तुम दूर नज़र आए
तुम दूर नज़र आए
दो तन के मिलन से निखरा
जिस्म का सोंधापन
सौंप कर चली तुझे
एक मुट्ठी आसमान ले चली मैं
साँसों की मद्धम तामिल की व्यथा
किसे कहूँ
तुम्हारी साँसों से जो उलझ गई
ठंडी रेत से गूँदे हुए लड्डू
समुन्दर की लहरों में बह जाते है
वैसे मेरा वजूद बह रहा है
तुम्हारी अदाओं के इशारों में
दूर कहीं सावन बरसा है
यहाँ सूखी धरती तरसे है
मेरी रूह सोती नहीं व्यथा के मारे
उस सोंधेपन की सराबोर खुशबू
मन को ललचाए
दौड़ी चली जाती है नज़दीकीयाँ पाने
कितनी नज़र दौड़ाई
तुम दूर बहुत दूर नज़र आए
बड़ी दूर नज़र आए।
