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S Ram Verma

Romance


5.0  

S Ram Verma

Romance


वस्ल का जादू

वस्ल का जादू

1 min 327 1 min 327

तुझ से बिछड़ कर, 

जब खुद को पाया  

तब जाकर अपनी, 

पहचान का लम्हा

अपने करीब आया !


लोग अतिशों से, 

उजाला कर रहे थे 

लेकिन मैंने मिट्टी, 

का दिया अपनाया ! 


एक पल थी तब, 

एक सदी पर भारी

तेरी चाहत में ऐसा, 

भी लम्हा आया !


पाँव छलनी थे, 

वफ़ा मेरी घायल थी

जाने क्यूँ उस मोड़ पर, 

भी तेरा पता याद आया ! 


एक लम्हे के, 

वस्ल का जादू

तुझ में समाए तो, 

समझ में आया ! 


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