भूख से बिलबिलाकर मारे गए? पचास के दशक में चीन में किसकी नीतियों की वजह से महान अकाल पड़ा जिसने लाखों नहीं करोड़ों इंसान को कीड़े-मकोड़ों की तरह मरवा दिया?, एशिया,अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के गुलाम कौमों में जितने भी तरह के अत्याचार किये गए उसकी फेहरिश्त बनायीं जाय तो शायद दुनिया के सारे कागज़ के पन्ने कम पड़ जाएँ. क्या ये सब काम सृष्टि की रचयिता की मर्ज़ी से हुए थे?"..................
"तो आपके भटकने की वजह इनमे से क्या है? मनुष्य द्वारा मनुष्य पर अत्याचार या नास्तिकता"? ---
"मुझे अपनी इन्हीं सब बातों की वजह से यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया क्यूंकि वहां तयशुदा पैटर्न की सोच होनी चाहिए...न उससे इधर ना उधर. मेरा तर्क-वितर्क, प्रोफेसरों से किये गए तीखे सवाल,अब तक के बने-बनाये अकादमिक ढांचे के विरुद्ध बातें ... कुल मिलकर मेरा रटे-रटाये सिद्धांतों के विरूद्ध विद्रोह मेरे निर्वासन का कारण बना" -- उसने गहरी साँसे लेते हुए कहा --- फिर कुछ रूककर उसने मेरी ओर नज़रें गडाते हुए कहा --- "आपने मेरी बात का जवाब नहीं दिया....कि ईश्वर है तो फिर मनुष्यों द्वारा किये गए अत्याचारों या निरंकुश शासकों के गलत निर्णयों की वजह से पीड़ित मनुष्यता की रक्षा उसने क्यूँ नहीं की?"
अब मैं क्या कहता? -- सुबह के चार बजने वाले थे, धुंध और ज्यादा सघन हो गयी थी,अन्धेरा और गहरा हो गया था...कुछ देर बाद पौ फटने वाली थी.
"आप क्या सोचते हैं ...बताइए". --- उसने फिर जोर दिया.
"देखिये, मैं कोई दार्शनिक या इतिहासकार तो हूँ नहीं, एक दफ्तर में मामूली सा मुलाजिम हूँ जो अपनी और अपने परिवार का पेट भरने के लिए रिज़क कमाता हूँ"...कहकर मैं चुप हो गया. मेरा जवाब खुद मुझे भी बिलकुल पसंद नहीं आया था...!
"एक बात पूछूँ"---उसने मेरी बात के प्रत्युत्तर में कहा. मेरी सहमति पाकर उसने बोलना शुरू किया " आपको लगता है कि आपकी जिंदगी जैसी होनी चाहिए वैसी ही है?"
"नहीं"
"क्यूँ ; क्या कमी लगती है आपको अपनी जिंदगी में"
"क्या कहूँ, मैंने तो कभी इन सब पर इस तरह से विचार किया ही नहीं कि स्पष्ट जवाब दे सकूँ, जिन्दगी अधूरी भी लगती है और अधूरापन को एक शब्द में बता भी नहीं सकता"
"फिर तो आपको मेरी बातें एक पागल का प्रलाप लग रही होंगी" -- उसने पहली बार मुकुराते कहा.
"नहीं, ऐसा नहीं है ... मैं ईश्वर को मानता हूँ क्यूंकि हम मानते आये हैं ... दुनिया की तकलीफें उनके रहते हुए भी क्यूँ है इसका जवाब मेरे पास नहीं है, मैं कोई तत्वज्ञानी होता तो शायद बता पाता..लेकिन फिलहाल तो ...मैं वो नहीं हूँ.
सुबह के पांच बज चुके थे और कोहरे की वजह से अभी भी पूरी तरह अँधेरा छाया हुआ था. अभी दो घंटे और शेष बचे थे तो यह बातचीत का यह क्रम आगे भी चलता रहे तो मेरे लिए अच्छा ही था कि वक़्त कट जाता अतः मैंने उसे एक और चाय का आग्रह किया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया.
"एक बात बताइये, आपको नहीं लगता की आप हकीकत से दूर सपनों की अपनी एक दुनियां में घूमते हैं, अगर आप जैसा चाहते हैं वैसी दुनिया नहीं है तो नहीं है,वैसे लोग नहीं हैं तो नहीं है. आपके तर्कों से ना तो आस्तिक लोग कम हो जायेंगे और ना ही नास्तिक लोग..आपके चाहने से ना तो क्रूर लोग दयावान हो जायेंगे और ना ही सभी की तकलीफें कम हो जाएँगी .... ईश्वर है तो ठीक,नहीं है तो भी क्या ही फ़र्क पड़ जाता है? अगर ईश्वर के रहते भी दुनिया तकलीफों से भरी हुई है तब भी हम कभी नहीं जान सकते की ऐसा क्यूँ है और अगर आपके अनुसार वो नहीं है तब भी. इतिहास में सिर्फ बुरे लोग और बुरी घटनाएँ ही आपको क्यूँ नज़र आई..इतिहास के सभी पन्नो में अच्छे लोग और अच्छी घटनाओं का भी उतना ही ज़िक्र है, आप अच्छे घर के हैं आपके लिए अच्छी जिंदगी जीने के सारे इंतजाम आपके माता-पिता ने किये होंगे...आपके इसी नाकाबिलेबर्दाश्त दुनिया में तकलीफें सहकर उन्होंने आपको इस लायक बनाया कि आप अपनी मर्ज़ी के मुताबिक सोच सकें."------मैंने नयी चाय का पहला घूंट लेते हुए उससे कहा.इन सब बातों को बोलते हुए मुझे लगा जैसे मेरे अन्दर से कोई और बोल रहा है..क्यूंकि बरसों से मैंने कभी अपने रोजमर्रा की जिंदगी के सिवाय न ऐसा कुछ सोचा था ना ही किसी को बोला था..वो एक अजनबी था मुझे उसके सामने
उसने मेरी बातों को गौर से सुना और एक नयी सिगरेट सुलगा ली और एक गहरा कश लेते हुए और ऊपर आसमान की ओर ताकते हुए हुए बोला -- "आप तर्कशील व्यक्ति हैं,मैं आपकी बातों का जवाब दूंगा.
