अभिव्यक्ति
अभिव्यक्ति
रोहण आज आगे की पढ़ाई के लिए बैंगलौर जा रहा था। उसके पिता के साथ पिछले कुछ सालों से उसकी बातचीत लगभग बंद थी। एक ही घर में रहते नज़रें चुरा कर वो निकल जाता। जो कुछ कहना होता मां से कहता। आज जाते वक्त उसने पिता के पैर छुए,तो उन्होंने सर हाथ रखा तो रोहण ने देखा था कि उनकी आंखें भींगी हुईं थी। पिता ने उसे एक लिफाफा दिया और बस इतना ही कहा वहां पहुंचने के बाद ही इसे खोलना और।
शहर पहुँचकर जब रोहण ने लिफाफा खोला, तो उसमें उसके बचपन की छोटी-छोटी यादें, उसकी सफलताओं पर गर्व और उसके लिए ढेरों शुभकामनाएँ लिखी थीं। चार पन्नो में स्नेह और विश्वास झलक रहा था।
डायरी पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें नम हो गईं। उसे महसूस हुआ कि जो बातें पिता कभी कह नहीं पाए, वे शब्द बनकर उसके दिल तक पहुँच गईं।
तब उसे समझ आया कि कभी-कभी ख़ामोश लफ़्ज़ भी रूह को उतनी ही गहराई से छू जाते हैं, जितनी कोई लंबी बातचीत नहीं छू पाती।
