ये उन दिनों की बात है
ये उन दिनों की बात है
ये उन दिनों की बात है
जब लड़कियां कपड़े पहना करती थी
बदन ढकने के लिए
जब दिखता था उनका सौंदर्य भरा चेहरा
अब सब कुछ दिखता है अब तो मुन्नी बदनाम हुई, शीला की जवानी.
ये उन दिनों की बात है जब चरित्र की पूजा होती थी
ईमान का बोलबाला था
अब चरित्र के चीथड़े उड़ाए जाते हैं
नैतिकता लापता हैं
ईमान किताबों से भी गायब है
और धर्म का मतलब है, दंगा फसाद मारकाट, कर्फ्यू और सन्नाटा
उन दिनों इतनी महंगाई न थी
न बेकारी न जनसंख्या की अधिकता
न भ्रष्ट हुआ था समाज
न मनुष्य का इतना पतन हुआ था
न इतनी हवस थी कि अपने लाभ के लिए प्रकृति से छेड़छाड़ करे
नदियों का रुख मोड़े, पेड़ काटे, खेत बेचकर विशाल इमारतें खड़ी करें
ये उन दिनों की बात
अब इन दिनों की बात है
अब क्या बताये, आप तो देख ही रहे हैं
सबको बस जल्द से जल्द सफल हो कर पैसे कमाना है।
रातोंरात धनवान बनने का सपना पाले बैठे हैं
रास्ता कोई भी हो
जुआ, सट्टा, मटका, अपराध, लाटरी, अश्लीलता, हर तरह के समझौते
अपने मान से, सम्मान से
समाज, राष्ट्र से कोई लेना देना नहीं
ऐसा कोई नहीं जो कहे मुझे गांधी, भगत बनना है
देश के लिए कौन मरे कौन जीए
राष्ट्र भक्ति में न पैसा है न ग्लैमर
आज की जरूरत है पैसा
यहां व्यापार हो या व्यवहार
नाते हो, सम्बन्ध हो, प्रेम हो
सब पैसे से चलते हैं अब वे दिन नहीं रहे
वे सीधे सच्चे दिन
अब सपने से लगते हैं
अब कैसे कहें बच्चों से कि ये उन दिनों की बात है
कहते हैं तो बच्चे कहते हैं
पापा कहानी सुना रहे हैं।
