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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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तुम मांगो तो

तुम मांगो तो

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तुम मांगो तो फूलों की मुस्कान भी लाकर देंगें

जगमग जगमग तारों सी पहचान भी लाकर देंगें।


मुझसे मेरा हाल न पूछो मैं खुद से उलझा हूँ

जाने कैसी चली हवाएँ यहाँ वहाँ झुलसा हूँ

अनजानी राहें हैं मैं मनुहार कर रहा

भूले भटके एक शख्स से प्यार कर रहा।


हर धड़कन की सुर लर लय पर ताल पर बजकर

खामोशी की सरगम का आभार कर रहा

तुम मांगों तो जीने का सामान भी लाकर देंगें

अब तक जो न मिल पाया सम्मान भी लाकर देंगें।


घोर निराशा की बेला है आस लिये बैठा हूँ

अनगिन तारों की बस्ती में चाँद लिये बैठा हूँ

सुबह बुला दे ऐसा भी एक राग लिये बैठा हूँ

अपनापन ओढ़े मौसम की तेज हवा में उलझ उलझ कर।


आकाशीय चर्चाओं का इतिहास लिये बैठा हूँ

तुम मांगों तो जीवन का आधार भी लाकर देंगे

खोया खोया तुमको तेरा प्यार भी लाकर देंगें।


टूट चुका जो तेरा वो विश्वास भी लाकर देंगें

बुझी बुझी इन आँखों मे उल्लास भी लाकर देंगें

इस मरघट में जीवन का परिहास भी लाकर देंगें

हर मौसम में बजने वाला साज भी लाकर देंगें

तेरे मेरे बीच की सारी दीवारों को तोड़फोड़कर।


अंधेरे में जलती हुई मशाल भी लाकर देंगें

तुम मांगों तो कलयुग का भगवान भी लाकर देंगे

हम मनुष्य हैं कहने का अभिमान भी लाकर देंगे

तुम मांगों तो फूलों की मुस्कान भी लाकर देंगें।


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