वृद्ध मन
वृद्ध मन
न दोष तेरा था ए बचपन न दोष तेरा है ए वृद्ध मन।
संगी अपने बनाना चाहूं,
बचपन को जब जीना चाहूं।
चाहूं हर कोई सराहे मुझे।
मेरे बचकानी बातों को दोहराए सभी।
वो बाल हट, मैं करवाऊं पूरी,
जिसे करते थकता न वो यौवन।
न दोश तेरा था ए बचपन ।
न दोष तेरा था ए बचपन।
काका को बना दे जो घोड़ा,
मामा कि जेब जो कर दे खाली।
पापा के कंधों पर करता, हर गली ,बाजारों की सवारी।
मां का लाडला होता था वो,
सुरक्षा कवच सी लगती थी वो ।
ए बचपन कहां है तेरे रिश्ते नाते,
सब गुम है ,किसी और के बचपन को प्यारे।
बचपन छप्पन हो चला तू।
संगी साथी छोड़ चला तू।
तू जिस बचपन को सैर कराए देख वही तुझे बैर दिखाए।
वृद्ध हो चला है तेरा जीवन
पर मन बालावस्था को ही देखो मचलाएये मन।
वृद्ध मन हट कर बात मनवाये।
छप्पन बचपन सा लगता जावे।
रिश्तों में वही लाड ढूंढता है प्यारे।
बातें अब लगती सबको दोहराई सी।
क्यों हो गई मेरी दुनिया अब एकाकी सी।
कहने को बंगले में रहता हूं,
पर सच तो ये है ,
दस बटे दस की दीवारों को ही तकता हूं।
फिर भी मन में यही सोचता हूं।
न दोष तेरा था ए बचपन न दोष तेरा है ए वृद्ध मन।
ये जीवन शैली प्रगतिशील है।
रुकने पर कहां किसी को मिली मंजिल है।
यौवन जो ज़रा रुक जायेगा,
फिर कैसे वो बचपन को संभाल पायेगा।
तीन पीढ़ियों के बोझ को कैसे अकेले संभल पाएगा।
पर फिर भी एकांत जब खलता है।
यह वृद्ध मन कुम्हला उठता है।
बचपना करने को दिल करता है।
तब अक्सर खुद से ये कहता हूं,
मन को अपने बहला लेता हूं।
कि,
"ना दोष तेरा था ए बचपन न दोष तेरा है ए वृद्ध मन।"
