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sonu santosh bhatt

Tragedy


4  

sonu santosh bhatt

Tragedy


वो कौन थी?

वो कौन थी?

7 mins 322 7 mins 322

गज़ब गज़ब की बातें सुनी है

उन्ही बातों में एक खास बात सुनी

यकीन जैसा नही हुआ इस बात पर

भरोसा करने को तैयार नही था मन अंदरूनी

अजीब बात थी दिल में

एक दिन वो मिली एक महफ़िल में

वो कौन थी?

वो देख मुझे बहुत शर्माती थी।

लजाते हुए पलके झुकाती थी।

इशारों में ही कह देती सब कुछ

खुलकर बोलने से घबराती थी।

मैं ना उसको जानता था ना महफ़िल का हिस्सा था।

कैसे आया उस जगह, वो अलग किस्सा था।

उसके इशारों से मैं डर रहा था

डर डर के मत कर इशारे

ऐसे इशारे मैं कर रहा था।

वो निडर थी इशारों के मामले में

मैं इशारों से अपने मुकर रहा था।

लेकिन बंधे बंधे से कदम मेरे

ना जाने क्यो करीब से उसके गुजर रहा था।

क्यो इस तरह मेरे करीब आकर

आसपास लोग भी है ये सब भुलाकर

वो अनजान लड़की मासूम बनी घूम रही थी।

वो कौन थी? जो बेबाक होकर झूम रही थी।

कुछ लोग ताड़ते उसके जिस्म को

कुछ लोग चेहरे को घूर रहे

कुछ कोशिश करते उसके करीब जाने की

कुछ मज़बूरी के चलते खड़े दूर रहे

मैं भी उससे दूर खड़ा था।

नासमझ थोड़ा मजबूर खड़ा था।

लग तो रहा बहुत सताया है उसे

दलदल से निकलने का किसी ने

कभी नही रास्ता बताया है उसे

वो क्यो उदास चेहरे को चमकाते हुए

मुस्कराहट की नकली हँसी हँस रही थी।

जितना जाल से निकलना चाहती

उतना उसमें फँस रही थी।

वो कौन थी?

जो मेरे मासूमियत को पहचान रही थी।

एक उम्मीद मुझसे लगाए

मेरे अंदर के इंसानियत को छान रही थी।

क्यो उसके बदन को छूने की चाह जगाकर

लोग नोटों की बरसात कर रहे थे

वो लड़की ठीक नही है मगर मस्त है एकदम

अजीब-ओ-गरीब गंदी गंदी बात कर रहे थे।

मैं भी कहाँ आ गया, अजीब लगा

लेकिन वापस जाने का मन मेरा भी नही था।

रास्ता खुला था जा नही पाया

किसी ने मुझे पकड़ा या घेरा भी नही था।

वो कौन थी?

जिसके नम आंखों में नमकीन मस्तियाँ

लोगो को रिझाने के काम कर रही थी।

लोग खुश हो रहे थे उसे देखकर

मानो लोगो की खुशी का वो इंतज़ाम कर रही थी।

लोगो की बाते ऊफ़….

महफ़िल में तारीफ जमाने मे उसे बदनाम कर रही थी।

मैं नोटों की बरसात में हिलोरे खाती

उस लड़की को दूर से निहारता रहा

मेरे वश् में नही उसे निकालना इस जंजाल से

मैं खुद की कमजोरी को स्वीकारता रहा

मगर वो तो बार बार मुझसे नजर मिलाती रही।

देखते हुए मुझे उस नोटों के देवता को जाम पिलाती रही

वो नशे में धुत्त आदमी उसके करीब था

मैं दूर था, उसके मुकाबले गरीब था।

मुझे उसके पास नही जाना था

उसे इन सब लोगो से दूर भगाना था

शायद मेरे दिमाग मे अब जो बात आई

वही बातें वो मुझे बता रही थी

शायद इशारे उसके मुझे बिन कहे

इस तरह की कुछ बाते जता रही थी।

वो कौन थी?

अरे! वो आदमी? वो हद पार कर रहा था

कुछ गंदी मेरी नजर में हरकते बार बार कर रहा था।

बाकी लोग शांत थे, शायद मुझे आदत नही थी

ना ही ये सब पहले कभी देखा था।

शायद जिस दहलीज को मैं लांघ आया

वो संस्कारो के मेरे सीमा रेखा था।

अब आ ही गया इस महफ़िल में

तो थोड़ी मुश्किले खरीद लेता हूँ कुछ जखम भी

कुछ चोट लग भी जाए मुझे कोई गम नही

मैंने जेब से चंद पैसे निकाले

जो बड़ी मेहनत से थे संभाले

और बढ़ गया उसकी ओर

शायद खुद नही जा रहा था

खींच रही थी कोई डोर

वो कौन थी?

जो मुझे अपनी तरफ खींचे जा रही थी।

मेरे बंजर दिल के जमीं को

अनचाहे एहसासों से सींचे जा रह थी।

क्यो मैं भी बाकियो की तरह उसकी तरफ बढ़ने लगा था।

जो बढ़ने ना दे उसकी तरफ उससे बेवजह लड़ने लगा था।

धक्का मुक्की भी हुई और थोड़ा जोर जबर भी

ऐसा क्यो हुआ मुझे पता नही, नही कोई खबर भी।

उम्र में कम थी गम बेहिसाब थे

जिस्म तो सुंदर , अंदर जखम बेहिसाब थे।

उसके करीब जाकर मैं रुक सा गया

उसके लचीली हरकतों के आगे झुक सा गया।

थामा उसका हाथ और नचाते हुए

लोगो की अंगुलियों के छुअन से बचाते हुए

थोड़ी देर उसके साथ मैं भी झूमा था।

उसको घुमाकर उंगली के सहारे

खुद भी एक दो बार घूमा था।

फिर धीरे से उसके कान के पास

अपने होठों को ले जाते हुए कहा

अब ना जाएगा बिन तुम्हारे रहा

तुम मेरे साथ चलो अगर तुम्हारी मर्जी भी शामिल हो।

ये बंदा खुदगर्ज नही, सोचो अगर ये तुम्हारे काबिल हो।

इस शहर से तुम्हे दूर ले जाना है

इन सब भेड़ियों से तुम्हे बचाना है।

मैं नही हूँ इनके जैसा

खरीद सकूँ तुम्हे

इतना नही है मेरे पास पैसा

वो मुस्कराई और मेरे हथेली को कसके

बस यही चाहती थी उसने कहा हँसके

मुझे वो अपने साथ ले गयी

हाथ से पकड़के हाथ ले गयी।

थोड़ी देर उसकी मर्जी से चलता गया

देख रहा हर आदमी मुझसे जलता गया

मेरा जर्रा जर्रा जज्बातों का पिघलता गया।

पैसे वाले रईस भी इस बार

हाथ अपने बेबसी में मलता गया।

अब थोड़ी दूर पहुंचे नजरो से सबके

मै अपनी मर्जी उसपर चलाने लगा

भाग निकलते है इस जहरीली दुनिया से

कुछ इस तरह उसे बहलाने लगा।

वो कौन थी?

जो मेरी हर बात मान रही थी।

पहली मुलाकात में ऐसा क्या देखा

जो वो मुझे भला जान रही थी।

मेरे एक कहने में उस अंधेरी शाम को

सुनसान सड़को में मेरे साथ भाग रही थी।

मैं अकेला नही जगता रहा उस दिन

वो भी मेरे साथ जाग रही थी।

इस शहर के लगभग सभी शरीफ लोग

ना जाने कैसे उसे जानते थे

हर एक जुबान पर नाम उसका

कुछ मासूम चेहरे भी उसे पहचानते थे।

मैं दुनिया की नजर से उसे बचा बचाकर

अपने इस शहर से दूर ले गया भगाकर

वो कौन थी?

जो मुझपे भरोसा इतना करने लगी थी।

अपनी हकीकत की कहानी मुझे सुनाकर

क्यो मेरे सामने इस तरह आहें भरने लगी थी।

कैसे वो इस दलदल में फंसी कैसे यहां आई थी।

उसने बताया एक दिन उसके घर हुई उसकी लड़ाई थी।

घर वालो से लड़कर, किसी दोस्त के भरोसे रही।

और जो उसे यहां लाया वो दोस्त की बेवफाई थी।

उसने जो बताया मैं बता नही सकता

इंसानियत का लहू पीता वो आदमखोर है।

मासूम लड़कियों के लिए जाल बिछाता

उनके इज्जत का लुटेरा! हाँ वो चोर है।

मैं बैठा एक कमरे में, वो खिड़की पर खड़ी थी

मैं समझ गया किन हालातो से वो लड़ी थी।

मैं आज उसके साथ, साथ निभाने को खड़ा था

लेकिन उसके संघर्ष पर ताज्जुब हुआ

कैसे लड़ी वो इस तरह इसी सोच में पड़ा था।

उसने आगे बताया कि क्या क्या उसपर जुल्म ढाए

भले लोगो ने उसपर लाखों पैसे लुटाए

मगर वो उसकी किम्मत थी,

और वो किम्मत भी उसे कभी मिल ना पाए

जिस्म किसी का कुरेदा, और कोई माला-माल हो रहा था

वहां रहकर मौत से बत्तर उसका हाल हो रहा था।

वो आगे कुछ बताती मैंने उसके होंठो पर

अपनी उंगली रख कर

कहा मैं और नही सुन पाऊंगा

मत सुनाओ मुझे ऐसी कहानी की

आगे कोई सपना नही बुन पाऊंगा।

गलती थी जिसकी भी,अब सुधार आएगा जरूर

देखना एक दिन एक एक को सबक सिखाऊंगा।

मैं उसके करीब बिल्कुल पास, खड़ा था उसके आगे

कुछ तो थे उसके मेरे बीच उलझे से धागे

उसकी आँखों मे आंसू आ गए,

मेरी आँखों को देखकर नम

रुला ही दिया उसको मैंने

कहकर की मेरा है तेरा हर गम

वो चुप भी नही हुई ना कुछ कह पाई थी।

मैं समझ ना सका बात उसकी

कुछ इस तरह वो बुदबुदाई थी।

इसी बुदबुदाहट के चलते

उसने गले मुझे लगाया था

मैं भी निशब्द था

कुछ कह नही पाया था।

उसके बाद वो भी कुछ कहकर जाने लगी

दो लफ्ज़ ही कहे, ना कि कुछ ज्यादा कहा

शायद अपनी भाषा मे उसने शुक्रियादा कहा।

फिर चली गयी , मिलूँगी एक दिन, करके वादा कहा।

ना जाने क्यो कुछ पूछ नही पाया

ना नाम पूछा ना पता

कहाँ वो गुम हो गयी ना जाने कहाँ हुई लापता।

जाते समय भी तो वो मौन थी

बस एक सवाल अब जहन में है

वो कौन थी???


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