यादों की ख़ुशबू
यादों की ख़ुशबू
बह्र – हज़ज मुसम्मन सालिम
अरकान – मुफ़ाईलुन - मुफ़ाईलुन - मुफ़ाईलुन - मुफ़ाईलुन
मीटर / वज़्न – 1222-1222-1222-1222
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क़िताब-ए-ज़ीस्त = जिंदगी की किताब
रहबर = रस्ता दिखाने वाला,मार्गदर्शक
सहरा = रेगिस्तान,बंजर वीरान जगह
मरु'थल = रेगिस्तान,सुखी धरती
पीर = दर्द,पीड़ा,तकलीफ़
पैकर = चेहरा,रूप,आकृति
अश्क़ों की ज़द = आँसुओ के घेरे ,निशान
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शीर्षक :- यादों की ख़ुशबू
मोहब्बत में कभी ऐसा भी एक मंज़र निकल आया,
जिसे चाहा था शिद्दत से, वही पत्थर निकल आया।
तुम्हारी याद की ख़ुशबू अभी तक दिल में महके है,
कि जैसे बंद कमरे से कोई दफ़्तर निकल आया।
किताब-ए-ज़ीस्त को खोला तो पाया नाम बस उसका,
लकीरों के मुक़द्दर से मेरा रहबर निकल आया।
जहाँ समझा था मैंने एक मरु'थल प्यास का अपनी,
उसी सहरा की मिट्टी से कोई सागर निकल आया।
हुई जब पीर बेक़ाबू तो रोया रात भर खुलकर,
मगर अश्कों की ज़द से भी वही पैकर निकल आया।
छिपाकर ज़ख़्म सीने में, हँसा था मैं ज़माने पर,
उधर कुरता हटा जो तो लहू बाहर निकल आया।
ग़ज़ल का आख़िरी मिसरा कहे है अब 'नवीं' तुमसे,
दुआ को हाथ जो उट्ठा तो वो अंदर निकल आया।
सर्वाधिकार सुरक्षित
-प्रेमयाद कुमार नवीन (नवीं)

