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Swapna Sadhankar

Classics

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Swapna Sadhankar

Classics

तन्हा रह जाता है सच!

तन्हा रह जाता है सच!

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झूठों के झुंड में सच अक़्सर तनहा ठहर जाता है,

दुनिया-ए-दिखावा का दस्तूर आगे निकल जाता है।


हर शख़्स मसरूफ़ है यहाँ ख़ुद को ही रिझाने में,

दूसरों का दर्द देख रिश्तों का रुख़ बदल जाता है।


दौलत-ए-ग़ैरत पे ही भारी है ख़ुदग़र्ज़ी का सिक्का,

ईमान का सौदा कर पल में ज़मीर फिसल जाता है।


फ़रियादी भी हो जाता है मुहताज इस मुहमल जहाँ में,

गर्दिश-ए-अय्याम में टिमटिमाता तारा दहल जाता है।


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