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Kavita Sharrma

Abstract

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Kavita Sharrma

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दर्पण

दर्पण

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इस घर के कमरे में मुझे बड़े शौक से लाया गया। बड़ा सा ड्रेसिंग टेबल के साथ ही मुझे रखा गया। क्या बताऊं अपनी प्रतिक्रिया।‌सब आ आकर मेरे सामने सजते संवरते। घंटों 
बालों को कभी ऐसे,कभी वैसे सेट करने की कोशिश करते 
खूब सारा मेकअप कर मुझ पर भड़ास निकालते कैसा शीशा है। चेहरा ज्यादा काला दिख रहा है।‌
अब भला बताए कोई इन्हें भई खुद का रंग ही स्याह है तो भला मैं कैसे बदल सकता हूं। अरे और एक बात बताऊं अपने माथे की जगह मुझ कितना अत्याचार करते हैं हर रंग बिंदी से मुझे 
ऐसे सजाया गया कि मुझे लगता है कि मैं दुकान ही खोल लूं इनकी। लो अब इस छोटू की कसर थी दो दो घंटे अपने भाषण को सुना सुनाकर मुझे बोर ही कर देता है। दो तीन बार जीता भी है,तो कभी मुझे भी धन्यवाद दे दे कितना धैर्य रखकर तेरा भाषण सुनता रहा हूं। 
श्ऽऽऽऽ....  की राज़ भी जानता हूं,जो मुझसे ही साझे किए 
जाते हैं। अरे भाई इतना सब करता हूं खुद को सजाने के 
साथ साथ कभी दर्पण को साफ कर दीजिए ताकि खुद का 
सुंदर चेहरा देख सको।



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