तन्हा रह जाता है सच!
तन्हा रह जाता है सच!
झूठों के झुंड में सच अक़्सर तनहा ठहर जाता है,
दुनिया-ए-दिखावा का दस्तूर आगे निकल जाता है।
हर शख़्स मसरूफ़ है यहाँ ख़ुद को ही रिझाने में,
दूसरों का दर्द देख रिश्तों का रुख़ बदल जाता है।
दौलत-ए-ग़ैरत पे ही भारी है ख़ुदग़र्ज़ी का सिक्का,
ईमान का सौदा कर पल में ज़मीर फिसल जाता है।
फ़रियादी भी हो जाता है मुहताज इस मुहमल जहाँ में,
गर्दिश-ए-अय्याम में टिमटिमाता तारा दहल जाता है।
