" बड़ी दीदी" अंक ...१५
" बड़ी दीदी" अंक ...१५
" जिंदगी की रफ्तार "
नैना ! सुबह जब सो कर उठी तो चेहरा और तकिया आंसुओं से भीगा हुआ था। आंसू पोंछ नाक सिनकती हुई शीशे में उसे अपनी मुर्झाई शकल दिखाई दी थी।
अचानक ,
" नैना दीदी, चाय लाई हूं ?" सुनकर नैना ने उस ओर देखा
" ज्योति तुम ? "
ज्योति उस मोटी-मोटी मूंछों वाले दरबान की बेटी है।
जिसे मेघना ने फोन कर के। नैना की देखभाल के लिए बुलाया था।
नैना बिस्तर पर बैठ गई।
" अरे ... तुम कब आई ? हैरत में पड़ी नैना।
ज्योति ने गर्मागर्म चाय के प्याले टेबल पर रखे । नैना की नजर टेबल पर पड़े ऑलिव आयल पर गयी।
" मेघना दीदी के हैं ... उन्होंने फोन पर आपकी इसी तेल से मालिश करने को कहा है। आपको स्टेज शो भी तो करने हैं"
उसने बड़े लाड़ से उसकी गर्दन पर तेल लगाते हुए कहा।
सुन कर नैना के होंठों पर मुस्कान छा गई ,
" दूर जा कर भी मेरी कितनी चिंता है। तुम्हें अच्छे से मालूम है। अभिनेत्री को किन परिस्थितियों में रहना होगा "
नैना का मन उजली धूप से भर गया अब वह भी सजग होने लगी है।
आगे दो- तीन दिनों तक उसके स्टेज पर उतरने की पूरी तैयारी चलती रही।
दोपहर में शोभित का फोन आया था।
" एक बहुत अच्छे स्क्रिप्ट पर नाटक खेला जा रहा है। उसमें लीड रोल तुमसे करवाना चाहता हूं करोगी ?
दो महीने का वर्कशॉप चलेगा "
" पहले स्क्रिप्ट पढ़ूंगी फिर जबाव देती हूं अगर मेरी पसंद का हुआ तो अवश्य करूंगी "
" एक शो के चालीस हजार खाते में सीधे आएंगे सोच लेना अच्छे से "
" चालीस ... हजार " नैना पलकें झपकाती रह गई थी।
तीसरे दिन , जब मेरे ...
नायिका के रूप में स्टेज पर धाराप्रवाह संवाद बोलने पर तालियों की गड़गड़ाहट खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। दर्शकों की डिमांड पर नाटक खत्म होने के बाद मुझको स्टेज पर आना पड़ा।
नैना ने झुक कर दर्शकों का अभिवादन किया। कुछ अति उत्साहित लोग मंच पर फूलों के गुलदस्ते ले कर आगे बढ़ गए। जिनका स्वागत अपनी मनमोहक मुस्कान से किया। फोटोग्राफरों की भीड़ लग गई है। नैना रुक कर उन्हें शौट्स देने लगी। रात गहरी हो आई थी।
बहरहाल ,
श्रेया के ऑपरेशन हो चुकने के बाद घाव अब भरने लगे हैं। कीमो शुरू होने वाले हैं।
इन दिनों श्रेया की बेचैनी देख गौरांग परेशान हो उठता है।
सुशांत के वापस चले जाने के बाद वह अकेला ही श्रेया और मां के पास है।
वातावरण में दर्द का अहसास फैला रहता है!
" यह समय भी क्या चीज है !
नैना के लिए तो कम पड़ रहा है जब कि श्रेया के काटे नहीं कटता है "
श्रेया उपर से प्रसन्न दिखने की कोशिश करती है। अकारण हंसने का प्रयास करती है।
ऐसा करते वक्त... अपनी बची-खुची उर्जा इकट्ठा कर उसे इस्तेमाल करते हुए अक्सर जे़हन में यह आता है ,
" जीने के प्रति लगाव किस हद तक ? "
मां , गौरांग और वो खुद नैना के आने वाले फोन का इंतजार कर रहे हैं।
जिसका सीधा प्रभाव श्रेया की नींद पर पड़ता है जो बार-बार करवटें बदलने पर भी उसकी आंखों में नहीं समाती थी।
जब नींद नहीं आ रही होती है तो उसका मन अतीत में विचरने लगता है। जबकि वह अपनी बीमारी और उससे उत्पन्न होने वाले भय से इतर कुछ और ...
मसलन नैना और गौरांग के रिश्ते , मां के आगे की जिंदगी ... नैना का कैरियर ... सोचना चाहती है।
इधर ... नैना को फोटोसेशन एवं लोगों की भीड़ निपटाते हुए रात बहुत गहरा गई।
वो शोभित के साथ वापस घर लौटी है जहां ज्योति उसके इंतजार में बैठी थी।
नैना के बैग हाथों में पकड़ कर ,
" दीदी , खाना लगा दूं ? "
" हां बहुत थक गई हूं लेकिन पहले घर फोन कर लूं फिर साथ बैठ कर ही डिनर करेंगे "
इतना बोल ,
गौरांग को फोन कर के पहले श्रेया के समाचार जाने फिर उसे अपने नये एसाइनमेंट मिलने एवं दी को जल्द से जल्द जयपुर लेकर आने को कहती है।
इसी आमंत्रण का इंतजार है श्रेया, मां के साथ- साथ गौरांग को भी नैना के फोन आने के बाद गौरांग ने चलने की तैयारी शुरू कर दी है।
श्रेया ...
नैना को मिले नये एसाइनमेंट और मेरे आगे चलने वाले संभावित इलाज जयपुर जा कर कराने की बात कन्फर्म हो जाने से एक ओर जहां नैना के लिए मन में खुशी है।
वहीं अपना भविष्य मझधार में दिख रहा है।
यहां रहती तो शायद जल्दी ही सब कुछ व्यवस्थित हो पाता ।
वह नया शहर, नये लोग ?
जिस समय नैना का फोन आया था।
गहरी शाम का वक्त था न जाने मन क्यों उदासी से घिर गया था।
यहां का सब कुछ समेट घर में ताला लगा कर हमें जयपुर के लिए निकलना था।
जो इतना आसान नहीं है। मैं कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं थी।
तन और मन दोनों ही शिथिल थे। मां भी निर्बल एवं लाचार अतः जो कुछ जैसा था उसे वैसा ही छोड़ हम,
यानी मां , गौरांग और मैं जयपुर वाली ट्रेन में बैठे थे।
मेरी बगल वाली सीट पर मां थी गौरांग उपर की सीट पर थोड़ा खुश था।
उसे नैना की नजदीकियां बेहद भाती है जो उसे वहां सरलता से हासिल हो सकेगी।
मैं सामान्य बने रहने की असफल कोशिश करती हुई,
अपना सिर खिड़की पर टिका कर दूसरी अन्य बातों से दिल को बहलाने की कोशिश कर रही थी।
अचानक मां ने कुछ कहा था और मेरी आंखें खुली उन्होंने कुछ पूछा था।
जिसका जवाब देने के लिए मैं मुंह खोली ही थी कि वे रो पड़ीं।
उनका अपना शहर , अपने लोग छूटे जा रहे हैं। न जाने कब उन्हें मिल पाएंगी , मिल पाएंगी भी या नहीं ?
मैं ने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दे कर
दुबारा आंखें मूंद लीं।
" मैंने सोचा था कि रोऊंगी नहीं पर कभी- कभी दिल- दिमाग पर अपना वश नहीं चलता है "
मां के दोनों बच्चों में मैं शुरू से ही होशमंद थी।
लेकिन ये नियति भी ना !!
हमें न जाने कब , कहां और कैसे मोड़ पर ले जा कर खड़ी कर देती है ?
जहां सब कुछ आपकी सोच से परे घटता रहता है "
ठीक इसी तरह , मेरे जीवन में भी है। मैं जैसा चाहती हूं वैसा नहीं ही होता है।
याद आता है जब मैं और सुशांत काॅलेज से अलग- अलग निकल कर लंबे रास्तों , चौड़े मैदानों और सूनी सड़कों पर बिना बोले साथ- साथ चलते थे।
मैं कभी उसकी ओर देख हल्के से मुस्कुरा देती कभी उसके कंधे पर अपना सिर रख कर थोड़ी दूर तक चलती थी।
वह रुक कर मेरी आंखों में झांकते हुए
कहा करता -- ,,
" उफ़ ! कितना सुखद है तुम्हारे साथ चलना!
ऐसा नहीं हो सकता कि यह शाम ठहर जाए और हम बस चलते ही रहें "
तब हम दोनों की आंखों में शाम का सिंदूर उतर जाता "
यही सब सोचते हुए मुंह से लाख दबाने पर भी सिसकी निकल गई।
आंखें भिंच कर मैंने अपने घुटनों में सिर छुपा लिया।
गौरांग नजदीक आ कर स्नेह से मुझे थपथपाया,
" श्रेया दी , "
वे अपनी फटी- फटी आंखों से मेरी ओर देखने लगीं जैसे कोई डरावना स्वप्न देख रही हों।
" दीदी, आपको कुछ नहीं होगा हम सब हैं ना " इसके सिवाय मैं और क्या कर सकता था ? उनकी सूरत देखकर मैं अंदर तक कांप गया उन्हें देखकर देह में ऐसी झुरझुरी लगी जैसे गहरे कुंए में झांकने पर लगता है।
बहरहाल ...
हम सुबह जयपुर स्टेशन पर उतर कर नैना के बताए हुए पते पर ऑटो करके पहुंच गए थे।
दीदी बहुत थक गई थीं।
लिहाजा उन्हें पहले से ही तैयार कमरे में बिस्तर पर पहुंचा कर मैं कमरे से बाहर आ गया।
नैना उनके पास बैठी थी। उनके बालों को सहलाती हुई कानों को अपनी उंगलियों से दबा कर गालों को थपथपाई।
लेकिन श्रेया बहुत थकी हुई है। उसने छत की ओर देख आंखों को कस कर बंद कर लिया।
हम दोनों बहनों की बचपने की परवरिश बहुत कठिन माहौल में हुई है। जिसमें दीदी तो प्रारंभ से ही बहादुर और हिम्मतवाली रही हैं।
उन्हें अपने डर को हरा कर आगे बढ़ना होगा।
गौरांग ...
मैं घूम कर बंगले का निरीक्षण करने लगा हूं।
यह बंगला नैना की अंतरिम सहेली मेघना का है। जिसकी पिछले हफ्ते शादी हुई है।
उसकी फैमिली बहुत बड़े बिजनेस घराने से है। इसकी गवाही यह शानदार बगंला दे रहा है।
गौरांग की आंखें चौंधिया गई।
" पैसों की कमी उसके मां - बाबा के पास भी नहीं थी लेकिन शहर की सुरुचिपूर्ण सजावट देख कर वो भौंचक्का था।
श्रेया ...
आज सोमवार है।
मुझे जयपुर आए हुए लगभग चौबीस घंटे से उपर हो गए है ।
नैना ने डाॅक्टरों से पहले ही बात कर रखी है। मंगल वार अर्थात कल से कीमो से संबंधित सभी जांच पड़ताल शुरू होंगे।
डाक्टरों के मुताबिक,
जांच के सभी मानकों पर खड़े उतरने के बाद ही कीमो हो पाएगा।
किसी भी कारण से उनमें कुछ गड़बड़ी निकलने पर पहले मुझे उनके ठीक होने का इंतजार करना होगा।
यह इंस्ट्रक्शन मेरे सामने यक्ष प्रश्न की तरह उठ खड़ा हुआ है क्यों की जरा सी भी गड़बड़ी दवाओं के असर खत्म कर देती।
मैंने ईश्वर से प्रार्थना की है ,
" सभी रिपोर्ट्स सही निकल जाए "
इन सबमें अगले एक और हफ्ते लग जाने वाले हैं।
मुझे भूख लगनी बिल्कुल बंद हो गई थी किसी भी खाने में कोई स्वाद ही नहीं आता है।
जबकि एक वक्त पर मां के हाथ का बना हुआ खाना हम बहनों की प्रथम च्वाइस हुआ करती थी।
आजकल मां सिर्फ़ गीला-गीला कुछ तरल पदार्थ ही बना कर मुझको खिला पाती है।
क्योंकि मुझे डाइजेशन की भी प्रौब्लम आ रही थी।
मैं दिन भर लेटी रहती हूं ना !
शायद इसलिए ?
मुझे चलना और बैठना अब बिल्कुल ही नहीं भाता है।
नैना के नये नाटक की वर्कशॉप शुरू होने वाली थी।
पहले दिन मुझको गौरांग ही ले कर अस्पताल जाएगा ऐसा तय हुआ।
उस पूरी रात भर मुझे नींद टुकड़ों - टुकड़ों में आई।
जब जरा सी आंख खुलती पास वाले पलंग पर मां को माला के जाप करती और कुछ बुदबुदाते हुए देखती।
मुझमें इतनी ताकत नहीं बची थी कि उनसे सोने का आग्रह करती।
खैर ...
प्रारंभ से ही मैं बहुत पूजा- पाठ तो नहीं करती पर भगवान को हृदय से मानती हूं।
जीवन के चल रहे इस अति बुरे दौर में मां को जाप करती देख कर मैं और भी जिद में आ गई कि,
" कुछ भी हो जाए, कैसे भी करके मुझे हर हाल में ठीक होना ही है "
अगले दिन सुबह मैं सबसे पहले उठी थी।
किसी तरह बाथरूम जा कर हाथ-मुंह धोकर टेबल - कुर्सी पर बैठ गई।
नैना और गौरांग भी उठ चुके थे । नैना सारे समय परेशान हालत में मेरे आसपास ही मंडराती रहती है।
इस समय भी वो मेरे पास बैठ गई और पिछली बार की तरह पूछा ,
" दीदी कैसा लग रहा है ?
डर तो नहीं लग लग रहा है ? "
सच पूछिए तो कैसा लग रहा है का सीधा जबाव देने में मुझे जो महसूस हुआ वो यह था कि ,
" अब इस पार या उस पार "
" कभी- कभी सामने वाले की उपस्थिति को अपने वजूद पर हावी नहीं होने देना भी जरूरी होता है "
अचानक से यह बात मेरे दिमाग में कौंधी और मैंने उसे जबाव दिया ,
" नहीं अब सब कुछ ठीक है और डर तो बिल्कुल ही नहीं लग रहा फिर थोड़ा होंठ टेढ़े कर हंसती हुई बोली ,
" सिर्फ इन लंबे घने ,काले बालों की चिंता है "
उसने बहुत तसल्ली से कहा,
" फिर साल भर बाद तो आ ही जाएंगे "।
" मुझे ' बेचारी ' शब्द से बचपन से ही घृणा थी।
कोई मुझपर तरस खाए यह मुझको कतई स्वीकार नहीं।
मैं हमेशा से एक मजबूत औरत बन कर जीना पसंद करती हूं "
" ओह ... दीदी ... ,
मैं कितनी खुशनसीब हूं मेरे चारों तरफ तुम जैसे लोगों का घेरा है। "
मेघना के घर से थोड़ी ही दूर पर अस्पताल जा जिसमें मुझे कीमो के लिए जाना था।
तो सुबह दस बजे के करीब हम सब एक साथ निकले मुझे और मां को अस्पताल में एंट्री दिलवा कर गौरांग नैना को उसके रिहर्सल वाले जगह छोड़ कर वापस आ गया था।
बहरहाल...
रेडिएशन की तैयारी में लगने वाले वक्त के दौरान मुझे उस कमरे के पहले वाले कमरे में कुछ देर इंतजार करना पड़ा।
फिर शुरू हुई मेरी उस कीमो के मरीजों वाले भरे उस कमरे में कैंसर से आगामी युद्ध की तैयारी। जो एक लंबी यात्रा जैसा था।
मैंने पाया !!
उस कमरे के अंदर मेरे जैसे और भी कितने योद्धा रण में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
क्रमशः ...
