तराना-ए-इंतज़ार
तराना-ए-इंतज़ार
मेरे बेरंग चेहरे पर, मुस्कान का गुलाल बिखर जाता है,
बेचैन साँसों को, तुम्हारी आवाज़ से क़रार आ जाता है।
शायद तुम्हें मालूम नहीं, तुम्हारी अहमियत मेरी हयात में,
बुझते एहसासों में, तुम्हारे अल्फ़ाज़ से निखार आ जाता है।
मद्धम-सा साज़ छिड़ जाता है, सूनी पड़ी धड़कनों की महफ़िल में,
बेसुरी-सी इस रूह में, तुम्हारी बातों से ख़ुमार आ जाता है।
शाम-ओ-सहर दिल गुनगुनाता है, यही तराना तुम्हारे इंतज़ार में,
बेजान-सी मेरी ज़िंदगी में, तुम्हारी मौजूदगी से मलार आ जाता है।
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*स्वप्ना*

