वफ़ादार मुसाफ़िर
वफ़ादार मुसाफ़िर
बेपनाही पर चल पड़े थे हम
जाने कहाँ से ज़ाहिरहवा हुए तुम
ज़िंदगी में एक मुकम्मल होने की चाह थी
उस पर भी दबे पाँव पसर गए तुम
काफिरी पर चलने की मज़बूत डाल पर
जाने कहाँ से लटक गए तुम
हर मर्तबा पल्लू बचाना चाहा
पर नामाकूल, पीछे ही पड़ गए तुम
ज़्खमी की आँखे भी नोँछ डाली
पीड़ा इतनी, हैरत में रह गए हम
मगरमच्छ के आँसू तो तुम ही रोए थे
परंतु क्या ! सिसक तो रहे ही थे हम
पर कलेजा तो तब कसा जब
ज़िंदगी नासूर बना,
आँसू भी पोंछने आ गए तुम।
