गुड़िया
गुड़िया
एक कहानी सुनाऊँ?
एक लड़का था..दुनिया में बिल्कुल अकेला..कहने को तो सब थे आस पास...लेकिन उसका अपना कोई नहीं था..।
फिर एक दिन उसे एक गुड़िया मिली..वो गुड़िया अंदर से खाली थी...बिल्कुल खाली..।
लड़का उस गुड़िया को पाकर बहुत खुश हुआ..उसे सीने से लगाया..और उसमें रंग भरने शुरू किए..तरह तरह के रंग..लड़के ने अपनी आत्मा उड़ेल दी। उसे बोलना,चलना,बात करना,पहनना,ओढ़ना, रुठना,मुस्कुराना और न जाने क्या क्या सिखाया।
गुड़िया में जान आ गई, उसमें रंग आ गए..वो सतरंगी हो गई।
गुड़िया अपने अस्तित्व के लिए लड़के पर निर्भर थी क्योंकि उसने जितनी दुनिया देखी वो लड़के के नजर से ही देखी..वो लड़के को दिलो जान से प्रेम करने लगी। दुनिया की हरेक चीज का मतलब वो लड़के से पूछती। लड़का दिन को रात कह दे तो वो मान लेती..लेकिन लड़के ने कभी उसे झूठ नहीं कहा.
वक्त गुजरता रहा..अब गुड़िया दुनिया देखना चाहती थी..अपनी नजरों से.. वो नजर.. जो उसे लड़के ने ही दी थी।
लड़के ने भारी मन से इजाजत दे दी। गुड़िया ने उससे वादा किया कि वह जो भी नया देखेगी..सीखेगी..महसूस करेगी..वो सब इस लड़के का ही होगा..वो अब लड़के की सब कुछ बनेगी...रंग, रोशनी, मुस्कुराहट...सब कुछ..!
वक्त गुजरता रहा..गुड़िया ने दुनियाँ अपनी नजरों से देखनी शुरू की...नए लोग..नए रंग..नई कलियाँ..नए फूल।
फिर उसे एहसास हुआ कि दुनियां में बहुत सारे लड़के हैं..बहुत सारे रंग..बहुत सारी बातें..!
उसे यह भी एहसास होने लगा कि दुनियां बहुत बड़ी है और उस लड़के का दायरा बहुत छोटा..जिस लड़के को वो अपना सब कुछ मानती थी..उसे अब एहसान हुआ कि उसने उसे दिया ही क्या था?...कुछ नहीं...कुछ भी तो नहीं..!
उसे अब अपनी दुनियां बनानी थी । लेकिन इतने दिनों का साथ कैसे छोड़ दे? कहीं न कहीं थोड़ा सा मोह तो अब भी था।
धीरे - धीरे उसने लड़के की आंखों से दुनिया देखनी बंद कर दी। नए दोस्त बनाए,नई दुनिया बनाई...।
लड़का उससे रोज पूछता कि मैने जो भी अब तक देखा, सुना, समझा .. सब तुझको दे दिया...! तुमने क्या देखा, सुना, समझा...मुझे भी बताओ ना।
गुड़िया को यह पसंद नहीं आया..उसने इसे अपनी आजादी पे बंधन समझा..हकदारी समझी..गुलामी समझी..।
उसने कहा तो नहीं..लेकिन मन ही मन में यह तय कर लिया कि इस बंधन से आजाद होना है..लेकिन आहिस्ता आहिस्ता।
वक्त गुजरता गया।
जैसे जैसे गुड़िया लड़के से दूर होती गई..वैसे वैसे लड़के में कुछ टूटता चला गया.. मरता चला गया।
लड़का रोज गुड़िया से व्याकुल होकर पूछता.. आज तुमने क्या देखा..क्या महसूस किया..क्या सीखा..कितने नए रंगो से तुम्हारा परिचय हुआ?
गुड़िया लड़के की हर बात टालती गई.. लेकिन गुड़िया को लड़के का यूँ रोज पूछना अखरता गया।
फिर गुड़िया ने एक दिन निश्चय कर लिया कि लड़के की दुनियां से हमेशा के लिए निकल जाना है।
लड़के को जब इस बात का एहसास हुआ..तो उसका सारा अस्तित्व हिल गया,सारे विश्वास टूट गए, सारी मान्यताएं ध्वस्त हो गई।
लड़के की अब अपनी कोई दुनिया रह ही नहीं गई थी..गुड़िया ही उसकी सारी दुनियां थी..वह गुड़िया के अलावा बाकी सब कुछ भूल चुका था। अब उसके अंदर कुछ भी नहीं था। वह वही गुड़िया बन चुका था जब वो उसे मिली थी, फर्क इतना था कि तब गुड़िया अंदर से खाली थी..आज वो अंदर से खाली था।
फिर एक दिन गुड़िया चली गई..हमेशा के लिए..लड़का रोता रहा.गिड़गिड़ाता रहा..चीखा..चिल्लाया..लेकिन गुड़िया चली गई..हमेशा के लिए।
फिर न कभी गुड़िया ने जानना चाहा कि उस लड़के का आगे क्या हुआ..न ही उस लड़के ने कभी गुड़िया को कुछ बताया..
दोनों फिर कभी नहीं मिले..
गुड़िया आगे चलकर दुनिया पे छा गई..लड़का गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गया.........!
