STORYMIRROR

कवि काव्यांश " यथार्थ "

Classics Fantasy Inspirational

4  

कवि काव्यांश " यथार्थ "

Classics Fantasy Inspirational

उधार (एक भावनात्मक कविता)

उधार (एक भावनात्मक कविता)

2 mins
380

            उधार
(एक भावनात्मक कविता)

वो दिन थे जब जेबें थी खाली,
मन में थी उम्मीदों की लाली।
एक मित्र था, बस उसी का सहारा,
हर मिन्नत पर करता वो इशारा।

और कहता
"भाई, बस इस बार सहायता कर दे,
मेरे भरोसे पे खुद को एक बार रख दे।
कसम खाता हूँ, मिलते ही मैं लौटा दूंगा,
तेरा उधार, पहली फुर्सत में ही चुका दूंगा ।"

बार बार हर बार 
वही शब्द, वही वादा,
हर बार दिलासा, दिल ने किया इरादा।
मित्र ने आँख मूँद कर साथ दिया,
खुद तंग था, मगर फिर भी हाथ दिया।

पर उन वादों का कभी
न कोई ज़िक्र आया,
न ही उधार, न कभी हिसाब लगाया।
पूछा गया तो बस मुस्काया,
"जल्द ही चुका दूँगा", कह कर टाल गया ।

समय बीता, हालात बदले,
जिसने उधार लिया था
उसके दिन बदले।
बड़े बंगले, गाड़ियों की कतार,
नाम ऊँचा, सफल हुआ व्यापार।


मित्र वहीं रहा, हालातों में फँसा,
सपनों के घर का टूटा कशा।
पर कभी शिकायत न की उसने,
बस आस लगाई किसी पुराने यक़ीन से।

समय की मार भी विचित्र होती है,
संपन्नता में भी आत्मा रोती है।
वो यादें जो भरत की नींदों में लगा चुभने,
वो उधार अब बन गया, 
आत्मा को लगा झिंझोड़ने।

"कितनों से लिया, कितनों से भूला,
यही कारण है, क्यों मन मेरा झूला।
सुख के बाद भी क्यों शांति नहीं,
क्यों लगता है जीवन अधूरा सा कहीं?"

और तब शुरू हुआ वो प्रायश्चित का पथ,
मिले हर वो नाम, जिनसे मिला था ऋण-स्पर्श।
जब उसे वो मित्र मिला, टूटी फूटी झोपड़ी में,
भरत की आँखें भर आईं, बूँदें मोती बन गईं।

पाँव पकड़े, कहा – "माफ़ कर दे मेरे दोस्त,
मेरी भूल ने तुझे बना दिया बेदर्द होस्ट।
पर आज मैं नहीं वो भरत हूँ,
तेरे हर आँसू का अब सच्चा उत्तर हूँ।"

दस करोड़ दिए, साथ सुंदर घर,
पर मित्र बोला –
"ये मेरे किस काम का, हे नर?"
भरत की मिन्नतें, आँसू और प्रार्थना,
पिघल गया दिल,
मिली फिर वो आत्मीय भावना।


कविता का सार
उधार सिर्फ पैसा नहीं, वो विश्वास होता हैं,
एक मित्र का, जो तुम्हारे साथ होता हैं।
जीवन में उधार लिया तो उसे चूकाओ भी,
उसकी परिस्थिति को कभी मत भुलाओ भी।

क्योंकि वो दिन जब तुम्हें ज़रूरत थी,
वो भी किसी अपने अभाव की हकीकत थी।
जो देता है उधार, वो देता है दिल से,
उसे भुला देना, जीवन की
सबसे बड़ी भूल है कसम से।

कुछ बातें हैं, कुछ कर्म हैं जो
हमारे जीवन में अपना
सिबिल संख्या
सुधारने और बिगाड़ने
का काम करती हैं,
जिस तरह सिबिल संख्या जब कम
हो जाए तो कहीं से भी कोई कर्जा
मिलने की उम्मीद खत्म हो जाती है,
उसी तरह किसी से लिया हुआ कोई 
उधार कभी मनुष्य को जीवन में 
शान्ति प्रदान नहीं करता।
यही हमारे जीवन की
सबसे बड़ी सीख है।








स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
         विरमगांव, गुजरात।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Classics