ठहराव
ठहराव
उन्मुक्त हवाओं में, वो बहती फिजाओं में,
कुछ तो बात है आज, इन खयालों में..
तूफानों में आज उफ्फान नहीं,
यूं दिलों में आज ठहराव सा है,
कहीं रेत पर लिखीं लकीरें, मिटी नहीं,
जसबातों में आज कोई अहसास वही,
रूह तक क्या, कोई पहुंच पाया है कभी,
दिलों में कोई निशां, छूटा क्या कहीं,
सवालों के कुछ ऐसे ही हिसाब नहीं,
उलझा हुआ ‘निशब्द’ है, जिनमें कहीं।।

