STORYMIRROR

Bhavna Thaker

Tragedy

3  

Bhavna Thaker

Tragedy

वक्त का मारा

वक्त का मारा

1 min
157

वो प्यासी आँखों से शून्य में तक रहा है 

खोये हुए सरमाये को ढूँढता

वक्त ने उसे एक खेल दिखाया है

कभी एक दरिये का मालिक था अश्रुओं की आग में सूख गया है.!


कई सपनों को परवाज़ में लिए घूमता था सब धुआँ बनकर उड़ गया है

एक बवंडर सा बहता था अपनी मस्ती में समय की आँधियों में खामोश हो गया.!


एक पीड़ अब ठहरी है उसके होंठों पर 

चिल्लाना चाहता है दर्द के कतरों में दब गई है आवाज़ अब,

चर्राये तन से लिपटी है भूख की वेदना 

भटक रहा है खाली जेब लिए.!

 

बदनसीब किसके भरोसे चले अब छीन ली वक्त ने बैसाखी सुख की 

मन खाली आसमान सा खुशियों की बदली ढूँढ रहा है, 

जी तो रहा है पर ज़िंदा कहाँ है 

साँसों को गिनते एक आम इंसान 

ज़िंदगी का बोझ ढोते गम पी रहा है।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy