खिड़की वाली सीट
खिड़की वाली सीट
बचपन से ही मुझे खिड़की वाली सीट बेहद आकर्षित करती रही है. बस हो या ट्रेन .. मेरी कोशिश हमेशा यही रहती थी कि मैं खिड़की वाली सीट के पास ही बैठूं. उन बचपन के दिनों में हम अक्सर हजारीबाग से पटना या दरभंगा बस से ही आया-जाया करते थे और आते-जाते वक़्त मेरे मन में बस यही चलता रहता था कि कैसे किसी तरह खिड़की वाली सीट मेरी हो जाय..दिक्कत यह थी कि मेरी बहन भी इस सीट के लिए वैसी ही ख्वाहिशमंद रहती थी जिसकी वजह से अक्सर हमारी लड़ाई हो जाया करती थी और अंततः वहां कौन बैठेगा,यह पापा या माँ के अंतिम फैसले पर निर्भर करती थी..क्यूंकि लड़ाई में न वो हारती थी .. न मैं.
खिड़की वाली सीट पर बैठकर मैं दूर दूर तक फैले नज़ारे को आँखों से पीता रहता था. कोई छोटा बच्चा नंग - धडंग कहीं कीचड से भरे तालाब में भैंस और सूअर के साथ लोट रहा हो..कहीं कोई औरत सर पर बोझ लिए चली जा रही हो .. कहीं फसल की कटाई चल रही हो .. कोई बूढा लाठी के सहारे किसी मेड पे बैठा हो ... किसी तालाब के किनारे बंशी डालकर मछली पकड़ते हुए मछुआरे.... मेरी निगाह सभी दृश्यों को अपने अन्दर कैद करते हुए मेरे दिमाग में प्रोसेस होने के लिए भेजती रहती थी और मेरा मन उन सब दृश्यों में लगातार उलझा रहता था .. मसलन ... उन कीचड में नहाते बच्चों के साथ मैं भी होता तो? औरत को अपना सर अभी कितना भारी लग रहा होगा? जो बूढ़ा बैठा है उसका घर यहाँ से कितनी दूर होगा? मछलियाँ कैसे बंशी के लोभ में फंस जाती होंगी...सिर्फ इतना ही नहीं ... मैं अपनी कल्पनाओं में अपनी भूमिका भी परिवर्तित कर लेता था जैसे कि मैं अपने आप को पानी के अन्दर मछली के रूप में महसूस करने लगता था जो ऊपर की ओर बंशी में लटके हुए कीड़े या आटे को ललचाई नज़र से देख रही हैं और क्यूंकि मैं मछली हूँ तो मुझे यह भी मालूम है कि कीड़े या आटे पर लपकते ही तालाब के ऊपर खड़ा मछुआरा मुझे खींच लेगा..
बस में मैं अपनी आगे या पीछे की तरफ खिड़की के शीशे को धकेल देता था ताकि मुझे ज्यादा बेहतर नज़ारे देखने को मिल सके.कई बार मेरी ही तरह खिड़की प्रेमी सहयात्री इस बात को लेकर मुझे कुछ कहता तो मैं उस वक़्त तो चुप हो जाता था लेकिन धीरे-धीरे शीशे के पास कोहनी रखकर आहिस्ते-आहिस्ते उसे आगे या पीछे सरकाता रहता था.खिड़की वाली सीट के बिना कोई भी सफ़र मुझे एक बेरंग जिंदगी सा लगता था.
मेरे पिता टाटा कम्पनी के अधीन घाटो नाम की एक कोलियरी डिविजन में कार्यरत थे जहाँ कोई कॉलेज नहीं था. सभी को वहां से मैट्रिकुलेशन के पश्चात हजारीबाग में आगे की पढाई के लिए दाखिला लेना पड़ता था जो कि घाटो से तकरीबन चलीस किलोमीटर की दूरी पर था. अतः कम्पनी प्रशासन अपने कर्मियों के बच्चों की आगे की पढाई के लिए कॉलेज बस मुहैय्या करवाई हुई थी. कम्पनी की बस रोज सुबह पांच बजे घाटो से कॉलेज के सभी बच्चों को लेकर हजारीबाग जाती थी और शाम पांच बजे वापिस घाटो ले आती थी.
इंटरमीडिएट में मेरा भी दाखिला हजारीबाग में हुआ और मैं भी रोज सुबह कम्पनी के बस से हजारीबाग जाने लगा.मुझे कॉलेज में पढने से ज्यादा ख़ुशी बस से जाने की होती थी.उन दिनों झारखण्ड में सर्दियाँ बहुत कड़ाके की पड़ती थी.और मैं उन सर्दियों में भी कॉलेज बस में खिड़की वाली सीट पर काबिज होने के लिए घर से करीब तीन किलोमीटर दूर वहां जाता था जहाँ से वो बस खुलती थी..जबकि वो बस घूम-फिरकर सभी बच्चों को अलग-अलग जगह से लेते हुए मेरे घर के आगे से होकर ही निकलती थी..लेकिन तब तक वो भर गयी होती थी और अपने घर के पास से बस पकड़ने में खिड़की वाली सीट मिलने की गुंजायश ना के बराबर होती थी.
मैं बस के चलते ही खिड़की से दिख रहे नजारों में खो जाता था..बड़ा ही अद्भुत और दैवीय नज़ारा होता था..झारखण्ड के घने जंगलों के बीच सर्पिलाकार रास्तों से होती हुई बस आगे बढती जाती थी और सुबह के धुंध में साल,महुआ,शीशम,पलाश और ना जाने किन-किन के पेड़ कोहरे की चादर ओढ़े हुए किसी मौन तपस्वी की भांति चुपचाप समाधिस्थ नज़र आते थे..रास्ते में ही धीरे-धीरे पौ फटता था.चारों ओर उजाला फैलने लगता था और पेड़ों के बीच से सूर्य की रश्मियाँ लुका-छुपी का खेल खेलने लगती थी. कभी तो वे पहाड़ों का ओट ले लेती कभी झाड़ियों में गुम हो जाती और कभी सीधे मेरे चेहरे को अपने लाल केसरिया रंग से सराबोर कर देती.सुबह की उन रुपहली किरणों के प्रकट होने के साथ ही जंगल से आकर पक्की सड़क से मिलने वाले पतले-पतले कच्चे रास्तों पर जनजातीय महिलाएं महुआ,कुसुम,केंदु पत्ते,इमली,लकड़ियाँ और ना जाने क्या-क्या बीनने के लिए हंसी-ठिठोली करती हुई जाती दिख जाती..उनके रंग-बिरंगे परिधान और चमकती स्वेत दन्त-पंक्तियाँ मानो सुबह के उजाले के साथ मिलकर एकाकार हो जाती थी.
मुझे घाटो से हजारीबाग के बीच पड़ने वाले सारे कस्बों,कोलियरी,मंदिर,मस्जिद,बाज़ार और चौक-चौराहों के नाम क्रम से अब तक ना सिर्फ याद हैं बल्कि ज़ेहन में उतने ही तरोताज़ा हैं जितने तब थे...घाटो से निकलते ही बंजी, परेज, तीन बोर्ड,बयालीस,चौवालिस,मुकुंदगंज, चरही..और उसके बाद हजारीबाग...रास्ते में छोटे-छोटे कोल माइंस के रिहायसी बसावटों में पुष्पित-पल्लवित होती जिंदगियां सुबह शाम मेरी आँखों के सामने से हर रोज गुजरती थी.
कॉलेज ख़त्म होने के बाद प्रतियोगिता परीक्षाओं के सिलसिले में मुझे अब ज्यादातर रेल से सफ़र करना पड़ता था. वहां भी खिड़की वाली सीट हमेशा की तरह ही मेरी पहली पसंद बनी रही.अलबत्ता बस और रेल की खिड़कियाँ जीवन के अलग-अलग रूप को दर्शाती थी.मसलन ट्रेन जब स्टेशन से निकलती थी तो बहुत देर तक दोनों तरफ झुग्गी-झोंपड़ियों की अंतहीन कतारें और छोटे-बड़े मकान एक दुसरे से गुंथे हुए से दूर तक साथ चलते थे. उन झुग्गी-झोंपड़ियों के आगे कहीं बच्चे खेल रहे होते,औरतें खाना बना रही होती और उनके मर्द पटरियों के किनारे ताश खेल रहे होते थे. जहाँ-जहाँ क्रासिंग होती वहां पटरी के दोनों ओर लोगबाग,मोटरकारें, साईकिल,मोटरबाइक,रिक्शे,ठेले ट्रेन के गुजरने के इंतज़ार में मन मारे खड़े रहते और ट्रेन दनदनाती हुई उनके बीच से होकर गुजर जाती..तब मेरी छाती गर्व से चौड़ी हो जाती थी..मुझे लगता था जैसे ट्रेन उन सभी को चिढाती हुई फर्राटे से निकल गयी हो और वे सब मुंह बिसूरे हताशा में खड़े उसे शान से निकलते हुए देखने को अभिशप्त हों.
मुझे ट्रेन के स्लीपर क्लास की खिड़कियाँ वातानुकूलित डब्बों की तुलना में हमेशा ज्यादा पसंद रही क्यूंकि वे खुल सकती थी, उनके बगल में बैठकर मैं धान के खेतों,नदियों-तालाबों,जंगल में खिले हुए पलाश और महुआ के फूल की खुशबुओं को महसूस कर सकता था. बरसात की बूंदों से अपने चेहरे को भिगो सकता था,जाड़ों की सुबह के ओस को अपनी आँख की पपनीयों पे महसूस कर सकता था. शाम में सुरमई सूरज को आसमान में लाल रंग बिखेरते हुए दूर क्षितिज पे तिरोहित होते हुए देख सकता था, रात में खिले हुए चाँद की शीतल किरणों को अपने चेहरे पे महसूस कर सकता था...!
कई बरस के बाद जब मैं नौकरी करने लगा तो मुझे हवाई जहाज पर चढ़ने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ और उसमे खिड़की वाली सीट पर बैठने का मौका भी मिला..मैं तब भी बादलों के बीच उस कीचड में सूअर के साथ लोटते हुए बच्चे को याद करता रहा,उस औरत को याद करता रहा जिसके सर के भारी बोझ को मैं अपने ऊपर महसूस करता था, लाठी टेक कर बैठे उस बूढ़े को याद करता रहा जो पता नहीं अब तक घर पहुचे कि नहीं..वो मछली जो बंशी में लगे कीड़े या आटे की ओर लपकी कि अभी भी उसे मेरा इंतज़ार हैं?
अब मैं रिटायर हो गया हूँ, गाँव में रहता हूँ,कहीं आता-जाता नहीं...सोचता हूँ कि जब अंतिम यात्रा पर जाऊंगा तो मेरे जीवन भर के अच्छे-बुरे कर्मों का इतना तो प्रतिफल मिले की उस अंतिम अनंत यात्रा में भी अगर संभव हो तो ईश्वर मुझे खिड़की वाली सीट ही दे. .
